- जाहिद खान
मुल्क में तरक्की पसंद तहरीक जब परवान चढ़ी, तो उससे कई तख्लीककार जुड़े और देखते-देखते एक कारवां बन गया। लेकिन इस तहरीक में उन तख्लीककारों और शायरों की ज्यादा अहमियत है, जो तहरीक की शुरूआत में जुड़े, उन्होंने मुल्क में साम्यवादी विचारधारा फैलाने और उससे लोगों को जोड़ने का अहमतरीन काम किया। ऐसा ही एक अजीमतर नाम जोय अंसारी का है।
उत्तर प्रदेश के मेरठ में 6 फरवरी, 1925 को पैदा हुए जोय अंसारी का पूरा नाम जिल्ले हस्नैन नकवी था। उनके वालिदैन उन्हें मजहबी तालीम देकर, आलिम बनाना चाहते थे। जोय अंसारी की शुरूआती तालीम सहारनपुर और मेरठ में हुई। लेकिन परिवार वालों की चाहत और मर्जी के खिलाफ वे सहाफत के मैदान में आ गए। 'अंजुमन तरक्की पसंद मुसन्निफीन' से शुरूआत से ही उनका वास्ता हो गया था। उन्होंने दिल्ली में छोटे-छोटे अखबारों में काम किया। आगे चलकर तरक्की पसंद तहरीक के बानी सज्जाद जहीर के साथ कम्युनिस्ट पार्टी के अखबारों 'नया जमाना' और 'कौमी जंग' से जुड़ गए।
किताब 'रौशनाई : तरक्कीपसंद तहरीक की यादें' में सज्जाद जहीर, जोय अंसारी के मुतआल्लिक लिखते हैं,''हमारे इन जलसों में जोय अंसारी आलोचना और नुक्ताचीनी के मैदान के सबसे बड़े शहसवार थे।'' जबान में किसी किस्म की खामी या झोल और अर्थ में अस्पष्टता या जरूरत से ज्यादा बारीकी उनके लिए नाकाबिले बर्दाश्त थीं। उनकी मौलवियाना शिक्षा-दीक्षा ने एक हद तक खुश्क किस्म की बेलोच सोच से उनके मस्तिक को बोझल कर दिया था। चुनांचे वह जोश मलीहाबादी हों या कृश्न चंदर, सरदार जाफरी या कैफी आजमी, मजाज या मजरूह या कोई और, जोय अंसारी कोई न कोई एतराज उन पर आहिस्ता से कर देते थे।
सही को सही और गलत को गलत कहने का माद्दा उनमें औरों से कहीं ज्यादा था। उन्होंने हमेशा अपने जमीर की सुनी। एक मर्तबा अली सरदार जाफरी ने जोय अंसारी से कह दिया,''आप कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार में काम कर रहे हैं। अंग्रेजी जबान इल्म का दरवाजा खोलती है और आप को अंग्रेजी की शुदबुद भी नहीं।'' जोय अंसारी को ये बात ऐसी चुभी कि दो-तीन साल के छोटे से अरसे में उन्होंने अंग्रेजी जबान पर ऐसी कमांड की कि न सिर्फ अंग्रेजी में जार्ज बर्नार्ड शा पर एक मुकम्मल किताब लिख डाली, बल्कि अंग्रेजी जबान से उर्दू में कई किताबों के अनुवाद भी किए।
जोय अंसारी का एक लंबा अरसा मास्को में बीता। वे वहां अनुवादक की हैसियत से पहुंचे थे। कुछ अरसा ही गुजरा होगा कि उन्होंने अंग्रेजी की तरह रूसी जबान पर भी काबू पा लिया। वह भी इस हद तक कि सीधे रूसी से उर्दू में तर्जुमा करने लगे।
रूसी अदब का उर्दू में तर्जुमे के अलावा जोए असांरी ने गालिब, अमीर खुसरो और दूसरे अदबी, समाजी, सियासी मसलों और अदबी शख्सियतों पर भी शानदार मजामीन, खाके, निबंध और शोध-पत्र लिखे हैं। खास तौर पर उन्होंने अमीर खुसरो पर बेहतरीन काम किया है। '
जोय अंसारी का जिस तरह का मिजाज और उसूल थे, उस लिहाज से जब सोवियत यूनियन में सत्ता की गड़बड़ियां पेश आईं, तो वे उसकी सख्त आलोचना करने से बाज नहीं आए। उनकी आलोचनाएं भी इंतिहाई सख्त हुआ करती थीं। सोवियत संघ ने जब अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजीं, तो उन्होंने उसके खिलाफ मजामीन लिखे। वे बड़ी सलाहियतों के मालिक थे। अदब के अच्छे पारखी और दिल-दादा थे। अगर उन्हें और लंबी उम्र मिलती, तो वे अदब की और भी ज्यादा खिदमत करते। कैंसर जैसे नामुराद मर्ज के चपेटे में आकर 21 फरवरी, 1990 को जोय अंसारी ने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।
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