- सुसंस्कृति परिहार
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सुभाष चंद्र बोस को सबसे पहले नेताजी कहकर एडोल्फ हिटलर ने पुकारा था। निश्चित तौर पर उसने सुभाषचंद्र बोस को बेहतरीन तरह से पहचान लिया था ।वे आगे चलकर पूरी दुनिया में नेताजी ही कहलाए । उनमें नेतृत्वकर्ता के समस्त गुण मौजूद थे ।
हर साल नेताजी की जयंती उल्लास पूर्वक मनाई जाती रही है लेकिन पश्चिम बंगाल चुनाव के मद्देनजर इस बार नेताजी की 125वीं जयंती काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. इसे बंगाली अस्मिता से जोड़ते हुए इस बार चुनाव से पहले टी एम सी और बीजेपी दोनों ही अपने अपने ढंग से जयंती मनाने की तैयारी कर रही हैं. लेकिन केन्द्र सरकार ने इस हाई लेवल कमेटी में सभी दलों के सदस्यों को शामिल कर यह साफ़ कर दिया है कि नेताजी देश की अमूल्य धरोहर हैं.इस बार सरकार ने इसे पराक्रम दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया है और र यह अपेक्षा की गई है कि सुभाषचन्द्र बोस से युवा प्रेरणा लें ।
आइए इस अवसर पर नेताजी को जाने ।ज्ञातव्य हो सुभाषचंद्र बोस जलियांवाला बाग कांड से इस तरह विचलित हुए थे कि वे अंग्रेजों के विरुद्ध देर ना करते हुए आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और अमर नायक बन नेता जी कहलाए ।तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा..! यह नारा बुलंद करने वाले महान क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ। उनके पिता जी कटक शहर के जाने-माने वकील थे। कॉलेज के दिनों में एक अंग्रेजी शिक्षक के भारतीयों को लेकर आपत्तिजनक बयान पर उन्होंने खासा विरोध किया, जिस कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया था। नेताजी बचपन से विलक्षण छात्र थे।
आज़ादी के संग्राम में शामिल होने के लिए उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की नौकरी ठुकरा दी। उन्होंने लंदन से आईसीएस की परीक्षा पास की। 1921 से 1941 के बीच नेताजी को 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए और कोलकाता में सुभाष चंद्र बोस ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। में अलग-अलग जेलों में 11 बार कैद में रखा गया। 1943 में नेताजी जब बर्लिन में थे, उन्होंने वहां आज़ाद हिंद रेडियो और फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की। नेताजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दो बार अध्यक्ष चुना गया। उन्हें किताबों का शौक था। उन्होंने स्वामी विवेकानंद की बहुत सी किताबें पढ़ीं।
विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लडऩे के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था आजाद हिंद फौज में महिलाओं के लिए झांसी की रानी रेजीमेंट बनाई उनके द्वारा दिया गया जय हिन्द का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा, बन गया है। 3 मई 1939 को सुभाष ने कांग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद सुभाष को कांग्रेस से ही निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतन्त्र पार्टी बन गयी। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतन्त्रता संग्राम को और अधिक तीव्र करने के लिये जन जागृति शुरू की।
3 सितम्बर 1939 को मद्रास में सुभाष को ब्रिटेन और जर्मनी में युद्ध छिडऩे की सूचना मिली। उन्होंने घोषणा की कि अब भारत के पास सुनहरा मौका है उसे अपनी मुक्ति के लिये अभियान तेज कर देना चहिये। 8 सितम्बर 1939 को युद्ध के प्रति पार्टी का रुख तय करने के लिये सुभाष को विशेष आमन्त्रित के रूप में काँग्रेस कार्य समिति में बुलाया गया। उन्होंने अपनी राय के साथ यह संकल्प भी दोहराया कि अगर काँग्रेस यह काम नहीं कर सकती है तो फॉरवर्ड ब्लॉक अपने दम पर ब्रिटिश राज के खिलाफ़ युद्ध शुरू कर देगा।अगले ही वर्ष जुलाई में कलकत्ता स्थित हालवेट स्तम्भ जो
भारत की गुलामी का प्रतीक था सुभाष की यूथ ब्रिगेड ने रातोंरात वह स्तम्भ मिट्टी में मिला दिया। सुभाष के स्वयंसेवक उसकी नींव की एक-एक ईंट उखाड़ ले गये। यह एक प्रतीकात्मक शुरुआत थी। इसके माध्यम से सुभाष ने यह सन्देश दिया था कि जैसे उन्होंने यह स्तम्भ धूल में मिला दिया है उसी तरह वे ब्रिटिश साम्राज्य की भी ईंट से ईंट बजा देंगे।
इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार ने सुभाष सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओं को कैद कर लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाष जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे। सरकार को उन्हें रिहा करने पर मजबूर करने के लिये सुभाष ने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। हालत खराब होते ही सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। मगर अंग्रेज सरकार यह भी नहीं चाहती थी कि सुभाष युद्ध के दौरान मुक्त रहें। इसलिये सरकार ने उन्हें उनके ही घर पर नजरबन्द करके बाहर पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया।[
सन् 1943में उनके बर्लिन पहुंचने की खबर मिली । फिर 16अगस्त को सिंगापुर से वे जापान पहुंच गए जहां उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज ने महत्वपूर्ण कामों की जानकारी दी । सूत्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहां से फार्मोसा प्रस्थान करते समय अपराह्न उनका वायुयान दुर्घटना का शिकार हो गया । जापान में प्रतिवर्ष 18 अगस्त को उनका शहीद दिवस धूमधाम से मनाया जाता है वहीं भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत 1945 में नहीं हुई। लेकिन कांग्रेस सरकार बदलने के बाद भाजपा सरकार ने भी इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास किया लेकिन कुछ हासिल नहीं हो सका । बहरहाल इस विवाद पर विराम ही उचित होगा ।आज नेताजी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन आज़ादी के संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान को सदैव स्मरण किया जायेगा।