• किसान आंदोलन से अप्रभावित और निश्चित सरकार का रूखा सा बजट

    आशा की जा रही थी कि बजट में वित्त मंत्री इस बात का लेखा जोखा प्रस्तुत करेंगी कि सरकार ने किसानों की आमदनी दुगुनी करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए और अब तक किसानों की आमदनी कितने प्रतिशत बढ़ चुकी है

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    - डॉ राजू पाण्डेय

    आशा की जा रही थी कि बजट में वित्त मंत्री इस बात का लेखा जोखा प्रस्तुत करेंगी कि सरकार ने किसानों की आमदनी दुगुनी करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए और अब तक किसानों की आमदनी कितने प्रतिशत बढ़ चुकी है? किंतु एक सतही उल्लेख के अलावा वित्त मंत्री के बजट भाषण में इस विषय पर कुछ नहीं कहा गया। निश्चित ही यह बजट आंदोलनरत किसानों को सरकार का रूखा सा जवाब है कि वे जो चाहे कर लें सरकार को रत्ती भर फर्क नहीं पड़ने वाला।

    इस वर्ष का आम बजट वह अवसर था जब आंदोलित किसान यह आकलन कर सकते थे कि सरकार क्या वास्तव में उनकी मांगों को लेकर गंभीर है? आम जन भी यह मूल्यांकन कर सकते थे कि  सरकार के मंत्रियों और प्रवक्ताओं द्वारा मीडिया में बार बार किया जाने वाला यह दावा  कि उनकी सरकार स्वतंत्र भारत की सर्वाधिक किसान हितैषी सरकार है, क्या सचमुच सत्य है? यह कहना कि बजट किसानों के लिए निराशाजनक है, सरकार की रणनीतिक उदासीनता और कठोरता को कम कर आंकना होगा। दरअसल सरकार इस बजट के माध्यम से किसानों को यह संदेश देना चाहती है कि उनके आंदोलन से प्रभावित होकर वह अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करने वाली नहीं है बल्कि किसानों के लिए पिछले बजटों में जो थोड़े बहुत प्रावधान किए गए थे उन्हें लेकर भी वह कंजूसी बरतने का दुस्साहस अवश्य करने वाली है। 

    यदि विगत वर्ष से तुलना करें तो सम्पूर्ण बजट में कृषि और अन्य सहायक गतिविधियों के लिए आबंटन में इस वर्ष कटौती की गई है। पिछले वर्ष यह आबंटन 1.54 लाख करोड़ था जबकि इस वर्ष आबंटित राशि 1.48 लाख करोड़ रुपए है। यदि सम्पूर्ण बजट में कृषि की हिस्सेदारी की बात करें तो पिछले वर्ष के 5.1 प्रतिशत से घटकर यह इस वर्ष 4.3 प्रतिशत रह गई है। 
    कम से कम पिछले सालों के बजट भाषणों में कृषि और किसानों का प्रारंभ में ही जिक्र होता था और घोषणाएं कागजी होती थीं और इनसे किसानों की बदहाली और गरीबी खत्म करने में कुछ खास मदद नहीं मिलती थी।  किंतु इस बार तो ऐसा भी कोई प्रयास नहीं हुआ। बजट भाषण में कृषि का उल्लेख बहुत बाद में आया और लगभग उतनी ही अनिच्छा से इसकी चर्चा हुई जितनी उपेक्षा से किसानों के लिए यह बजट बनाया गया है।

    किसानों को बेहतर आय देने और बाजार में हस्तक्षेप द्वारा किसानों को उचित मूल्य दिलाने हेतु पिछले बजटों से संचालित प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान(पीएम-आशा) तथा मार्केट इंटरवेंशन स्कीम एवं प्राइस सपोर्ट स्कीम के लिए आबंटित फण्ड में प्रति वर्ष कटौती की जा रही है और अब इनके लिए आबंटन इतना कम है कि इसे आवश्यकता की तुलना में नगण्य कहा जा सकता है। अनेक स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा एकत्रित आंकड़े यह बताते हैं कि कीमतों के समर्थन मूल्य से नीचे चले जाने के कारण किसानों को प्रतिवर्ष लगभग 50000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है, इसके बावजूद सरकार द्वारा इन महत्वपूर्ण योजनाओं के फण्ड में वृद्धि के स्थान पर की जा रही लगातार कटौती यह दर्शाती है कि सरकार एमएसपी के मामले में जरा भी गंभीर नहीं है। आपरेशन ग्रीन के संबंध में कहा गया कि अब इसमें पूर्व सम्मिलित 3 फसलों (टमाटर,प्याज,आलू) को बढ़ाकर 22 अन्य खराब होने वाली फसलों को शामिल किया जाएगा। किंतु  वस्तुस्थिति यह है कि इसके अधीन केवल 5 प्रोजेक्ट सैंक्शन हुए हैं और इनमें से किसी पर भी काम शुरू नहीं है।

    अनेक कृषि अर्थशास्त्रियों एवं किसान नेताओं ने कोविड-19 और मंदी से कृषि तथा उसके सहयोगी क्षेत्रों  को उबारने का दावा करने वाले आत्मनिर्भर भारत पैकेज के खोखलेपन पर सवाल उठाए हैं और नवीनतम इकॉनॉमिक सर्वे को देखें तो इनके सवाल एकदम जायज लगते हैं। वर्तमान इकॉनॉमिक सर्वे के वॉल्यूम 2 के चैप्टर 7 के अनुसार आत्मनिर्भर भारत पैकेज में घोषित एक लाख करोड़ के बहुचर्चित एग्रीकल्चर इंफ्रा फण्ड में से मई 2020 से अब तक कुछ भी खर्च नहीं हुआ है।

    जनवरी 2021 के मध्य तक इसमें से केवल 2991 करोड़ रुपए के अनुबंध हस्ताक्षरित हुए हैं। यह भी इन प्रिंसिपल कमिटमेंट के स्तर पर हैं। वित्तमंत्री ने कहा कि अब एग्रीकल्चर इंफ्रा फण्ड एपीएमसी के लिए उपलब्ध होगा किंतु सरकार ने जो आबंटन दिया है वह एकदम नाकाफी और खटकने वाला है। पिछले वित्तीय वर्ष में इस पर सरकार ने अपने खजाने से केवल 200 करोड़ रुपए खर्च किए थे जबकि इस वर्ष सरकारी खजाने से एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फण्ड के लिए केवल 900 करोड़ रुपए व्यय होंगे। इसी प्रकार 15000 करोड़ रुपए के एनिमल हसबेंडरी फण्ड से भी एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ है।

    पीएम किसान योजना हेतु आबंटन पिछले वर्ष के 75 हजार करोड़ रुपए से घटाकर 65 हजार करोड़ रुपए कर दिया गया है। इस योजना को स्वयं प्रधानमंत्री किसानों की बेहतरी के एक क्रांतिकारी एवं अभूतपूर्व प्रयास की संज्ञा देते रहे हैं किंतु सच्चाई यह है कि पीएम किसान योजना के लाभार्थियों की संख्या चिंताजनक रूप से कम हो रही है। कृषि मंत्रालय की 'पीएम किसानÓ वेबसाइट यह दर्शाती है कि इस योजना के तहत कुल 8.80 करोड़ लाभार्थी चिह्नित किए गए थे जिसमें से 8.35 करोड़ लाभार्थियों को पहली किस्त के रूप में दो हजार रुपए दिए गए। दूसरी किस्त में लाभार्थियों की संख्या घटकर 7.51 करोड़, तीसरी में 6.12 करोड़ और चौथी किस्त में केवल 3.01 करोड़ (29 जनवरी 2021 तक) रह गई है।

    सरकार का यह भी कहना है कि भूमिहीन, किराएदार और बटाईदार किसानों को मनरेगा के माध्यम से सहायता दी जा रही है। किंतु यहां भी सरकारी दावे खोखले हैं। वर्ष 2021-22 के बजट में मनरेगा के लिए 73000 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह राशि वर्ष 2020-21 के संशोधित एस्टीमेट एक लाख ग्यारह हजार पांच सौ करोड़ रुपए से 34.52 प्रतिशत कम कोविड-19 महामारी के दौर में संवेदनशील परिवारों के लिए मनरेगा जीवनदायिनी सिद्ध हुई थी और हम ग्रामीण रोजगार के लिए इस योजना पर बहुत अधिक निर्भर हैं। इसके बाद भी सरकार द्वारा 38500 करोड़ रुपए कम आबंटित करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
    प्रधानमंत्री कृषि और किसानों से संबंधित अपने प्रत्येक उद्बोधन में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का उल्लेख करते रहे हैं। लगभग 50 प्रतिशत किसानों को कवर करने का दावा करने वाली फसल बीमा योजना बमुश्किल 20 प्रतिशत किसानों को ही कवर कर पा रही है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए वर्ष 2020-21 में व्यय 15307 करोड़ रुपए रहा जो बजट एस्टीमेट से 388 करोड़ रुपए कम था। इस वर्ष बजट एस्टीमेट में 2 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी की गई है। 2016 से प्रारंभ हुई यह योजना निजी बीमा कंपनियों के लिए मुनाफे का सौदा सिद्ध हुई है।

    वर्ष 2018 के आंकड़े बताते हैं कि 18 बीमा कंपनियों ने वर्ष 2018 में 42114 करोड़ रुपए एकत्रित किए जिसमें से 17 प्रतिशत हिस्सा किसानों से और 83 प्रतिशत भाग केंद्र और राज्य सरकारों से आया था। इसी वर्ष इन निजी बीमा कंपनियों ने 32912 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया था, इस प्रकार ये लगभग 9000 करोड़ रुपए के फायदे में रहीं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि बड़ी संख्या में किसानों के दावों का भुगतान नहीं किया गया।

    एक अन्य महत्वपूर्ण योजना इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम है जो किसानों को अल्प समय हेतु सब्सिडी वाली ब्याज दरों पर ऋ ण उपलब्ध कराने से संबंधित है। वर्ष 2021-22 में इसके लिए आबंटन 8 प्रतिशत घटा दिया गया है। जबकि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (जो किसानों को किसी न किसी प्रकार की सिंचाई सुविधा देने से संबंधित है) के फण्ड में मामूली बढ़ोतरी की गई है।

    28 फरवरी 2016 को प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की थी कि वे स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ अर्थात वर्ष 2022 तक किसानों की आय दुगुनी कर देंगे। इस घोषणा को 5 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2021-22 पंद्रह अगस्त 2022 के पहले का अंतिम पूर्ण वित्तीय वर्ष है। इसलिए यह आशा की जा रही थी कि बजट में वित्त मंत्री इस बात का लेखा जोखा प्रस्तुत करेंगी कि सरकार ने किसानों की आमदनी दुगुनी करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए और अब तक किसानों की आमदनी कितने प्रतिशत बढ़ चुकी है? किंतु एक सतही उल्लेख के अलावा वित्त मंत्री के बजट भाषण में इस विषय पर कुछ नहीं कहा गया।
    निश्चित ही यह बजट आंदोलनरत किसानों को सरकार का रूखा सा जवाब है कि वे जो चाहे कर लें सरकार को रत्ती भर फर्क नहीं पड़ने वाला।

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