- राजू पांडेय
आज हम देख रहे हैं कि केंद्र सरकार द्वारा जबरन थोपे गए तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध देश के किसान आंदोलित हैं। गांधी जी ने बहुत पहले ही हमें चेताया था कि यदि किसानों की उपेक्षा और शोषण एवं दमन जारी रहा तो हालात विस्फोटक बन सकते हैं। उन्होंने लिखा- यदि भारतीय समाज को शांतिपूर्ण मार्ग पर सच्ची प्रगति करनी है तो धनिक वर्ग को निश्चित रूप से स्वीकार कर लेना होगा कि किसान के पास भी वैसी ही आत्मा है जैसी उनके पास है और अपनी दौलत के कारण वे गरीब से श्रेष्ठ नहीं हैं।( यंग इंडिया 5 दिसंबर, 1929)
जीवन में अनेक ऐसे अवसर आए जब गांधी जी को अपना परिचय देने की आवश्यकता पड़ी और हर बार उन्होंने स्वयं की पहचान किसान ही बताई। 1922 में राजद्रोह के मुकद्दमे का सामना कर रहे गांधी अहमदाबाद में एक विशेष अदालत के सामने स्वयं का परिचय एक किसान और बुनकर के रूप में देते हैं। पुन: नवंबर 1929 में अहमदाबाद में नवजीवन ट्रस्ट के लिए दिए गए घोषणापत्र के अनुसार भी गांधी स्वयं को पेशे से किसान और बुनकर बताते हैं। गांधी जी ने रस्किन के विचार- एक श्रम प्रधान जीवन, भूमि में हल चलाने वाले किसान या किसी हस्तशिल्पकार का जीवन ही अनुकरणीय है- को अपना मूल मंत्र बना लिया।
गांधी जी की दृष्टि में किसान और हिंदुस्तान एक दूसरे के पर्याय हैं। हिन्द स्वराज(1909) में वे लिखते हैं- आपके विचार में हिंदुस्तान से आशय कुछ राजाओं से है किंतु मेरी दृष्टि में हिंदुस्तान का मतलब वे लाखों लाख किसान हैं जिन पर इन राजाओं का और आपका अस्तित्व टिका हुआ है। ...किसान किसी की तलवार के बस न तो कभी हुए हैं और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते और न ही वे किसी की तलवार से भय खाते हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बनाकर सोने वाली महान प्रजा हैं। उन्होंने मृत्यु का भय छोड़ दिया है। तथ्य यह है कि किसानों ने, प्रजा मंडलों ने अपने और राज्य के कारोबार में सत्याग्रह को काम में लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है।(हिन्द स्वराज, नवजीवन, अहमदाबाद,पृष्ठ 58-59)।
गांधी जी उनमें एक आजाद, जाग्रत और प्रबुद्ध नागरिक के दर्शन करते हैं- इन भारतीय किसानों से ज्योंहि तुम बातचीत करोगे और वे तुमसे बोलने लगेंगे त्योंहि तुम देखोगे कि उनके होंठों से ज्ञान का निर्झर बहता है। तुम देखोगे कि उनके अनगढ़ बाहरी रूप के पीछे आध्यात्मिक अनुभव और ज्ञान का गहरा सरोवर भरा पड़ा है। भारतीय किसान में फूहड़पन के बाहरी आवरण के पीछे युगों पुरानी संस्कृति छिपी पड़ी है। इस बाहरी आवरण को अलग कर दें, उसकी दीर्घकालीन गरीबी और निरक्षरता को हटा दें तो हमें सुसंस्कृत, सभ्य और आजाद नागरिक का एक सुंदर से सुंदर नमूना मिल जाएगा। (हरिजन 28 जनवरी, 1939)।
गांधी जी किसानों के शोषण को देश की सबसे गंभीर समस्या मानते थे और उन्होंने बारंबार अपने लेखों और भाषणों में इसे देश की स्वतंत्रता के मार्ग में बाधक बताया है। आज से लगभग 77 वर्ष पूर्व गांधी यह उद्घोष करते हैं कि जमीन उसी की होनी चाहिए जो उस पर खेती करता है न कि किसी जमींदार की। वे किसानों को जमींदारों और पूंजीपतियों के शोषण से बचने के लिए सहकारिता की ओर उन्मुख होने का परामर्श देते हैं। वे खेतिहर मजदूरों के हकों की चर्चा करते हैं। आज तो भूमिहीन किसान और कृषि मजदूर चर्चा से ही बाहर हैं और सहकारिता को खारिज करने की हड़बड़ी सभी को है।
आज हम देख रहे हैं कि केंद्र सरकार द्वारा जबरन थोपे गए तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध देश के किसान आंदोलित हैं। गांधी जी ने बहुत पहले ही हमें चेताया था कि यदि किसानों की उपेक्षा और शोषण एवं दमन जारी रहा तो हालात विस्फोटक बन सकते हैं। उन्होंने लिखा- यदि भारतीय समाज को शांतिपूर्ण मार्ग पर सच्ची प्रगति करनी है तो धनिक वर्ग को निश्चित रूप से स्वीकार कर लेना होगा कि किसान के पास भी वैसी ही आत्मा है जैसी उनके पास है और अपनी दौलत के कारण वे गरीब से श्रेष्ठ नहीं हैं।( यंग इंडिया 5 दिसंबर, 1929)
गांव की उपेक्षा और किसानों को मालिक से मजदूर बनाकर जबरन शहरी कारखानों की ओर धकेलना आधुनिक विकास प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है। गांधी जी ने बहुत पहले ही इसे भांप लिया था। गांधी जी की प्रेरणा से भी अनेक सत्याग्रह आंदोलन हुए। वर्तमान किसान आंदोलन के नेतृत्व को गांधी जी की यह सीखें बार बार स्मरण करनी चाहिए। आंदोलन का स्वरूप सदैव अहिंसक रहे। आंदोलन पूर्णत: अराजनीतिक हो। आंदोलनकारियों का फोकस पूरी तरह किसानों की समस्याओं पर बना रहे। सबसे बढ़कर किसानों को अपनी अहिंसक शक्ति पर विश्वास हो तो सफलता अवश्य मिलेगी।
किसानों का मार्ग दुरूह है, संघर्ष लंबा चलेगा किंतु गांधी जी ने स्वतन्त्रता पूर्व जो मंत्र दिया था उसका अक्षर-अक्षर आज प्रासंगिक है- 'अगर विधानसभाएं किसानों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध होती हैं तो किसानों के पास सविनय अवज्ञा और असहयोग का अचूक इलाज तो हमेशा होगा ही। लेकिन...अंत में अन्याय या दमन से जो चीज प्रजा की रक्षा करती है वह कागजों पर लिखे जाने वाले कानून, वीरता पूर्ण शब्द या जोशीले भाषण नहीं है बल्कि अहिंसक संघटन, अनुशासन और बलिदान से पैदा होने वाली ताकत है।Ó (द बॉम्बे क्रॉनिकल 12 जनवरी 1945)