• आरक्षण को धता बताने की चाल

    देश में संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की परीक्षा को उत्तीर्ण करना बहुत से मेधावी छात्रों का सपना होता है

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    देश में संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की परीक्षा को उत्तीर्ण करना बहुत से मेधावी छात्रों का सपना होता है। इस परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले उम्मीदवार समाज में रोल मॉडल की तरह देखे जाते हैं। उनके साक्षात्कार जगह-जगह प्रकाशित-प्रसारित होते हैं, जिनमें वे बताते हैं कि किस तरह उन्होंने दिन-रात तैयारी की, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए क्या-क्या त्याग किए। ये सफल उम्मीदवार ही फिर राज्यों से लेकर केंद्र सरकार के मंत्रालयों में अपनी सेवाएं देते हैं।

    सरदार पटेल ने इन लोकसेवकों को भारत की स्टील फ्रेम कहा था। लेकिन अब स्टील फ्रेम को दरकिनार कर नए ढांचे में राष्ट्र निर्माण की तैयारी केंद्र सरकार ने कर ली है। अब केन्द्रीय मंत्रालयों में निदेशक, संयुक्त सचिव जैसे पदों पर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की नियुक्ति के लिए राह खोल दी गई है।

    सरकारी भाषा में इसे लैटरल एंट्री कहा जा रहा है। आमतौर पर संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी द्वारा आयोजित की जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा, वन सेवा परीक्षा या अन्य केंद्रीय सेवाओं की परीक्षा में चयनित अधिकारियों को अपने कार्यक्षेत्र में लंबा अनुभव हासिल करने के बाद संयुक्त सचिवों के पद पर तैनात किया जाता है। लेकिन लैटरल एंट्री नीति के तहत ऐसे लोगों को आवेदन करने योग्य माना गया है, जिन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सर्विस परीक्षा पास नहीं की है। याद रहे कि सितंबर 2019 में केंद्र सरकार ने इसी नीति के तहत नौ निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को विभिन्न मंत्रालयों में संयुक्त सचिव नियुक्त किया था। अब एक बार फिर विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों में संयुक्त सचिव के तीन पदों और निदेशक के 27 पदों के लिए निजी क्षेत्र, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और राज्य सरकारों में काम कर रहे लोगों से आवेदन मंगाए हैं।

    यूपीएससी की ओर से जारी की गई अधिसूचना के मुताबिक, सरकार ने संयुक्त सचिव और निदेशक स्तर के अधिकारियों की भर्तियों के लिए आवेदन मंगाए हैं और इसी के अनुरूप राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के इच्छुक प्रतिभाशाली और प्रेरित भारतीय नागरिकों से आवेदन मंगाए हैं। अधिसूचना के मुताबिक, तय वर्षों के अनुभव वाले लोग (संयुक्त सचिव के लिए 15 साल और निदेशक पद के लिए 10 साल) कॉरपोरेट सेक्टर, राज्य कैडर और पीएसयू अधिकारी ही इन पदों के योग्य हैं। अधिसूचना में कहा गया है कि उम्मीदवारों का विस्तृत विज्ञापन और निर्देश आयोग की वेबसाइट पर अपलोड किए जाएंगे और इच्छुक उम्मीदवार इन पदों पर 22 मार्च तक आवेदन कर सकते हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी एक ट्वीट कर इसकी जानकारी दी थी कि  'संविदा आधार पर संयुक्त सचिव स्तर और निदेशक स्तर के पदों के लिए संविदा पर भर्ती। इच्छुक उम्मीदवार 6 फरवरी 2021 से 22 मार्च 2021 तक आवेदन कर सकते हैं।' यह भी एक आश्चर्य ही है कि केन्द्रीय वित्त मंत्री को इस भर्ती के लिए ट्वीट करने की जरूरत क्यों पड़ी। 

    बहरहाल सरकार के इस फैसले को विपक्ष सही नहीं मान रहा है। आरोप है कि अस्थायी प्रकृति की इस बहाली में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाएगा तथा यह एक और संवैधानिक संस्था को बर्बाद करने की साजिश है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने निर्मला सीतारमण के ट्वीट के जवाब में लिखा है कि 'आपको यह बताना चाहिए कि क्या यूपीएससी की चयन प्रक्रिया 'राष्ट्र निर्माण' के लिए 'इच्छुक, प्रेरित और प्रतिभाशाली' उम्मीदवारों का चयन सुनिश्चित करने में विफल हो रही है या चुनिंदा लोग ज्यादा हैं? क्या यह वंचित वर्गों के लिए दिए गए आरक्षण को दरकिनार और कम करने की एक और चाल नहीं है?

    आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार।' इसी तरह अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर तंज कसा है कि भाजपा खुलेआम अपनों को लाने के लिए पिछला दरवाजा खोल रही है और जो अभ्यर्थी सालों-साल मेहनत करते हैं उनका क्या? भाजपा सरकार अब ख़ुद को भी ठेके पर देकर विश्व भ्रमण पर निकल जाए वैसे भी उनसे देश नहीं संभल रहा है। इन नेताओं की टिप्पणी बिल्कुल माकूल है। पहले सार्वजनिक निकायों में उच्च पदस्थ लोगों के पास सेवानिवृत्ति के बाद निजी क्षेत्र में ऊंचे पद पाने का मौका रहता था।

    निजी कंपनियां उनके सरकारी अनुभवों और संपर्कों दोनों का लाभ लेती थीं। इससे उन अधिकारियों की एकनिष्ठता पर सवाल भी उठते थे, जो सरकार के बाद निजी क्षेत्रों के वेतनभोगी हो जाया करते थे। अब तो सरकार ने सार्वजनिक निकायों को निजी क्षेत्रों के हवाले करना शुरु कर दिया है और सरकारी विभागों में निजी क्षेत्र से अधिकारियों की नियुक्ति शुरु कर दी है। इस खेल में सवर्ण, संपन्न, सुविधाभोगी तबके पास एक बार फिर पांचों उंगलियां घी में डालने का मौका है, जबकि पढ़ाई, नौकरी और अनुभवों के समान अवसरों से वंचित लोगों के पास केवल संघर्ष का रास्ता है। आरक्षण की व्यवस्था को धता बताने की यह नई चाल देश के लिए घातक साबित होगी। 

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