• भाजपा के लिए कठिन है '400 पार' की डगर

    महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुए जबरन विभाजन ने महाराष्ट्रीयन गौरव को चोट पहुंचाई है

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    - जगदीश रत्तनानी

    महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुए जबरन विभाजन ने महाराष्ट्रीयन गौरव को चोट पहुंचाई है। इसने भाजपा के खिलाफ गुस्से का एक मजबूत अंतर्प्रवाह बनाया है कि पार्टी ने महाराष्ट्र में एक निर्वाचित सरकार को प्रभावित करने के लिए गुजरात का इस्तेमाल किया है। असंतुष्ट और बागी विधायकों को भगाने के लिए भाजपा नेतृत्व ने पहले गुजरात के सूरत (और बाद में गुवाहाटी) का इस्तेमाल एक सुरक्षित शहर के रूप में किया।

    40 दिनों और सात चरणों में चल रहे लोकसभा चुनाव के दौरान राष्ट्र के मूड को पढ़ना कभी आसान या सुरक्षित नहीं होता। इस प्रतिवाद के बावजूद यह अभी भी कहा जाना चाहिए कि भाजपा के खिलाफ एक माहौल बनने की शुरुआत है जो आकार में हल्के से मध्यम शक्ति का हो सकता है; और इस बात पर निर्भर करता है कि चुनाव विश्लेषण कौन कर रहा है। हालांकि, चुनाव के पहले चरण की समाप्ति के बाद इस स्तर पर यह कहना मुश्किल है कि यह भावना क्यों और कैसे पैदा हो सकती है या क्या यह नरेंद्र मोदी को तीसरा कार्यकाल देने के खिलाफ एक तगड़ा माहौल बनाने में सफल हो सकती है। अगर यह माहौल बनाना है तो भाजपा के भारी धन बल और चुनाव अभियान की पहुंच व प्रभाव के खिलाफ खड़ा होना होगा। चुनावी बॉन्ड योजना से भाजपा को मिले 8,250 करोड़ रुपये से मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा भारी खर्च स्पष्ट रूप से अभद्रता की सीमा पर है। चुनावी बॉन्ड योजना अब अवैध घोषित हो चुकी है।

    इसके बाजूद एकतरफा मिली यह धन शक्ति नुकसान भी पहुंचा सकती है क्योंकि यह एक ओर अद्वितीय पहुंच को सक्षम बनाती है, तो वहीं दूसरी ओर यह भाजपा की भारी नकारात्मकताओं को उजागर करने का काम करती है। यह धन शक्ति एक दमदार, दबंग व अहंकारी व्यक्तित्व को वोट मांगने के समय मदद नहीं कर सकती। प्रधानमंत्री की यात्रा को छोड़ दें तो भाजपा ने अपने नेताओं के लिए सबसे अधिक निजी हेलीकॉप्टर बुक किए हैं। रायटर के अनुसार गूगल सर्च विज्ञापनों पर भाजपा ने कांग्रेस के मुकाबले चार-एक और फेसबुक विज्ञापनों पर तीन के मुकाबले एक खर्च किया है। वे इसे मनोवैज्ञानिक युद्ध के तौर पर इस्तेमाल कर मतदाताओं को अपनी सतही कहानी का प्रचार करने के लिए कहती है कि 2019 की तुलना में भाजपा 303 सीटों के अपने आंकड़े में सुधार करेगी।

    यह समझना मुश्किल है कि ऐसा कैसे संभव है जब तक कि सत्तारूढ़ गठबंधन पिछली बार मिली सीटों को बचाए रखते हुए नई सीटों पर जीत हासिल नहीं करता है, तब तक वह 400 पार के लक्ष्य को कैसे पा सकता है। उदाहरण के तौर पर पिछली बार पूरे दक्षिणी क्षेत्र या पूर्वी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में सत्तारुढ़ गठबंधन का प्रदर्शन अच्छा नहीं था। 2019 में दक्षिण भारत में नेशनल डेमोक्रेेटिक एलायंस (एनडीए) गठबंधन ने कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना के पांच राज्यों में 130 सीटों में से 30 सीटें जीतीं लेकिन उनमें से 25 कर्नाटक से आईं थीं। कर्नाटक में अब कांग्रेस की सरकार है जो अपने प्रगतिशील कामों के लिए विख्यात है। कर्नाटक सरकार अपने चुनाव अभियान की ताकत को बढ़ाती है तो इस बात की बहुत कम संभावना है कि भाजपा 2019 में कर्नाटक में 28 लोकसभा सीटों में से 25 के अपने आंकड़े तक पहुंच पाएगी।

    तमिलनाडु में भाजपा अच्छा प्रदर्शन कर रही है। वहां पिछली बार पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी लेकिन अब वह शहरी इलाकों में कड़ी टक्कर दे रही है। फिर भी वहां भाजपा के अभियान को द्रविड़ आंदोलन की वैचारिक चुनौती को देखते हुए राज्य में प्रतिसाद मिलने की संभावना नहीं है। वहां सभी क्षेत्रीय दलों की उत्पत्ति और विचारधारा का संबंध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पेरियार के द्रविड़ आंदोलन से है। डीएमके विशेष रूप से बार-बार प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार को संस्थागत बनाने का आरोप लगाते हुए एक मजबूत अभियान चलाने में सक्षम रही है। संभावना है कि भाजपा को वहां एक भी सीट न मिले।

    इसी प्रकार, उत्तरी क्षेत्र में 2019 में भाजपा को अधिकतम सीटें मिलीं थीं। वहां बढ़ने की कोई गुंजाइश न होने तथा कहीं और से कोई नया आधार न होने के कारण भाजपा के लिए अपनी समग्र टैली में सुधार करना लगभग असंभव हो जाता है। वास्तव में बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में नई वास्तविकताओं को देखते हुए पार्टी अपने स्व-घोषित बेंचमार्क से काफी नीचे आ सकती है।

    भाजपा के आगे-पीछे चलने के कारण बिहार में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लोग 'पलटू राम' कहने लगे हैं। यह देखना दिलचस्प रहेगा कि एनडीए की जेडीयू-बीजेपी-एलजेपी तिकड़ी 2019 के लोकसभा चुनावों में जीती गई 40 सीटों में से 39 कैसे जीत पाती है। राष्ट्रीय जनता दल आरजेडी के तेजस्वी यादव एक जबरदस्त चुनाव अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं। वे नीतीश कुमार को अपना निशाना बनाए हुए हैं और व्यंग्यात्मक लहजे में 'माननीय' मुख्यमंत्री कहते हैं लेकिन राजद के अंदरूनी लोगों का कहना है कि राजद ने मुख्यमंत्री पद का इस्तेमाल अपने संकीर्ण हितों के लिए किया है। यह सोच अपने आप में कहती है कि नीतीश कुमार एक मोहरा बन गए हैं, वे सत्ता पर नियंत्रण खो चुके हैं और भाजपा के हाथों में खेल रहे हैं। बिहार को 'विशेष दर्जा' दिलाने की मांग को पूरा करवाने में नीतीश कुमार विफल रहे, जिसके लिए वे केंद्र से लगातार मांग और अनुरोध करते रहे हैं। भाजपा के साथ वापस जुड़ने के बाद से नीतीश कुमार की शब्दावली से बिहार के लिए 'विशेष दर्जा' शब्द गायब हो गया है।

    महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुए जबरन विभाजन ने महाराष्ट्रीयन गौरव को चोट पहुंचाई है। इसने भाजपा के खिलाफ गुस्से का एक मजबूत अंतर्प्रवाह बनाया है कि पार्टी ने महाराष्ट्र में एक निर्वाचित सरकार को प्रभावित करने के लिए गुजरात का इस्तेमाल किया है। असंतुष्ट और बागी विधायकों को भगाने के लिए भाजपा नेतृत्व ने पहले गुजरात के सूरत (और बाद में गुवाहाटी) का इस्तेमाल एक सुरक्षित शहर के रूप में किया। एक आंदोलन के बाद मुंबई के महाराष्ट्र की राजधानी बनने तक महाराष्ट्र और गुजरात एक ही राज्य थे। मुंबई में एक 'हुतात्मा चौक' उन शहीदों का स्मारक है जो अलग मराठी भाषी महाराष्ट्र राज्य के लिए संघर्ष में मारे गए थे। उस समय मोरारजी देसाई तत्कालीन संयुक्त बॉम्बे-गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री थे। उसे तब 'बॉम्बे स्टेट' कहा जाता था। 2019 और 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा और शिवसेना ने गठबंधन में रहकर चुनाव लड़ा था। महाराष्ट्र की 48 सीटों में से 41 पर जीत हासिल की थी। संभावना है कि कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी और शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट वाले एकजुट विपक्ष के खिलाफ यहां भाजपा को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अमरावती लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी सांसद नवनीत राणा ने एक जनसभा में खुलकर कहा कि इस बार 'मोदी लहर' नहीं है।

    कई अन्य राज्यों में भी कांग्रेस को उत्साहजनक प्रतिसाद मिलने की खबरें हैं लेकिन वायनाड को लेकर सीपीआई-कांग्रेस के झगड़े का नकारात्मक प्रभाव और अमेठी सीट को लेकर अनिश्चितता है। रॉबर्ट वाड्रा ने स्पष्ट रूप से अमेठी सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की है।

    दूसरी तरफ, भाजपा का प्रमुख चेहरा- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थके हुए और निस्तेज दिखते हैं। वे एक भंवर में फंसे हुए प्रतीत होते हैं जिससे निकलने के लिए और अधिक समय की जरूरत होती है। उन्होंने अपने भाषणों में धर्म का अति प्रयोग करना शुरू कर दिया है (भाजपा मानकों के मुताबिक यह अति की सीमा तक पहुंच गया है!) जो हास्यास्पद होने की सीमा तक पहुंच गया है। एक सभा में उन्होंने श्रोताओं से कहा कि जब अयोध्या के मंदिर में भगवान राम के 'जन्मदिन' पर भगवान राम की मूर्ति पर सूर्य की किरणें दिखाई दे रही हों तब वे रोशनी भेजने के लिए अपने मोबाइल टॉर्च पर प्रकाश भेजें। उसी बैठक में उन्होंने कहा- 'मोदी की गारंटी यानी गारंटी पूरा होने की गारंटी'।

    लेकिन हम इसे यूं ही नजरअंदाज कर सकते हैं- इसे तनाव कहें, थकान कहें या लोकतंत्र के त्यौहार के बीच बेतुकी नाटकबाजी कहें। इसके बावजूद हम उम्मीद करते हैं कि भारत भविष्य में भी लोकतंत्र का जश्न मनाता रहेगा।
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट द बिलियन प्रेस)

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