- प्रो. प्रेम प्रभाकर
श्यामबाबू शर्मा की सद्य: प्रकाशित पुस्तक 'दलित हिन्दी कविता का वैचारिक पक्ष' एक बड़े अभाव की पूर्ति करती है। अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली ने कम कीमत में अधिक महत्व वाली पुस्तक प्रकाशित कर पाठकों का भला किया है। एकादश निबंधों वाली इस पुस्तक की यह भी विशेषता है कि ये सभी निबंध आपस में जुड़े हुए हैं-अध्यायों की तरह। 'दलित विमर्श : अनछुए पहलू', 'मानव मुक्ति की आकांक्षा का साहित्य और आधार भूमि', 'स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का रचना संसार', 'अंतहीन नस्लीय समस्या', 'राजनीतिक अध:पतन और दलित काव्य चिंतन', 'बाजार की मृगमरीचिका : वंचित जन', 'दलित स्त्री का अरण्य रोदन', 'पहाड़ तुम कब बदलोगे', 'दलित अभिजत्यता का समाजशास्त्र', 'अर्थयुग:अर्थहीन विश्वबंधुत्व' और 'दलित काव्य का यथार्थ'। श्यामबाबू ने आलोचकीय और पत्रकारीय दोनों भाषाओं में अपना मत-अभिमत प्रस्तुत किया है।
'दलित विमश:र्अनछुए पहलू' में दृष्टिबोध को समझने में सहूलियत मिली। सरहपा द्वारा ब्राह्मण कर्मकांड, जातिव्यवस्था और ब्राह्मणवाद की तीखी आलोचना की गयी थी। स्वयं बुद्ध और महावीर ने भी ब्राह्मण धर्म की आलोचना की है, हाँ उन्होंने यह काम दलित पैरोकारी में नहीं किया है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती, हीरा डोम और डॉ रामविलास शर्मा के कथन को उद्धृत किया गया है। पुस्तक का दूसरा आलेख है- 'मानव मुक्ति की आकांक्षा का साहित्य :आधार भूमि'। डॉ शर्मा का मानना है, 'मज़लूमों, असहायों, वंचितों, शोषितों-हाशिएकृत वर्ग की बात उनकी भाषा में करना और उन्हीं के द्वारा उठाना मात्र दलितों को ही नहीं बल्कि शोषित-दलित संपूर्ण मानवजाति के कल्याणार्थ रचे जाने के कारण वाङ्मय आज मानव मुक्ति का साहित्य हो चुका है।'(दलित हिन्दी कविता का वैचारिक पक्ष, श्यामबाबू शर्मा, पृष्ठ 27)
सुशीला टाकभौरे की एक कविता से इसकी पुष्टि की गयी है:दलित अछूत ढूँढ रहे थे/पीड़ाओं से मुक्ति का मार्ग/अंधेरे में आशा का प्रकाश/जिससे विश्वास कर सकें/दुनिया उनकी भी है/उन्हें भी जीने का हक है। (वही पृ 38)इस मामले में ओमप्रकाश वाल्मीकि यथार्थ के अधिक करीब लगते हैं। वे भाववादी अंदाज में नहीं बल्कि सवाल उठाते हुए कहते हैं- खुल गयी हैं खिड़कियां/आने लगी है ताजी हवा/युगों-युगों की घुटन/अब घट रही है/हम अभागे नहीं हैं/हमारा भी हक, हिस्सा है (वही पृ 40)
'अंतहीन नस्लीय समस्या' में लेखक दलित समाज को नस्लीय भावना का शिकार मानता है जबकि डॉ अंबेडकर मानते थे कि सवर्ण और अवर्ण दोनों दो नस्ल के नहीं हैं।इस संदर्भ में सुखबीर सिंह की एक कविता का अंश प्रस्तुत किया गया है-'मरने तक भी वे/अछूत रहे चलते हैं/अलग-अलग जमीन पर जीते हुए/मरने के बाद भी/अलग-अलग जमीन पर ही जलते हैं/वसुधैव कुटुंबकम के नारे की असलियत की आँच/यहाँ पर साँस लेती है वह कुत्ता संस्कृति/जो आदमी से काटती है बाँटती है/धन, धरती और रिश्तों को/गैर बराबरी के साथ/भौंकती है अपने नस्ल पर/ और दूसरों के तलुए चाटती है।'(पृ? 57-58)
हिन्दी दलित कविता का एक स्वर राजनीतिक अध:पतन को रेखांकित करना भी रहा है। यही कारण है कि श्यामबाबू ने अपने पाँचवें आलेख 'राजनीतिक अध:पतन और दलित चिंतन पर गंभीरता से विचार किया है। भारत की जनता के लिए भारतीय संविधान में समता, समानता, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, भाईचारे को देश के कर्णधारों ने नकार दिया। कथन में जरूर इसका पाठ होता रहा परंतु व्यवहार में ब्राह्मणवाद, सामंतवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ के आधार पर सत्ता व्यवस्था बनाई जाने लगी। राजनीतिक स्खलन पर मोहनदास नामिशराय टिप्पणी करते हैं-'चुनाव के दिन/वे सभी एक हो जाते/जैसे किसी युद्ध के मैदान में/जीतने/समेटने/भोगने को आतुर/दूसरी ओर मूक/गरीब/दलित/आदिवासी होते/विवाह के इंतजार में बुढ़ाती लड़कियों जैसे/लोकतंत्र को सीने से चिपकाये/मत से सम्मत का रिश्ता जोड़ते।' (पृ? 76)
भारतीय राजनीति में दलितों की दशा उतनी नहीं सुधरी जितनी अपेक्षित थी। ओमप्रकाश वाल्मीकि इसका कड़ा प्रतिवाद करते हैं-रहे बेखबर/उस दुश्मन से/जिसकी सेवा-टहल में खप गयीं पीढ़ियाँ/बिक गईं भूखी नंगी/मर गयी बेमौत/बेनाम चीर-परिचित गलियों में/जन्म लेने भर की/इतनी बड़ी सजा/आखिर कुछ तो सोचा होता।' (पृ? 81)
पुस्तक का छ्ठा खंड है- 'बाजार की मृगमरीचिका:वंचित जन'। 'बेहतर कल की प्रत्याशा में आदमी ग्लोबल संस्कृति और आचार संहिता का हिमायती बनता जा रहा है। जयप्रकाश लीलवान लिखते हैं- बाजार के समुद्र की/व्हेल मछलियों के/नृत्य पर/आज का समय/धर्म और धनाधीशों के वैचारिक कंकालों के/खुश होने क /नजारा देखता है।(पृ? 97) . सातवाँ अध्याय 'दलित स्त्री का अरण्य रोदन' है। 'दलित स्त्री भारतीय संस्कृति की भयानक दुर्घटना है। यह कोई प्राकृतिक अस्तित्व नहीं, शुद्ध रूप से क्रमश: गुलामी की मन:स्थिति में जकड़ते-ढलते चले जाने की चेतना शून्य परिणति है। शरीर से यह स्त्री कहे जाने के बावजूद नारी होने के अहसास से वंचित है। दशा यह कि एक तो औरत दूसरे उसके संबोधन- चमारिन काकी, डोमिन अजिया, पासिनि मौसी, धोबिन भौजी से। यानि संबोधन ही घृणापूर्ण हिकारत और अपमान से आच्छादित।' ।(पृ? 113) सुशीला टाकभौरे लिखती हैं- आज रोम-रोम से ध्वनि गूँजती है/पोर-पोर से पाँव फूटते हैं/प्रचलित परिपाटी से हटकर/मैं माँगती हूँ सब और एक साथ/मुझे अनंत असीम दिगंत चाहिए/मुझे अनंत आसमान चाहिए। (पृ? 124)
आठवें अध्याय का शीर्षक 'पहाड़ तुम कब बदलोगे' शोषक शक्ति को पहाड़ से निरूपित करना प्रतिरोधी ताकत को कम आँकना माना जा सकता है, जो कि है नहीं। उच्च वर्ग अपनी विलासिता में डूबा हुआ है। यह दलितों को अवमानना और तिरस्कार की दृष्टि से देखता है। सचेत कवि जयप्रकाश कर्दम इस प्रकार की सामंतवादी प्रवृत्ति का तीव्र विरोध करते हुए लिखते हैं- छीना है/मेरे मुँह का ग्रास/नोचते आए हैं मुझे/भूखे बाज की मानिंद/अपने नुकीले पंजों से/डकारते आए हैं/मेरा मांस/यदि रहा मेरे/दमन और शोषण का हाल तो/आज नहीं तो कल/हरकत में जरूर आएँगे/मेरे हांथ।(गूंगा नहीं था मैं, जयप्रकाश कर्दम,पृ? 16)
'दलित अभिजात्यता का समाजशास्त्र पुस्तक का नवां निबंध है। इसमें काफी गहराई से दलितों के अंदर पनपते ब्राह्मणवाद यानि अभिजात्यता को रेखांकित किया गया है। 'अपने से नीचे की तलाश और स्वजाति की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिशें। हिंदू वर्ण व्यवस्था में पिछड़ी और अस्पृश्य कही जाने वाली जातियाँ -कोली, कुर्मी, कहार, चमार, जाटव,भंगी,दुसाध आपस में कटे-कटे और कच्ची-पक्की की प्राचीरों में ब्राह्मणीय अभिजात्यता के शिकार हैं।(पृ? 153)
पुस्तक के दो अंतिम निबंध हैं- 'अर्थयुग:अर्थहीन विश्वबंधुत्व' और 'दलित काव्य का यथार्थ'। इन दोनों निबंधों में दलित कविता के ओजस्वी स्वर को पकड़ने का प्रयास किया गया है। बक़ौल आलोचक, 'कविता स्मृति के अनुसृजन और आकांक्षित भविष्य की अभिव्यक्ति है। दलित काव्य उन प्रस्थापनाओं की व्याख्या करता है जो मानव विरोधी हैं। अन्धश्रद्धा, आस्था की जगह गहन विश्लेषण और उसके विकास की सही दिशाओं,ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में साहित्यिक नियमों का अन्वेषण करने की दिशा में दलित कविता सन्नद्ध है।'(पृ? 166)
दलित कविता पाठक से सीधा संवाद है। कवि मलखान सिंह ने ठीक ही लिखा है-'मेहनतकश हाथ में/सब तंत्र होगा/मंच होगा/बाजुओं में दिग्विजय का जोश होगा/विश्व का आँगन/वृहद आँगन/हमारा घर बनेगा/हर अपरिचित पाँव भी/अपना लगेगा।'(दलित निर्वाचित कविताएँ, कंवल भारती, पृ? 52)
पुस्तक के अंतिम निबंध 'दलित काव्य का यथार्थ' में दलित कविता लेखन की गहरी पड़ताल की गई है। हिंदुओं की सामाजिक वास्तविकता को जस के तस रखने का प्रयास किया गया है। ब्राह्मणी सभ्यता ने दलितों को सत्ता व्यवस्था की मुख्य धारा में आने नहीं दिया। इस बात की साफ समझ दलितों को है। दर्दों की पांडुलिपियाँ अब सामने आ रही हैं- 'दलितों के दर्दों की पांडुलिपियाँ/हमारे समय/और दुनिया के/सबसे जरूरी/और सर्वोच्च सपनों की/सुरक्षा के समान है/जिन्हें सम्मान के साथ/सँजोये रखना/और सँजोकर चलना/भविष्य के पथ की/अपनी विजय/पक्की करने के लिए/सबसे अनिवार्य होगा।'(पृ? 186-87)
कुल मिलाकर 'दलित हिन्दी कविता का वैचारिक पक्ष' पुस्तक एक बड़े अभाव की पूर्ति करती है। पुस्तक में तटस्थ विवेचन की प्रवृत्ति सर्वत्र दिखाई पड़ती है। कुछ आग्रही दलितवादियों को यह तटस्थता खटक सकती है किन्तु आलोचकीय दृष्टि से ऐसा किया जाना श्रेष्ठता का नमूना हुआ करता है। इसके लिए डॉ श्यामबाबू बधाई के पात्र हैं।