• किसानों को क्यों नहीं समझा पा रही सरकार

    किसानों को वह विकल्प समझ में भले आज न आया हो, लेकिन सरकारी व राजनीतिक चालों से दामन बचा कर अगर वे कुछ और वक्त तक चलते रह सके तो पहुंचेंगे गांधी के करीब ही

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    -  प्रेरणा

    किसानों को वह विकल्प समझ में भले आज न आया हो, लेकिन सरकारी व राजनीतिक चालों से दामन बचा कर अगर वे कुछ और वक्त तक चलते रह सके तो पहुंचेंगे गांधी के करीब ही। वजह है कि गांधी भी किसान व किसानों का जीवन ही असली जीवन मानते थे, उसी तरह जीते थे। उनका आखिरी आदमी, जिसका एक ताबीज बना कर वे हमें दे गये हैं, वह दूसरा कोई नहीं, भारत का एक आम किसान ही तो है। प्रधानमंत्री ईमानदारी से जब तक यह स्वीकार नहीं करेंगे, किसानों को समझा भी नहीं सकेंगे।

    आखिर हमारे प्रधानमंत्री और उनकी सरकार कोई 40 दिनों से लगातार समझाते हुए भी हमारे किसानों को क्यों  नहीं समझा पा रही है कि उनकी सरकार के बनाए तीनों कृषि कानून खेतों में अनाज नहीं, सोना उगाएंगे? सिर्फ मंत्री, प्रधानमंत्री ही नहीं, उनके कितने ही पैदल सिपाही व नौकरशाह इसी काम में एड़ियां रगड़ रहे हैं, लेकिन किसान नहीं समझ रहे हैं तो नहीं समझ रहे हैं। इसका राज क्या है? मैं खोजती हूं तो पाती हूं कि इसका जवाब आज नहीं, पिछले छ: साल की बातों में मिलता है।

    मई 2014 में मोदीजी प्रधानमंत्री बने फिर बातें बनाने का दौर शुरू हुआ जो आज तक जारी है।  जिन जुमलों में लोग सबसे ज्यादा फंसे, वे थे - कालाधन, करोड़ों को रोजगार, विकास, महंगाई का खात्मा और पाकिस्तान को धूल चटाना। धमाके के साथ तुरंत और ठोस निर्णय लेने वाले बांके की अपनी छवि बनाने के लिए उनके पास अकूत धन था, प्रचार-तंत्र था और चापलूसों की फौज थी। बस, एक-के-बाद-एक कई मास्टर स्ट्रोक लगाए प्रधानमंत्रीजी ने।

    सबसे पहले आई नोटबंदी। करीब एक साल तक, जब तक 'रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया' (आरबीआई) की रिपोर्ट नहीं आ गई, एक ही बात लगातार दोहराई गई कि यह 'तलवार' एक साथ कालेधन का, आतंकवादियों का और काले धंधेबाजों का सर कलम कर देगी।  हुआ इनमें से एक भी नहीं। आज काला धन हमारे सिस्टम में पहले से ज्यादा है, आतंकी हमलों में मारे जा रहे हमारे जवानों की संख्या पहले कभी इतनी नहीं थी जितनी आज है। सन् 2019 का चुनाव जीतने के बाद नोटबंदी के ऐसे नतीजे सामने आने लगे जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

    ऐसा नहीं है कि किसी ने उन्हें सावधान नहीं किया था। 'आरबीआई' के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन को इसी कोशिश में अपना पद ही छोड़ना पड़ा था। नोटबंदी से नकदी पर चलने वाले हमारे छोटे उद्योगों का खात्मा हुआ, मजदूरों का पलायन हुआ और आजादी के बाद की सबसे बड़ी बेरोजगारी हमारे सर पर आ गिरी।

    दूसरा मास्टर स्ट्रोक हुआ- 'गुड्स एण्ड सर्विसेस टैक्स ' (जीएसटी)!  कई राज्य सरकारें समझाती रह गईं कि हमारी व्यवस्था अभी इसके लिए तैयार नहीं है, लेकिन तेवर यह रहा कि जो हमसे सहमत नहीं है, वह विपक्ष का टट्टू है। 'जीएसटी' को आधी रात, जबरन देश पर लाद दिया गया। संसद के विशेष सत्र में प्रधानमंत्री ने इसे  'ऐतिहासिक उपलब्धि' कहा तो सारे जंगल में सिआर हुआं-हुआं करने लगे। कहा गया : 'एक देश- एक कर' की सहूलियत से व्यापार करने में आसानी होगी (ईज ऑफ डुइंग बिजनेस) और देश में बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी का निवेश होगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि विपक्ष व्यापारियों को इसके खिलाफ भड़का रहा है।

    आज तीन साल बाद नतीजा सामने है, विपक्ष नहीं भड़का रहा, सरकार लोगों को मूर्ख बना रही है। जो छोटे-मंझोले उद्योग-व्यापार नोटबंदी की मार किसी तरह झेल गए थे, 'जीएसटी' ने उनकी कमर तोड़ दी। चालाक उद्योगपतियों ने इस खोटे 'जीएसटी' का तोड़ निकाल लिया और टैक्स के जाल से आराम से बाहर छिटक गए। आपने पिछले दिनों बगैर बिल के कितना सामान खरीदा है, इसकी गिनती करेंगे तो मेरी बात समझ में आ जाएगी।

    विकास हो रहा है और देश आगे बढ़ रहा है, यह दिखाने के लिए सरकारी आंकड़ों के साथ ऐसी छेड़छाड़ की गई कि आंकड़ों और उनकी विश्वसनीयता ने भी दम तोड़ दिया। नतीजे में कई आंकड़ा-विशेषज्ञों ने विरोध में इस्तीफा दे दिया। हमारे नकली, बनावटी आंकड़े आज सारे संसार में हंसी के पात्र बन गये हैं।

    तीसरा मास्टर स्ट्रोक हुआ- पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक। एक बार यह मान भी लें कि भारत ने पाकिस्तान को मजा चखा दिया तो मजा आया किसे? जवानों की जान की कीमत पर चुनाव जीतने वालों को मजा आया। किसी भी युद्ध से किसी देश को कुछ हासिल नहीं होता है। सर्जिकल स्ट्राइक के साथ भी ऐसा ही हुआ। देश आसपास के खतरों से घिरा ही हुआ है। लोग मुसीबत में हैं और बेरोजगारी और छोटे उद्योगों पर पड़ी मार की वजह से सरकार की कर से होने वाली कमाई कम होती जा रही है।

    फिर प्रधानमंत्री ने सबको अंधेरे में रख कर कश्मीर से धारा- 370 खत्म कर दी। सरकार खुद से अपनी पीठ थपथपा रही है, कश्मीर की और देश की पीठ झुकती चली जा रही है। फिर सरकार ने उस नागरिक की वैधता पर ही सवाल खड़ा कर दिया जिसके वोट से वह बनी है। अगर एक भी नागरिक अवैध है तो उसके वोट से बनी सरकार वैध कैसे हो सकती है, इस सवाल का जवाब कहीं से नहीं आया। फिर आया कोविड। आनन-फानन में की गई देशबंदी! यह ऐसा वार हुआ कि जो कुछ भी बचा-खुचा था, वह सब टूटकर बिखर गया। सरकार के पास कोई 'प्लान बी' नहीं था। यहां भी वही सच सामने आया कि यह सरकार न तो अपनी गलतियां स्वीकारती है, न अपनी गलतियों से सीखती है।

    इतने सारे अनुभवों की पृष्ठभूमि में किसान आंदोलन शुरू हुआ। सरकार की सारी चालबाजियां, उसकी जुमलेबाजी, उसका झूठ देश देख चुका था, किसान समझ चुके थे। इसलिए उससे निबटने की पूरी रणनीति बना कर वे सामने आए। नतीजा यह हुआ कि सरकार को जिस तरह घुटने टेकने पर आज तक कोई मजबूर नहीं कर सका था, वैसा किसानों ने कर दिया। 30 दिसंबर को हुई बातचीत से पता चला कि सरकार किसानों की दो-एक मामूली-सी बातें स्वीकार करने को तैयार है, लेकिन किसान आंदोलन उन मामूली-सी बातों के लिए तो है नहीं! न किसान अपनी मूल मांग छोड़ने को तैयार हैं, न सरकार अपनी मूल चालबाजी छोड़ने को तैयार है।

    पिछले छह साल या कहूं कि तीस सालों की सरकारी नीतियों की एक ही दिशा रही है- छोटे और मझोले उद्योगों का खात्मा हो और बड़े उद्योगों के लिए कानूनी लूट की सहूलियत बने। गांधीजी ने यह दिशा सौ साल पहले ही देख व समझ ली थी और हम सबको सावधान करने के लिए 'हिंद-स्वराज्य' लिखा था।

    यह किताब वैकल्पिक राजनीति-अर्थनीति की गीता ही है। वहां जो विकल्प बताया गया है, वह आज भी तेज मशाल की तरह जल रहा है। उस मशाल को उठाने और जलाए रखने की जरूरत है। किसानों को वह विकल्प समझ में भले आज न आया हो, लेकिन सरकारी व राजनीतिक चालों से दामन बचा कर अगर वे कुछ और वक्त तक चलते रह सके तो पहुंचेंगे गांधी के करीब ही। वजह है कि गांधी भी किसान व किसानों का जीवन ही असली जीवन मानते थे, उसी तरह जीते थे। उनका आखिरी आदमी, जिसका एक ताबीज बना कर वे हमें दे गये हैं, वह दूसरा कोई नहीं, भारत का एक आम किसान ही तो है। प्रधानमंत्री ईमानदारी से जब तक यह स्वीकार नहीं करेंगे, किसानों को समझा भी नहीं सकेंगे।

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