• डॉ. मनमोहन सिंह जैसे नेता चाहिए देश को

    पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का पिछले सप्ताह 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। डॉ. मनमोहन सिंह को तहेदिल से दी जा रही श्रद्धांजलि हमें और भी बहुत कुछ बताती हैं

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    जगदीश रत्तनानी

    एक ओर हम मनमोहन सिंह के निधन के बाद उनके प्रति जनता को अपना दिल उड़ेलते हुए देख सकते हैं। दूसरी ओर, कड़वाहट का मार्ग है जिसमें किसी व्यक्ति को असभ्यता और उंगली की ओर इशारे से नीचे खींचने की हरकत है। यह स्पष्ट सत्य है कि सरकार ने एक स्मारक स्थल का नामकरण करने में देरी की ताकि डॉ. सिंह का अंतिम संस्कार एक सार्वजनिक श्मशान में किया जा सके। अगर उस गलती को स्वीकार कर लिया जाता है तो कोई विवाद नहीं होगा। सरकार इसे अभी भी ठीक कर सकती है।

    पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का पिछले सप्ताह 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। डॉ. मनमोहन सिंह को तहेदिल से दी जा रही श्रद्धांजलि हमें और भी बहुत कुछ बताती हैं। यह उन खास गुणों को सामने ला रही हैं जिन्हें हम सभी लोगों में पसंद करते हैं, खासकर उन लोगों में जिन्हें हम नेता कहते हैं। ये वे गुण हैं जो 2014 में डॉ. सिंह के प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद से सत्ता पक्ष से गायब हो गए हैं।

    डॉ. सिंह के गुणों में शिष्टता, समझदारी, बोलने का संयमित तरीका, मानवीयता का दृष्टिकोण, सादगी और विनम्रता, लोगों की बात सुनने की भावना और चोट पहुंचा सकने वाले शब्दों का उपयोग करने से दृढ़ इनकार शामिल हैं। किसी का स्पष्ट अपमान करने में हिचकिचाहट और भले ही वह कड़वा सच जो दूर से कठोर लग सकता है, तो ऐसी कड़ी बात से त्वरित वापसी जैसे गुण उनमें थे। इनके अलावा तकनीकी ज्ञान, विशाल अनुभव और विनम्र पृष्ठभूमि के साथ आए उनके असंख्य बोनस गुणों पर विचार नहीं किया गया जिनके बलबूते उन्होंने अपने संघर्षमय जीवन की शुरुआत की।

    क्या डॉ. सिंह में कोई कमियां नहीं थीं? निश्चित रूप से थीं। उनके बारे में इतिहास फैसला सुनाएगा और शायद जैसा कि डॉ. सिंह ने स्वयं एक बार कहा था, यह फैसला उन लोगों के दिए फैसले की तुलना में अधिक दयालु होगा जिन्होंने उन पर एक ऐसे प्रतिष्ठान की अध्यक्षता करने का आरोप लगाया है जो अपना रास्ता खो चुका है और जिसके कारण पहली बार, भाजपा सत्ता पर काबिज हो सकी। सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री के रूप में उनके बाद इस पद पर आना 'विनाशकारी' होगा।

    उन्होंने जनवरी 2014 में कहा- '... मैं ईमानदारी से मानता हूं कि श्री नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में होना देश के लिए विनाशकारी होगा'। विचार करें कि सिंह ने खुद इसे बाद में एक 'कठोर' टिप्पणी के रूप में देखा और जब 2018 में उनसे मूल टिप्पणी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा ='मैंने कहा था कि मोदी प्रधानमंत्री के रूप में एक आपदा होंगे। अब मुझे लगता है कि मैंने एक कठोर शब्द का इस्तेमाल किया था जिसका मुझे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था। मैं इसे दोहराना नहीं चाहता। लेकिन वह समय दूर नहीं जब बड़े पैमाने पर जनता को मोदी जी द्वारा बनाई गई सार्वजनिक नीति के प्रभाव पर बोलने का मौका मिलेगा'। यह बयान सबसे अलग है और शायद इतिहास में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के नाम की सबसे शालीन अस्वीकृति में से एक के रूप में अंकित रहेगा।

    इसकी तुलना उस अशोभनीयता से कीजिए जिसके साथ भाजपा डॉ. सिंह के अंतिम संस्कार को लेकर राजनीति खेल रही थी। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के निधन पर उनके अंतिम संस्कार को लेकर कथित तौर पर कांग्रेस पार्टी के खराब व्यवहार पर एक अनावश्यक विवाद को उठाने की कोशिश की जा रही है। मनमोहन सिंह के बाद के दौर में लगभग हर मुद्दे को सनसनीखेज, 'बनावटी' या सांप्रदायिक बनाने की कोशिश की जाती है। नीतियां और योजनाएं अंडर-बेक्ड और नियंत्रण के बाहर हैं।
    एक ओर हम मनमोहन सिंह के निधन के बाद उनके प्रति जनता को अपना दिल उड़ेलते हुए देख सकते हैं। दूसरी ओर, कड़वाहट का मार्ग है जिसमें किसी व्यक्ति को असभ्यता और उंगली की ओर इशारे से नीचे खींचने की हरकत है। यह स्पष्ट सत्य है कि सरकार ने एक स्मारक स्थल का नामकरण करने में देरी की ताकि डॉ. सिंह का अंतिम संस्कार एक सार्वजनिक श्मशान में किया जा सके। अगर उस गलती को स्वीकार कर लिया जाता है तो कोई विवाद नहीं होगा। सरकार इसे अभी भी ठीक कर सकती है।

    सामान्यत: यह कहा जाता है कि नेताओं की मौजूदगी होनी चाहिए और अक्सर वे उस विरासत के बारे में चिंतित होते हैं जो वे पीछे छोड़ते हैं। दरअसल यह एक ऐसा सवाल है जिस पर सभी लोगों को अपने जीवन में किसी मौके पर विचार करना ही होता है। रोजमर्रा के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उपयोग किए जाने वाले एक अभ्यास में अक्सर प्रतिभागियों को उनकी मृत्यु की कल्पना करने के लिए कहा जाता है; और फिर वे यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि वे अपने अंतिम संस्कार में क्या पसंद कर सकते हैं। जवाब का ज्यादातर सत्ता, धन, नस्ल, धर्म या जाति से कोई लेना-देना नहीं है। 'आपको किस लिए याद किया जाएगा?' एक ऐसा प्रश्न है जो उन उत्तरों को ट्रिगर करता है जो ज्यादातर सेवा, मानवता और कनेक्शन से संबंधित होते हैं। यह एक्सरसाईज स्टीफन आर. कोवे के बेस्टसेलर ('अत्यधिक प्रभावी लोगों की 7 आदतें') की पुस्तक से है। यह एक्सरसाईज लोगों को उद्देश्य खोजने, अधिक सार्थक रूप से जीने और अपने साथी-सहयोगियों के प्रति देखभाल की समझ विकसित करने में मदद कर सकती है।

    जब पर्दा गिरेगा तब तुच्छ और बड़बोलेपन से दूर एक हकीकत सामने आएगी जो एक शाश्वत कहानी है- भव्यता को शालीनता मात देती है, साधारण कुर्ता फैशनेबल कपड़ों को पछाड़ देगा और मेजें थपथपाने, छाती पीटने या एक लाईन की टिप्पणियों के शोर-शराबे में एक छोटा सा काम अपने आप उभरकर सामने आएगा।
    हम नए साल में कदम रख रहे हैं लेकिन कुछ घटनाएं वैश्विक स्तर पर प्रभावी होती हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता जिमी कार्टर का 100 वर्ष की आयु में निधन हो गया। कार्टर और 20 जनवरी, 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने वाले डोनाल्ड ट्रम्प के बीच अनोखा विरोधाभास है। इजरायल पर कार्टर की स्पष्ट और सुसंगत नीति, फिलिस्तीनियों के अधिकारों के लिए उनकी लड़ाई या राष्ट्रपति बनने से पहले अमेरिकी लोगों के लिए उनके शब्दों पर विचार करें- 'अगर मैं कभी आपसे झूठ बोलता हूं, अगर मैं कभी भी भ्रामक बयान देता हूं तो मुझे वोट न दें। तब मैं आपका राष्ट्रपति बनने के लायक नहीं हूं।'

    यह हकीकत है कि कार्टर अगला चुनाव रोनाल्ड रीगन से हार गए। मनमोहन सिंह भी दो कार्यकाल के बाद मोदी से हार गए। दोनों मामलों ने राजनीति का स्वरूप तय किया। फिर भी, उनके जाने के लंबे समय बाद ये नेता लोगों के दिल, दिमाग और इतिहास की किताबों में विजेता के रूप में खड़े होंगे।
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)

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