आमतौर पर साक्षरता की परिभाषा पढे-लिखे शहरी माहौल में रहने वाले नजरिए से की जाती है।
हमारे देश में आजादी के पहले से ही प्रौढ़ साक्षरता के बहुत से कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
इन कार्यक्रमों ने-और उसके आकलन का तरीका भी एक तरह के फ्रेम में बंधा हुआ रहा है।
इसीलिए हमारी चिन्ता निरक्षरता की समस्या का हल, अक्षर और अंक ज्ञान देने तक ही सीमित होती है।
साक्षरता के अर्थ को इतने सीमित मायनों में देखने की वजह से ही इस मुद्दे पर बहुत से सवाल उठाए जाते हैं।
और इसे भी निर्माण, विकास और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के साथ तौला जाता है।
दरअसल साक्षरता आंदोलन अन्य योजनाओं की तरह आंकड़े जमा खर्च का हिसाब रखने वाला आंदोलन हो ही नहीं सकता।
इसमें मनुष्य और मनुष्य के अपने आस-पास के, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक प्राकृतिक माहौल के साथ संबंधों का विश्लेषणात्मक नजरिया होना जरूरी है।
साक्षरता कार्यक्रम को संचालित करने वालों के दिमाग में यह बात साफ होनी चाहिए।
कि लोग साक्षर हों और अपने अंक ज्ञान और अक्षर ज्ञान को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकें।
इसके जरिए लोगों को संगठित करना, और उनके सोचने समझने का दायरा विकसित करना है।
इसमें सिर्फ प्रौढ़ों का पढ़ना लिखना ही नहीं बल्कि बच्चों की शिक्षा और खुशहाली, सभी के लिए स्वास्थ्य, जल और जमीन पर सबका हक, रोंजगार के समान अवसर, पूरी मजदूरी, महिलाओं की समानता और उनके अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों का बराबर बंटवारा और सामाजिक रुढ़ियां और कुरीतियां जो एक बड़े समूह को आगे बढ़ने से रोकती हैं के खिलाफ लोगों के सामूहिक कदम का प्रयास निहित है।
वास्तव में साक्षरता ऊपर से नीचे जाने वाली योजना मात्र नहीं है।
इसकी सार्थकता इस बात से है कि गांव स्तर पर बहुसंख्यक समुदाय की अभिव्यक्ति इतनी तीव्र और मुखर हो कि उनकी आवाज दिल्ली तक पहुंचे।
आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले की महिलाओं के शराब विरोधी आंदोलन ने इस बात की पुष्टि की है कि यदि साक्षरता की परिभाषा सही समझ के साथ लोगों तक पहुंच जाए तो इसमें नीति निर्धारकों की सोच बदलने की ताकत है।
इस ताकत को उभारने के लिए जरूरी है कि यह आंदोलन, आवश्यकता, रहन-सहन, बोल-चाल के साथ तालमेल बैठा कर चलाया जाए।
साक्षरता की परिभाषा में एक बात और है कि इस आंदोलन की जरूरत सिर्फ निरक्षरों के लिए नहीं है।
यह परम्परागत शिक्षा प्रणाली में शिक्षित बने लोगों की सोच बदलने के लिए भी आवश्यक है।
इस आंदोलन में जुड़कर लोगों को अपने तरीके से काम करने का मौका भी मिलता है।
हर आम आदमी चाहे वह निरक्षर हो या पढ़ा-लिखा हो, चाहे गाँववासी हो या शहर में रोजी-रोटी के संघर्ष से जुड़ा हो इस आंदोलन में जुड़कर देश के राज-काज में अपने मुद्दे को प्राथमिकता दिलाने का प्रयास कर सकता है।