• जिले में फसलों के अवशेष जलाने पर पूर्णत: प्रतिबंध, क्या अमल करा पाएगा प्रशासन!

    धारा-144 के तहत जिला दण्डाधिकारी श्रीमती चौहान ने जारी किया आदेश। आदेश के उल्लंघन पर धारा-188 के तहत होगी पुलिस कार्रवाई, पर्यावरण मुआवजा भी अदा करना होगा। हर वर्ष इस तरह के आदेश दिए जाते हैं सैटेलाइट इमेज में घटनाएं साबित होने पर भी कार्रवाई शून्य ही रहती है

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    ग्वालियर। जिले में फसलों के अवशेष मसलन गेहूँ की नरवाई इत्यादि जलाने पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया गया है। कोई भी किसान फसल कटने के बाद अपने खेत पर फसल के अवशेष नहीं जला सकेगा। साथ ही हार्वेस्टर मशीन संचालकों को हार्वेस्टर के साथ अनिवार्यत: स्ट्रारीपर (भूसा बनाने की मशीन) लगाकर कटाई करनी होगी। यदि कोई कृषक बिना स्ट्रारीपर के फसल काटने के लिये दबाब डालता है तो उसकी सूचना संबंधित पुलिस थाने, ग्राम पंचायत सचिव या ग्राम पंचायत निगरानी अधिकारी को देना होगी।  कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी श्रीमती रुचिका चौहान ने धारा-144 के तहत इस आशय का प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया है। 
     
    कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी श्रीमती चौहान ने फसल के अवशेष जलाने से फैलने वाले प्रदूषण पर अंकुश, अग्नि दुर्घटनाएँ रोकने एवं जान-माल की रक्षा के उद्देश्य से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के दिशा-निर्देशों के तहत यह आदेश जारी किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि आदेश का उल्लंघन पर भारतीय दण्ड विधान की धारा-188 के तहत कार्रवाई होगी। साथ ही किसी ने अवशेष जलाए तो उसे पर्यावरण मुआवजा भी अदा करना होगा। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि दो एकड़ से कम भूमि धारक को 2500 रूपए प्रति घटना, दो एकड़ से अधिक व पाँच एकड़ से कम भूमि धारक को पाँच हजार रूपए प्रति घटना एवं पाँच एकड़ से अधिक भूमि धारक को 15 हजार रूपए प्रति घटना पर्यावरण मुआवजा देना होगा। 
     
    आपको बता दे किस तरह का आदेश हर वर्ष जारी होता है उसके बावजूद भी नियमों को तक पर रख खेतों में अवशेषों को जलाया जाता है आप शीशे को जलाने की ज्यादातर घटनाएं डबरा और पितरवार क्षेत्र में होती हैं जिसकी आंकड़े सैटेलाइट इमेज के द्वारा भी जारी किए जाते हैं लेकिन प्रशासन की लापरवाही के चलते एनजीटी के इतने सख्त आदेश हवा में उड़ जाते हैं। देखना होगा कि इस वर्ष भी यह आदेश कागज पर ही सिमट कर रह जाता है या हकीकत में पर्यावरण संरक्षण के हित में कुछ कार्यवाही भी होती है।

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