- जगदीश रत्तनानी
भारत को इस बदलाव को कैसे देखना चाहिए? यह सर्वविदित है कि असमानता बढ़ी है। इससे भी बदतर बात यह है कि उदारीकरण ने जिन हितों को कमजोर करने की मांग की, वे अभी भी मौजूद हैं तथा पहले से कहीं अधिक तरीकों और क्षेत्रों में ज्यादा शक्तिशाली हैं। उनमें से एक है कारोबार और राजनीतिक गठजोड़ जो अत्यधिक केंद्रित और गैर-पारदर्शी राजनीतिक चंदे की ओर रुझान से आगे बढ़ता है।
पिछले साल ही संसद में शादियों और विशेष अवसरों पर 'फिजूलखर्ची’ को सीमित करने के लिए एक निजी सदस्य के विधेयक पर चर्चा हुई थी। कांग्रेस सांसद जसबीर सिंह गिल ने अपने विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के बयान में लिखा- 'शादी स्टेटस सिंबल और शो-ऑफ का प्रतीक बन गया है। इस अनुचित और फिजूलखर्ची के खिलाफ खड़े होने का यही सही समय है।’ 2016 और 2017 में भी इसी तरह के विधेयक अन्य सांसदों द्वारा पेश किए गए थे। इस तरह के निजी सदस्य विधेयकों में से किसी के भी पारित होने की उम्मीद नहीं थी लेकिन ये विधेयक रिकॉर्ड पर कुछ टिप्पणियां छोड़ गये हैं।
रिलायंस समूह के अध्यक्ष मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी के 'प्री-वेडिंग’ समारोह की चकाचौंध से देश अभी उबर रहा है लेकिन इस संदर्भ में हमारी शादियों में मितव्ययिता का यह प्रयत्न कितना विचित्र लगता है? अंबानी परिवार ने इन उत्सवों के लिए मुंबई में अपनी 27 मंजिला हवेली एंटीलिया के बजाय जामनगर को प्राथमिकता दी और उसी समय अनंत अंबानी को एक संवेदनशील व पशु-प्रेमी व्यवसायी के रूप में लॉन्च किया जिसने रिलायंस की जामनगर रिफाइनरियों के पास एक निजी हाथी अभयारण्य स्थापित किया है। इसका मुख्यालय मुंबई में है। यहीं पर समूह के संस्थापक और अनंत के दादा धीरूभाई अंबानी ने पहली बार अपनी पहचान बनाई थी।
उन दिनों गगनचुंबी इमारतों के मुकाबले झुग्गियों के रूप में मुंबई का पिक्चर पोस्टकार्ड इस्तेमाल किया जाता था। एक रोजमर्रा की कहानी- दो पक्ष जो फिर भी एक-दूसरे को देखते थे और नियमित रूप से रास्ते पार करते थे। सफलता का विचार 21वीं मंजिल पर बैठा अमीर आदमी था (तब एंटीलिया नहीं बना था), दिवंगत संपादक और व्यंग्यकार बेहराम कॉन्ट्रैक्टर का सिक्का चलता था जो 'बिज़ीबी’ के नाम से लिखते थे जिसमें बॉम्बे के उतार-चढ़ाव के तीक्ष्ण संकेत थे। जिंदगी शाब्दिक और रूपक रूप से ऊंची वृद्धि को आगे बढ़ाने के बारे में थी। बॉम्बे की लोककथाएं उन कुछ लोगों से बनी थीं जो नाटकीय रूप से आकाश पर उदित हुए थे। इन लोगों में धीरूभाई अंबानी भी थे।
21वीं सदी के बदले हुए भारत में वह पिक्चर पोस्टकार्ड अब दो तस्वीरों में विभाजित है जो अब एक-दूसरे का सामना नहीं करते हैं। एक में चमक-धमक, शानो-शौकत वाली लगभग 1,000 करोड़ रुपये के कथित खर्च वाली अंबानी प्री-वेडिंग के रूप में चित्रित किया गया है। सिर्फ इस आयोजन के लिए जामनगर एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे में बदल गया क्योंकि सारे विश्व से हवाई जहाज विशेष मेहमानों को दावत देने और मौज-मस्ती करने के लिए यहां ला रहे थे। इस प्री-वेडिंग ने एक भारतीय मैग्नेट की शक्ति और पहुंच का भी प्रदर्शन किया जिसके निमंत्रण ने दुनिया के कुछ सबसे बड़े व्यापारिक आइकन को निजी जेट में यहां आने को मजबूर कर दिया। दूसरी तस्वीर हमारी वास्तविकता है। एक ऐसे राष्ट्र की जो तेजी से विकास कर रहा है लेकिन 'किसी भी वित्तीय कठिनाई को कम करने’ के लिए अभी भी लगभग 60 प्रतिशत लोग मुफ्त खाद्यान्न पर जी रहे हैं। सरकार ने कहा है कि मुफ्त खाद्यान्न योजना पर पांच साल के लिए 11.8 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जाएगी। वैश्विक स्टारडम की राह पर बढ़ रहे एक निजीकरण, उदारीकृत भारत में दो विश्वों को एक साथ चित्रित किया गया है।
सर्वव्यापी रूप में परिभाषित इस बॉम्बे पोस्टकार्ड ने शहर को शर्मिंदा किया है जो भारत का वित्तीय केंद्र भी है। यह फे्रम लोकप्रिय संघर्षों के लिए भी एक ट्रिगर था जिसमें कुछ ने तत्कालीन शक्तिशाली मिल-मालिकों और अन्य को चुनौती दी और जो झुग्गीवासियों के प्रतिष्ठित जीवन जीने के अधिकारों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट तक गए।
जामनगर के इस पिक्चर पोस्टकार्ड के दायरे में कुछ अन्य कहानियां हैं जो नए भारत में एक विषय के रूप में उभरी हैं। ये बेमिसाल आडम्बर और शक्ति की कहानियां हैं, एक कुलीन स्थान जहां सारी ताकतें इस तरह काम करती हैं जैसे कि वह धरती पर और कहीं काम नहीं करती हैं। काम करने का तरीका भौतिक धन की तुलना से एकदम अलग होता है। प्री-वेडिंग के मौके पर पीआर के जरिए दिखाए गए समाचार शो के अतिरंजित समारोहों की बाढ़ से संकेत मिलता है कि यह कथा-कथन स्वयं उस तमाशे का एक हिस्सा था।
फिर भी, केवल आकार और फालतू के पैमाने से प्रेरित प्री-वेडिंग को बढ़ा-चढ़ाकर बताना और एक परिवार की एक घटना पर अधिक ध्यान केंद्रित करना एक गलती हो सकती है। कहानी केवल ध्यान आकर्षित करने का काम करती है जिसमें अभिजात वर्ग बड़ी संख्या में शामिल है, जहां शक्ति और विशेषाधिकार को घमंड के साथ दिखाया जाता है, जहां सुनहरे द्वारों के माध्यम से बाहर के जगत को अंदर से अलग किया जाता है। एक ही विषय के अलग अलग संस्करण विभिन्न स्तरों पर खेलते हैं।
उदाहरण के लिए, आज की मुंबई में सत्ता के दलालों और राजनीतिक रूप से जुड़े लोगों द्वारा निर्मित 70 मंजिलों की ऊंची इमारतों और लोगों को बड़े-बड़े दरवाजों और अन्य बेरीयरों से घेर दिया गया है जो बाहर की झुग्गियों को अंदर के जगमगाते स्विमिंग पूल से अलग करते हैं। गेट का प्रबंधन करने के लिए कलफ लगी सुरक्षा वर्दी में गार्ड तैनात हैं लेकिन प्रवेश द्वार पर काम करने वाले हाथ निश्चित रूप से झुग्गियों में रहने वालों के हैं।
जो अकल्पनीय सत्य है वह केवल बढ़ती असमानता नहीं है बल्कि इसका हमारे समाज, हमारी राजनीति और हमारी अर्थव्यवस्था के लिए क्या अर्थ है? इसकी बहुत अधिक छानबीन किए बिना उस असमानता की बढ़ती खाई का उत्सव है और उस असमानता की शांतिपूर्वक सहन करने की दी गई स्वीकृति है। उत्पन्न परिस्थिति पूरी तरह से अंबानी परिवार की वजह से नहीं है। हालांकि शीर्ष पर मौजूद एक प्रतिशत लोग विषमता में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं जबकि कहीं और व्यस्त रहने वाले 99 प्रतिशत लोग इन कहानियों का जश्न भी मना सकते हैं।
भारत को इस बदलाव को कैसे देखना चाहिए? यह सर्वविदित है कि असमानता बढ़ी है। इससे भी बदतर बात यह है कि उदारीकरण ने जिन हितों को कमजोर करने की मांग की, वे अभी भी मौजूद हैं तथा पहले से कहीं अधिक तरीकों और क्षेत्रों में ज्यादा शक्तिशाली हैं। उनमें से एक है कारोबार और राजनीतिक गठजोड़ जो अत्यधिक केंद्रित और गैर-पारदर्शी राजनीतिक चंदे की ओर रुझान से आगे बढ़ता है। असमता विशेषज्ञ लुकास चांसेल और थॉमस पिकेटी ने लिखा है कि-भारत ने पिछले तीन दशकों में शीर्ष एक प्रतिशत लोगों की आय हिस्सेदारी में सबसे अधिक वृद्धि देखी है। पिकेटी एट अल की विश्व आर्थिक रिपोर्ट 2022 में कहा गया है कि नीतिगत परिवर्तनों के कारण भारत अब दुनिया के सबसे असमान देशों में से एक है।
असमानता को ठीक करना कभी आसान नहीं था और इसके लिए कई बार शॉक ट्रीटमेंट देना जरूरी होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण त्रस्त अमेरिका ने शीर्ष आयकर दर 94 प्रतिशत कर दी थी और ऐसे समय में इस तरह के शॉक ट्रीटमेंट की आवश्यकता होती है। असमानता का संबंध शासन, स्थिरता, संस्थानों में विश्वास के क्षरण के मुद्दों से जुड़ा होता है और यह लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था की वैधता के लिए गंभीर निहितार्थ रखती है। फिर भी असमानता को ठीक करना तब तक असंभव है जब तक पहले यह मान नहीं लिया जाता कि जो कुछ चल रहा है वह मामलों की वांछनीय स्थिति नहीं है तथा यह देश और उसके नागरिकों के लिए स्थिर या टिकाऊ विकास का कारण नहीं बन सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)