- जाहिद खान
रांगेय राघव का अध्ययन बेहद व्यापक था, वे अपने आसपास और समाज के बीच से भी लेखन के सूत्र तलाशते रहते थे। सिर्फ कोई एक सूत्र या विचार उनके लेखन को आकार दे देता। रांगेय राघव के कई चर्चित उपन्यास और कहानियां समाज के बीच से ही निकलकर आई हैं। नटों के जीवन पर 'कब तक पुकारूं' और लोहपीटे या गड़रिया लोहारों पर उन्होंने 'धरती मेरा घर' जैसे क्लासिक उपन्यासों की रचना कर दी थी। 'कब तक पुकारूं' का नायक करनट 'सुखराम' से वे अपनी जिंदगी में मिले थे।
रांगेय राघव हिंदी के बड़े रचनाकारों में से एक हैं। वे विलक्षण रचनाकार थे, जिनके लिए लिखना ही जीवन था। उन्होंने कम उम्र में विपुल लेखन किया। रांगेय राघव को महज उनचालीस साल उम्र मिली और उन्होंने इतने ही उपन्यास लिखे। उनकी कुल किताबों की संख्या 100 से ज्यादा है। अध्ययन के शुरूआती 25 साल अलग कर दें, तो उन्होंने महज 14 सालों में इतना सारा काम किया। रांगेय राघव की मातृभाषा हिंदी नहीं थी, लेकिन वे हिंदी के लिए अपनी आखिरी सांस तक कुर्बान रहे। उन्होंने भारतीय परम्परा, संस्कृति और कला का मूल्यांकन मार्क्सवादी नजरिए से किया। अपने लेखन से दलित, शोषित, वंचितजनों में एक नई चेतना विकसित की।
उत्तर प्रदेश में आगरा के बागमुज्जफर खां इलाके में 17 जनवरी, 1923 को एक तमिल भाषी आयंगर परिवार में जन्मे तिरूमल निम्बाक्कम वीर राघव ताताचार्य का नाम रांगेय राघव कैसे पड़ा, उन्हीं की जबानी,''मेरा एक नाम तो टी.एन.वी. आचार्य और दूसरा वीर राघव था। मैं कोई वीर था नहीं और टी. एन. वी. हिंदी के लिए उपयुक्त नाम नहीं था। मेरे पिता का नाम रंगाचारी था, अत: मैंने अपना नाम रंगा का बेटा रांगेय राघव कर लिया।'' पन्द्रह साल की छोटी उम्र से ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। यही नहीं आजादी के आंदोलन में जब भी मौका मिलता, वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की मदद करते। नौजवानी में अंग्रेजी कहानियों से प्रभावित होकर, उन्होंने 'अंधेरी की भूख' नाम का कहानी संग्रह लिख डाला था।
साल 1944 में आया 'अजेय खंडहर', रांगेय राघव का पहला खंडकाव्य था। इस खंडकाव्य में उन्होंने स्तालिनग्राद में लड़े गए युद्ध में लाल सेना की बहादुरी और नाजियों की बर्बरता की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति की थी। स्तालिनग्राद के संघर्ष को उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया था। रांगेय राघव की आला तालीम आगरा के सेंट जोंस कॉलेज और आगरा कॉलेज से हुई। 'गोरखनाथ और उनका युग' विषय पर उन्होंने पीएचडी की। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद रांगेय राघव ने लेखन को ही अपनी आजीविका और समाज सुधार का साधन बनाया। रांगेय राघव के चाहने वाले और आलोचक दोनों ही उनके लिखने की तेज रफ्तार पर कहते थे,''रांगेय राघव तौलकर लिखते हैं। उनकी अंगुलियों में जादू है।'' इस पर रांगेय राघव का जवाब होता था, ''जादू मेरी अंगुलियों में नहीं, शायद उन कागजों में है, जिन पर मैं लिखता हूं। क्या लिखता हूं और कैसा लिखता हूं, यह आप जानें।'' जब वे बीमार हो गए, तब भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। उपन्यास 'पतझर' और 'आखिरी आवाज' का लेखन उन्होंने डिक्टेशन के जरिये किया।
साल 1946 में आया 'घरौंदे' रांगेय राघव का पहला उपन्यास है। इसी साल बंगाल अकाल पर उनका एक और उपन्यास 'विषादमठ आया। 'मुर्दों का टीला' वह उपन्यास है, जिससे रांगेय राघव को देशव्यापी प्रसिद्धि मिली। ईसा से 3500 वर्ष पूर्व मोअन-जो-दड़ो की सभ्यता को केन्द्र बिंदु बनाकर लिखे गए इस उपन्यास में उनका विस्तृत अध्ययन देखते ही बनता है। 'अंधेरे के जुगनू', 'प्रतिदान', और 'चीवर' में ऐतिहासिक और पौराणिक किरदारों के इर्द-गिर्द उन्होंने उपन्यास बुने हैं। उनका ऐतिहासिक उपन्यास 'महायात्रा' दो खंडों 'अंधेरा रास्ता' एवं 'रैन और चंदा' शीर्षक से है। 'अंधेरा रास्ता' में जहां प्रागैतिहासिक काल वर्णित है, तो वहीं 'रैन और चंदा' में उन्होंने जनमेजय से लेकर अजातशत्रु तक यानी बर्बर दासप्रथा से सामंती व्यवस्था के उदय तक की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों का ब्यौरा दिया है।
'महायात्रा' को वे तेरह खंडों में लिखना चाहते थे। इन उपन्यासों के अलावा रांगेय राघव ने कई जीवनीपरक उपन्यास कृष्ण पर 'देवकी का बेटा', बुद्ध-'यशोधरा जीत गई', तुलसी-'रत्ना की बात', कबीर-'लोई का ताना' और भारतेंदु पर 'भारती का सपूत' आदि भी लिखे।
'एक छोड़ एक', 'जीवन के दाने', 'साम्राज्य का वैभव', 'अधूरी मूरत', 'अंगारे न बुझे', 'इंसान पैदा हुआ' आदि रांगेय राघव के प्रमुख कहानी संग्रह हैं। साल 1943-44 में बंगाल में जब सदी का भयंकर अकाल पड़ा, तो रांगेय राघव ने न सिर्फ यह देखने-जानने-समझने के लिए बंगाल की यात्रा की, बल्कि इस पूरी यात्रा में उन्होंने जो जाना-भोगा उसे रिपोर्ताज के तौर पर लिखा। ये रिपोर्ताज उस वक्त की चर्चित पत्रिकाओं 'हंस' और 'विशाल भारत' पत्रिका में सिलसिलेवार प्रकाशित हुए। बाद में यह रिपोर्ताज 'तूफानों के बीच' किताब की शक्ल में आए। 'तूफानों के बीच' हिंदी साहित्य का पहला रिपोर्ताज माना जाता है। इस रिपोर्ताज में रांगेय राघव ने बड़े ही संवेदनशील तरीके से अकाल को चित्रित किया है।
रांगेय राघव एक साहित्यकार के साथ-साथ संस्कृतिकर्मी भी थे। वे 'आगरा कल्चरल स्क्वैड' से भी जुड़े रहे। बाद में जब आगरा इप्टा का गठन हुआ, तो वे इसके सक्रिय सदस्य हो गए। इप्टा से रांगेय राघव अपने आखिरी समय तक जुड़े रहे। एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह वे इप्टा के आयोजनों में शिरकत करा करते थे। बंगाल अकाल पर उन्होंने कई जज्बाती और जोशीले जन गीत और एक नृत्य नाटिका लिखी। उनके जनगीत ''टेम्स हो या यांक्सी क्यांग/वोल्गा हो या गंगा हो/सबकी एक लड़ाई है/दुनिया की आजादी की'', ''गांव-गांव नगर-नगर में आज यही ललकार उठे/परदेशी का राज न हो, बस यही हुंकार उठे'' और ''बापू बोल-बोल/यह है देश की पुकार/जिन्ना बोल-बोल...'' उस समय देश भर में काफी लोकप्रिय हुए। इप्टा के कलाकारों के साथ वे खुद ये गीत गाते थे। इप्टा की प्रस्तुतियों के जरिए उन्होंने बंगाल अकाल पीढ़ितों के लिए चंदा इकठ्ठा करने का काम भी किया। गोवा के मुक्ति आंदोलन पर लिखा उनका पूर्णकालिक नाटक 'आखिरी धब्बा' आगरा इप्टा द्वारा अनेक बार मंचित हुआ। नाटक के गीत, संवाद और छाया अभिनय हर चीज मशहूर हुई। खास तौर पर इस नाटक में इस्तेमाल गीत जो शैलेन्द्र, राजेन्द्र रघुवंशी और खुद रांगेय राघव ने लिखे थे।
अंग्रेजी, संस्कृत भाषा के बेहतरीन जानकार होने के चलते रांगेय राघव ने अनुवाद भी खूब किए। शेक्सपियर के तकरीबन सभी नाटकों का उन्होंने अनुवाद किया। इसके अलावा संस्कृत नाटक 'मेघदूत', 'ऋतुसंहार', 'मृच्छकटिकम' और 'दशकुमारचरित' का उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद किया। इसके अलावा दुनिया की अलग-अलग विषयों की कहानियों का रूपांतर कर उनका संकलन किया। हालांकि ये अनुवाद, रूपांतर उन्होंने आर्थिक परेशानियों की वजह से ज्यादा किए। ताकि इससे उनके परिवार को कुछ आर्थिक मदद हो सके। रांगेय राघव को अलग-अलग विषयों पर लिखने में महारथ हासिल थी। एक तरफ कोई ऐतिहासिक उपन्यास लिख रहे हैं, तो साथ ही कहानियां भी चल रही हैं।
दिमाग में कोई अनूठा विषय आया, तो नाटक भी हो गया। कविताएं लिख ही रहे हैं। रांगेय राघव के दोस्त श्रवण कुमार ने एक बार उनसे पूछा, ''भैय्या जी, साहित्य में आपके कितने रूप हैं ?'' इस सवाल पर उनका जवाब था,''तीन। जब मैं कविता लिखता हूं, तो मानो फूल चुनता हूं। तब मैं एक माली हूं। और जब कहानी-उपन्यास लिखता हूं, तो भावों की भूमि जोतकर उसमें सृजन के बीज बोता हूं। तब मैं एक किसान हूं। किंतु जब मैं समाजशास्त्र आदि लिखता हूं, तो घास काटता हूं, तब मैं एक मजदूर हूं।''
रांगेय राघव का अध्ययन बेहद व्यापक था, वे अपने आसपास और समाज के बीच से भी लेखन के सूत्र तलाशते रहते थे। सिर्फ कोई एक सूत्र या विचार उनके लेखन को आकार दे देता। रांगेय राघव के कई चर्चित उपन्यास और कहानियां समाज के बीच से ही निकलकर आई हैं। नटों के जीवन पर 'कब तक पुकारूं' और लोहपीटे या गड़रिया लोहारों पर उन्होंने 'धरती मेरा घर' जैसे क्लासिक उपन्यासों की रचना कर दी थी। 'कब तक पुकारूं' का नायक करनट 'सुखराम' से वे अपनी जिंदगी में मिले थे। उससे करनटों की जिंदगी को न सिर्फ उन्होंने बारीकी से जाना था, बल्कि नटों की बस्ती में जाकर उन्हें रू-ब-रू भी देखा था। यही वजह है कि उपन्यास के किरदार और हालात यथार्थ के करीब दिखलाई देते हैं।
रांगेय राघव का मानवता और वैश्विक भाईचारे में गहरा यकीन था। उनके मन में एक ऐसे समाज की कल्पना थी जिसमें असमानता, अत्याचार और शोषण न हो। महिलाओं और दलित, वंचितजनों को उनके अधिकार मिलें। एक वर्गविहीन समाज जिसमें न कोई छोटा, न कोई बड़ा हो। जाति, धर्म, लिंग, रंग, भाषा और नस्ल के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव न हो। अपने आखिरी समय में रांगेय राघव 'बाल्मीकि रामायण' का हिंदी पद्यानुवाद 'राघवायण' कर रहे थे। उनके दिल में हमेशा एक चाहत रही कि वे एक महाकाव्य लिखें। उन्हें लोग उपन्यासकार की बजाय कवि के तौर पर जानें। 'नवभारत टाइम्स' में इस पद्यानुवाद के कुछ सर्ग छपे भी, जो पाठकों को बेहद पसंद आए। लेकिन रक्त कैंसर से 12 सितम्बर, 1962 को मुंबई में उनकी असमय मौत से यह महत्वाकांक्षी काम पूरा नहीं हो पाया।
संदर्भ : 17 जनवरी, कथाकार
रांगेय राघव की जयंती
महल कॉलोनी, षिवपुरी मप्र
मो.: 94254 89944