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    पत्रकारिता का रास्ता मानवीयता और आत्मावलोकन का अवसर उपलब्ध कराता है। फिलहाल हमें मीडिया की साख की बेहद जरूरत है

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    - सेवाराम त्रिपाठी

    पत्रकारिता का रास्ता मानवीयता और आत्मावलोकन का अवसर उपलब्ध कराता है। फिलहाल हमें मीडिया की साख की बेहद जरूरत है। लेकिन उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं दखि रही उसमें जिम्मेदारी, गंभीरता और सामाजिक सरोकार क्रमश: लुप्त होते जा रहे हैं। मीडिया की नजर में जनजीवन और उसके कल्याण की तरफ होनी चाहिए। सत्ता के प्रति उसकी निगाह नियंत्रित और आलोचनात्मक होनी चाहिए। उसमें अपने सुख-समृद्धि से अलग जनता के प्रति संवेदहीनशीलता हो और निडरता भी।

    मैं देख रहा हूं कि भारतीय मीडिया में इस समय बहुत बड़बोलापन है। यह शायद इसलिए है कि मीडिया की आत्मा खोखली हो चुकी है। शायद इस ग्लानि पर परदा डाल ने के लिए ऊंचे स्वर में बात की जा रही है। इसी तरह से मीडिया अपने आप से कब तक छल करता रहेगा?' 

    - ललित सुरजन

    ललित जी ने मीडिया और अखबारों को लेकर बड़े महत्वपूर्ण तथ्य हमारे सामने रखे हैं। मीडिया में छल-कपट प्रपंच और धोखे बहुत ज्यादा हैं। कोई पत्रकार कितनी सच्चाई के साथ ऐसे मूल्यवान प्रश्नों को उठाने का साहस रखता है सोचकर हैरानी भर नहीं होती गर्व भी होता है। मीडिया कोई मिथक नहीं है बल्कि हमारे समय समाज और परिवेश की हकीकत होता है। उसका काम धांधलेबाजी से या नागरिकों को छकाकर नहीं चल सकता। कभी-कभी मैं पुरानी किताबें पढ़ने लगता हूं। हमारे वर्तमान में इतनी चमचमाहट है कि आंखें चौंधिया जाती हैं। क्या-क्या हो रहा इस दौर में। लगे हैं लोग अपने आपको प्रोजेक्ट करने में।

    किसी ने सच ही कहा है कि यश की कामना से हम लबालब लोग हैं। हमें हर हाल में कीर्ति चाहिए और प्रसिद्ध अपनी मुठ्ठी में। हम हर हाल में झण्डा फहराए जाने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। हमें न लज्जा, न हया, न शर्म हैं। इस मामले में हम सौ-सौ राहें तलाशना चाहते हैं। जिधर सुभीता दखिे उस रास्ते में चल पड़ें। फिलहाल रसूल हमजातोव का उपन्यास मेरा दाग़िस्तान पढ़ रहा हूं। उसका एक अंश देखें- 'पहाड़ी आदमी को दो चीजों की रक्षा करनी चाहिए-अपनी टोपी और अपने नाम की। टोपी की रक्षा वही कर सकेगा, जिसके पास टोपी के नीचे सिर है। नाम की रक्षा वह कर सकेगा, जिसके दिल में आग है।' है न पुख्ता बात। जो ऐसा नहीं कर पाएगा वह बचेगा ही नहीं।

    रायपुर से निकलने वाले अखबार  'देशबन्धु' के साठ साल के अन्तर्गत ललित सुरजन की पोस्ट्स की फिलहाल अंतिम किश्त से गुजर रहा हूं।  लेखमाला की पहली किश्त 11 अप्रैल 2019 को प्रकाशित हुई थी। कुछ प्रश्नों की झड़ी भी लगी रही। कोई भी अखबार मात्र लोकप्रियता के माध्यम से नहीं पहचाना जाना चाहिए, बल्कि उसे आदमी की संघर्षशीलता, जनपक्षधरता और मूल्यों की वास्तविकता से ही आंका जाना चाहिए। अखबार का हौसला हमेशा समस्याओं और उनके विकास के साथ जनता की उम्मीदों का शखिर भी है। यह क्षमता न तो शुद्ध घी पीने से मिलती न च्यवनप्राश खाने से। उसका काम तो हमेशा 'तलवार की धार पर धावनो' ही है। उसकी असलियत तो पत्रकार की नियति और जमीर से ही खोजी जानी चाहिए।

    पत्रकारिता का रास्ता मानवीयता और आत्मावलोकन का अवसर उपलब्ध कराता है। फिलहाल हमें मीडिया की साख की बेहद जरूरत है। लेकिन उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं दखि रही उसमें जिम्मेदारी, गंभीरता और सामाजिक सरोकार क्रमश: लुप्त होते जा रहे हैं। मीडिया की नजर में जनजीवन और उसके कल्याण की तरफ होनी चाहिए। सत्ता के प्रति उसकी निगाह नियंत्रित और आलोचनात्मक होनी चाहिए। उसमें अपने सुख-समृद्धि से अलग जनता के प्रति संवेदहीनशीलता हो और निडरता भी। अखबार और अन्य माध्यम टीआरपी बढ़ाने का खेल-खेल रहे हैं। उनकी चिंताएं ज़्यादा से ज़्यादा पैसा पीटने की बन चुकी हैं आखिर नागरिक या जनता सत्ता से उम्मीद न रखे, मीडिया से उम्मीद न रखे, न्याय प्रणाली से उम्मीद न रखे तो यकीनन किससे उम्मीद रखे। यह बेहद चिंतनीय पहलू है।

    सैकड़ों अच्छे काम करने के बावजूद यदि कोई अखबार एक अपराध के सामने घुटने टेक देता है, तो उसको समूची मानवता और कीर्ति बखिर जाती है। ऐसे अखबारों को जल्दी मान्यता भी नहीं दी जा सकती। जिसके पास साहस न हो, एक बेहतर दुनिया की खोज का मुहावरा न हो, जो नफरत, हिंसा के खिलाफ  मौन साध ले। उसके भीतर तड़प न हो। जो जनता के भीतर उम्मीद की इबारत न लखि सके और जिसमें सार्थकता के लिए जूझने का न संकल्प हो और न हौसला। जो पत्रकारिता के असली मिशन को ही भूल जाए। हम ऐसे मोड़ में आ गए हैं, जहां धड़ाधड़ बिकाई शुरू हो चुकी है। कुछ ही अखबार हैं जो हमें निराशाओं से बाहर लाने के प्रयत्न में लगे हैं। पत्रकारिता का रास्ता कठिन रास्ता होता है।

    सामान्य जीवन से लेकर सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय वास्तविकताओं के मुद्दे उसे उठाना पड़ता है। इसलिए पत्रकारिता छुपा-छुपाई का खेल नहीं हो सकती। ललितजी ने वास्तविकताओं को भांपते हुए अपने लेख में इस सच को उजागर किया था। 'पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊंचा समझा जाता था, आज बहुत गंदा हो गया है।'-अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, सांप्रदायिक भावनाएं हटाना परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, सांप्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है।' देशबन्धु का सफर इन्हीं मूल्यों से संचालित हुआ करता था। यही चिंताएं देशबन्धु की साख भी है।

    माना कि सभी की चाहना लोकप्रियता ही है लेकिन उसे पाने के लिए कड़े संघर्ष की जरूरत पड़ती है। क्या लोकप्रियता के लिए मूल्यों को कुचल दिया जाए। मनुष्यता को लहूलुहान कर रहे लोगों को अनदेखा कर दिया जाय। क्या बाजार में टिकने के लिए हम सभी कुछ दांव पर लगा दें। हमारी समझ यह बनती है कि कोई भी अखबार तभी टिक सकता है जब उसका स्पष्ट विजन हो, हौसला हो और उसमें जमीर हो। जनता की बुनियादी समस्याओं की समझ हो। पैसा ही सब कुछ नहीं होता अथाह पैसा होते हुए भी धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी अनेक पत्रिकाएं क्यों बिला गईं? फिर भी कहना जरूरी है कि पूंजी एक बहुत बड़ा फैक्टर है लेकिन यदि मीडिया या अखबार के पास साहस, बुनियादी ईमानदारी नहीं है तो आप बहुत लंबी यात्रा नहीं कर सकते। ललित सुरजन के इस मत से मेरी सहमति है कि हम उन मूल्यों को शायद नहीं पा सकते जिसमें कभी एक मिशन हुआ करता था। एक जज़्बा हुआ करता था। बदलाव की बेचैनी हुआ करती थी। हमें यह भी ज्ञान होना चाहिए कि छोटी-छोटी पूंजी से चलने वाले अखबारों ने ब्रिटानियां हुकूमत की धज्जियां उड़ाई थी। उनकी नींद हराम कर दी थी।

    यह साफ बात है कि मीडिया या अखबार की विश्वसनीयता निश्चित रूप से घटी है लेकिन जनता के बीच उसके मूल्यों की कुछ कदर अभी भी शेष है। बहुत कुछ टूटने के बावजूद भी कुछ मूलवत्ताएं अभी भी बची हैं। सब कुछ होना बचा रहेगा। बचना ही इस दौर में महत्वपूर्ण तथ्य है।  मीडिया के समक्ष अनेक चुनौतियां हैं, जैसे बाजार का क्रूर चेहरा है। पत्रकारिता में काम करने वाले भी शोषण के शिकार हैं। उनको ठीक से बेतन नहीं मिलता। पैसे के लिए और उसके सामने राष्ट्रीय अस्मिताएं भी खत्म कर दी जाती हैं। पत्रकारिता पर जिस तरह से प्रश्नों की झड़ी लगी है। वह हम सभी की चिन्ता का बहुत बड़ा केंद्र है। हम एकदम निराश नहीं है इसी में हमें नैतिकता, जीवन, जनपक्षधरता की खोज करनी है।  पत्रकारिता के उज्ज्वल रूपों को पुनर्प्रतिष्ठित करने की दिशा की ओर बढ़ना है। जैसा समय होगा, समाज होगा उसी तरह पत्रकारिता की यात्रा भी होगी। वह कोई अलग 'कल्ट' नहीं है।

    देशबन्धु बाबू मायाराम सुरजन के दौर से धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक और मानवीय मूल्यवत्ताओं का पक्षधर रहा है। ललित जी ने बाबूजी के प्रकाश और सुगंध को तमाम बड़े दायरे में सुवासित किया है।  इसलिए शायद इस देश के अनेक साथी इस अखबार की बातें बहुत शान से बखानते हैं। दरअसल मीडिया और संचार साधनों का इतना बड़ा जाल बिछा है कि क्या कहें। पत्रकारिता तो छोड़िए साहित्य संस्कृति के तमाम महत्वपूर्ण प्रश्न भी पूंजी के महारास में उलझ गए हैं। चरित्र और नैतिकता के लिए लगभग कोई जगह नहीं है। इतने तेज बदलाव हो रहे हैं कि कुछ कहते नहीं बनता। चमक-दमक हर क्षेत्र में पांव तोड़कर बैठ गई है।

    आलोचना के लिए लगभग कोई स्पेस ही नहीं है। उसे सहने की क्षमता एकदम विरल और दुर्लभ है, इसलिए संभवत:  लगातार हम प्रशंसा के चंगुल में भी हैं। जब पूरे कुएं में भाग घुली हो तो शुद्ध पानी की कल्पना करना बहुत मुश्किल है। दिक्कत यह है कि हम अपनी धार तक नहीं बचा पा रहे हैं। समूचा परिवेश धुआं-धुआं होने की कगार पर है।  इधर के वर्षों में लेखकों के बुद्धिजीवियों के नकाब एकदम खुल गए हैं। सत्ता की भयानक गिरावट ने सामाजिक सांस्कृतिक सभी रूपों की धज्जियां उड़ा दी है। मीडिया की भूमिका बौनी, लचर तथा अपाहिज हो गई है। आदर्श की हत्याओं के, मूल्यों की पतन गाथाओं को छिप-छिपाकर नहीं हम खुले आम देख रहे हैं। अभी तो वे सभी चीजें हमें देखनी है जो हमारे कल्पना लोक में भी नहीं था। आगे आने वाले समय में हम मूल्यों की एक-एक बूंद के लिए तरस जाएंगे। फिर भी जीवन घायल भले कर दिया जाए उसे खतम नहीं किया जा सकेगा। यह सभी हमारी जिजीविषा का एक अमर शखिर है। मनुष्यता की कोशिश हर टूट-फूट को ठीक करने की होती है।

     हम सभी अमन पसंद और मनुष्यता पर विश्वास करने वाले लोग हैं और इसी से एक लंबे अरसे से बेचैन हैं। अमन बहाल हो तो जीने में लुत्फ आए। अन्यथा धर्मवीर भारती के अंधायुग के पात्र अश्वस्थामा की तरह हमारी रूह तक कांपती रहेगी और प्रतिशोध की आग में जलती रहेगी। जाहिर है कि जब तक हम क्षुद्रताओं से बाहर नहीं आयेंगे। न तो कोई रास्ता मिलेगा न कोई समाधान। हमने देश को स्वार्थों का अखाड़ा बना रखा है इसलिए पत्रकारिता और साहित्य विमर्श की हम बातें करते हैं। कटुताएं इसी रास्ते ख़तम या कम हो सकती हैं।

    अपने अंदर बाहर झांके बगैर जीवन की, रचनात्मकता की और मूल्यवत्ताओं की यात्रा की ही नहीं जा सकती। यही तो असली दिक्कत है कि लोगों ने अपनी ओर झांकना, आत्मालोचन करना लगभग बंद कर दिया है। अपने अवगुणों को ढांकना-मूंदना जिन्होंने अच्छे से सीख समझ लिया है। और वे केवल दूसरों की ताक झांक में तल्लीन हैं। कोई उन्हें क्या कहे। कबीर ने सच ही कहा था- ''बुरा जो देखन मैं चला/मुझ सा बुरा न कोइ। बिना आत्मालोचन के साहस के बिना •िांदगी की यात्रा किसी भी तरह संभव नहीं हो सकती।'

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