आस्ट्रेलिया पर भारत की शानदार जीत पर देश गदगद है। युवा और कम अनुभवी खिलाड़ियों ने सारी बाधाओं को पार करते हुए सफलता हासिल की, उसकी खुशी स्वाभाविक है। लेकिन इस जीत पर भी राष्ट्रवाद का मुलम्मा चढ़ाया जा रहा है। नया भारत, जोशीला भारत, रणबांकुरे जैसे विशेषणों का इस्तेमाल हो रहा है। इसी नए भारत में डर का साम्राज्य कितनी तेजी से खड़ा कर दिया गया है, इसकी एक बानगी भी कल देखने मिल गई। इधर भारत की जीत का जश्न था, उधर राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस थी, जिसमें वे कृषि कानूनों से लेकर अर्णवगेट तक सारे मसलों पर सरकार को कटघरे में खड़े करते नजर आए। इस प्रेस कांफ्रेंस की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए गए कि क्रिकेट में मिली सफलता के वक्त इसे क्यों आयोजित किया गया।
हालांकि जिन पत्रकारों के लिए क्रिकेट से भी बढ़कर मुद्दे मायने रखते हैं, वे इस पत्रवार्ता में पहुंचे। जो तस्वीर सामने आई है, उसमें पत्रकारों का खासा जमावड़ा दिखाई दे रहा है, जो यह बताता है कि आप राहुल गांधी को पसंद या नापसंद कर सकते हैं, लेकिन उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। वैसे भी बीते छह सालों में देश में सरकार की ओर से प्रेसवार्ताओं का अकाल ही हो गया है।
मोदीजी ने यह भी मुमकिन कर दिखाया है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सांसद और प्रधानमंत्री होने के बावजूद पत्रकारों को सवाल पूछने का मौका नहीं दे रहे हैं और उसके बावजूद मीडिया उनके ही गुणगान में लगा है। केवल अपवाद स्वरूप कुछ पत्रकार सवाल पूछते हैं, जिनके जवाब देने की जहमत सरकार नहीं उठाती। भाजपा को इस बात की भी तकलीफ है कि राहुल गांधी क्यों प्रेसवार्ता करते हैं या सवाल पूछते हैं। इसलिए 19 जनवरी की उनकी प्रेसवार्ता में पत्रकार सवाल पूछें इससे पहले ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सवाल दाग दिए। वैसे इस लंबी प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी ने कुछ बेहद जरूरी सवाल उठाए, जो कायदे से सरकार को उठाने चाहिए थे।
अर्णवगेट में उल्लिखित बालाकोट हवाई हमले पर उन्होंने कहा कि इस तरह की चीजें केवल कुछ लोगों की जानकारी में होती हैं, जिसमें प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री, रक्षा सचिव, वायुसेना प्रमुख और सैन्य प्रमुख शामिल होते हैं। इसलिए अगर इस तरह का कोई रहस्य किसी पत्रकार को लीक हो गया है, तो यह आधिकारिक गोपनीयता कानून का उल्लंघन है। यह एक देश की खुफिया जानकारी को लीक करने का मामला है। उन्होंने आरोप लगाया, 'इन्हीं पांच लोगों में से किसी एक ने सूचना दी होगी। यह एक आपराधिक कृत्य है।'
राहुल गांधी ने जांच की मांग भी की, लेकिन यह आशंका भी जतला दी कि इसकी जांच शायद नहीं हो। उनकी यह आशंका बेमानी नहीं है। सरकार ने अब तक न तो इन चैट्स का खंडन किया है, न अपनी ओर से किसी तरह की जांच की बात की है। बेशक यह मुंबई पुलिस की चार्जशीट का एक हिस्सा है, लेकिन इसमें जिन गंभीर बातों और घटनाओं का उल्लेख है, वह किसी भी सचेत, संवेदनशील सरकार को सक्रिय करने के लिए काफी है। पर देश में इस वक्त ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, मानो बालाकोट हवाई हमले या कश्मीर से 370 हटने की बातें पहले से किसी को पता होना, कोई बड़ी बात थी ही नहीं। राम मंदिर या कश्मीर की तरह बालाकोट तो भाजपा के चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा नहीं था कि देश को पता है कि एक न एक दिन तो ऐसा होना ही था।
यह देश की रक्षा से जुड़ा गंभीर मामला था, जिसका इस्तेमाल सत्ता और पूंजी के बड़े खिलाड़ी अपने फायदे के लिए कर रहे थे। इस तरह की जानकारी लीक कर देश को बड़े खतरे में डाला गया था और अब भी उस पर कोई कार्रवाई न कर सरकार फिर देश की सुरक्षा के साथ समझौता कर रही है। अर्णव गोस्वामी अपने चैट कांड को पाकिस्तान की साजिश बता रहे हैं। राहुल गांधी के लिए कह रहे हैं कि वे होते कौन हैं, उनसे सवाल पूछने वाले। उनकी यह सीनाजोरी अब चकित नहीं करती, दुखी करती है।
अर्णव जानते हैं कि अब देशप्रेम का मतलब सरकार का समर्थन हो चुका है। और जो ऐसा न करे, वो देशविरोधी हो चुका है। राष्ट्रभक्ति की इस नई परिभाषा में अब सारे तर्क खोखले और बेमानी हो चुके हैं। हम एक मुर्दा कौम में तब्दील कर दिए हैं, जिंदा होने का एहसास हमें तभी होता है, जब हमें चेताया जाता है कि हमारे धर्म पर खतरा है। अदृश्य ईश्वर के लिए हमारी भुजाएं फड़कती हैं और जीते-जागते देश को बचाने के नाम पर हमारा खून सूख जाता है। राहुल गांधी इस नीमबेहोशी में सवालों से दिल धड़काने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें ही गलत ठहराने की चालें चली जा रही हैं। वे फिर भी ये नहीं कह रहे हैं कि मैं तो झोला उठाकर चला जाऊंगा। वे गोली खाने की बात करते हैं, पलायन करने या डरने की नहीं। देखना है कि आत्मनिर्भर नया भारत झोले या गोली में से किसे चुनता है।