भारत में पत्रकारिता सत्ता के दलदल में कितने गहरे जा धंसी है, इसका ताजा उदाहरण अर्णव चैट लीक कांड है। रिपब्लिक टीवी चैनल के सीईओ अर्णव गोस्वामी ने अपनी एंकरिंग शुरु से अलग अंदाज में की। पहले वे जिन चैनलों में काम करते थे वहां भी उन्होंने चीख-चीख कर सवाल पूछे और यही बताने की कोशिश की कि वे देशभक्त हैं, सच्चे हैं, जबकि उनकी बात काटने वाला गलत ही नहीं, राष्ट्रविरोधी भी है। बाद में अपना चैनल उन्होंने खोला, तो उनका राष्ट्रवाद बारूद और जहर के मिश्रण के साथ पसरने लगा।
किसी को लगता था कि उनका चिल्लाना या सरकार का खुलकर साथ देना ही भ्रष्टाचार और आतंकवाद जैसी समस्याओं का समाधान है। किसी को लगता था कि वे कांग्रेस, गांधी परिवार के विरोधी हैं, और मोदी-शाह वाली भाजपा के पक्के समर्थक हैं, इसलिए उनका चैनल, उनके कार्यक्रम एकतरफा होते हैं। इसमें उनकी पत्रकारिता पर सवाल उठते थे, लेकिन अब उनके जो व्हाट्सऐप चैट सामने आए हैं, उसे पढ़कर तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
क्योंकि अब यह लग रहा है कि जो कुछ अर्णव गोस्वामी चीख-चीख कर अब तक कहते आए हैं, जिस तरह अपने कार्यक्रमों में मेहमानों को पक्ष और विपक्ष दो हिस्सों में बांटकर विपक्षियों को अपमानित करते हुए सवाल पूछते रहे हैं, वो दरअसल पत्रकारिता का कोई रूप ही नहीं था। बल्कि सब किसी गहरी साजिश के तहत चल रहा खेल था, जिसमें केवल दर्शक ही मूर्ख नहीं बने, पूरे देश के हितों को दांव पर लगा दिया गया। सोशल मीडिया पर व्हाट्सऐप चैट के स्क्रीन शॉट वायरल हो चुके हैं और इसे अर्णवगेट कहा जा रहा है। इन व्हाट्सऐप चैट की सत्यता की पुष्टि हम नहीं कर सकते हैं, लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इसका कोई खंडन भी नहीं आया है।
दरअसल कुछ महीने पहले ही रिपब्लिक टीवी चैनल के सीईओ अर्णव गोस्वामी पर मुंबई पुलिस ने टीआरपी घोटाले का आरोप लगाया था और अब पुलिस की चार्जशीट में कुछ व्हाट्सऐप चैट के स्क्रीन शॉट सामने आए हैं, जिनसे पता चलता है कि टीआरपी बढ़ाने के लिए किस तरह का साजिश भरा खेल खेला जा रहा था। यह बातचीत टीवी रेटिंग एजेंसी बार्क के तत्कालीन सीईओ पार्थो दास गुप्ता और अर्णव गोस्वामी के बीच बताई जा रही है। जिस तरह की बातचीत हुई है, अगर वो सच है तो देश वाकई जानना चाहेगा कि हम कैसे निजाम में रह रहे हैं।
मार्च 2019 के चैट में अर्णव से एक व्यक्ति कह रहा है कि वे पीएमओ के जरिए मदद की कोशिश करें। इस पर अर्णव का जवाब है- नोटेड एंड विल हैपन यानी हो जाएगा। आगे वे लिख रहे हैं कि गुरुवार को वे प्रधानमंत्री से मुलाकात कर सकते हैं। एक अन्य चैट में पीडीजीए (शायद पार्थो दासगुप्ता) टीआरपी के संदर्भ में हो रही बातचीत में कह रहे हैं, सियासी खेल शुरू हो चुका है, मंत्रियों का हवाला दिया जा रहा है। इस पर अर्णव की तरफ से जवाब लिखा है, 'सभी मंत्री हमारे साथ हैं। बाकी सारी बातें बेतुकी हैं।'
कई चैट से यह संकेत मिलता है कि बार्क के अधिकारी रिपब्लिक टीवी और रिपब्लिक भारत के पक्ष में रेटिंग बढ़ाने के लिए कुछ हेरफेर कर रहे थे। इसके बदले में अर्णव गोस्वामी दासगुप्ता को सूचना व प्रसारण मंत्रालय, कैबिनेट फेरबदल और सचिवों की नियुक्तियों जैसी अहम जानकारी दे रहे थे। अगर बात इतनी ही होती तब भी अधिक आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि सत्ता के गलियारों में दखल रखने वाले देश के कई रसूखदार पत्रकार तबादला, पोस्टिंग, नीतियां बनवाने आदि की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, बदले में उद्योगपतियों से मासिक वेतन पाते हैं, सरकारी आयोगों में पद हासिल करते हैं। लेकिन अर्णवगेट में सामने आया खेल, कहीं अधिक गंभीर प्रवृत्ति का है। इसमें उस पुलवामा हमले का भी जिक्र है, जिसमें देश ने 40 जवानों को खो दिया था। इस पर कथित तौर पर टिप्पणी करते हुए गोस्वामी ने कहा था कि, इस हमले से हमारी बड़ी जीत हुई है।
याद रहे कि देश को झकझोर कर रख देने वाले इस आतंकी हमले पर जिन लोगों ने भी सरकार से सवाल किए, उन्हें देशविरोधी कहा गया था, और सरकार ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया था कि सुरक्षा के लिहाज से इतने संवेदनशील इलाके में बारूद से भरी कार कैसे पहुंच गई। इसके बाद बालाकोट पर सर्जिकल स्ट्राइक हुई और उसके भी संकेत व्हाट्सऐप चैट में पहले से हैं। इस बारे में कांग्रेस ने जांच की मांग की है, जो ठीक भी है, क्योंकि रक्षा से जुड़ी अति गोपनीय जानकारी किसी टीवी चैनल के मालिक को अगर पहले से है, तो इसका मतलब जवानों की जान की कीमत पर सत्ता हासिल करने की भूमिका तैयार कर ली गई थी। जबकि जनता को राष्ट्रवाद की अफीम चटाई जा रही थी। उस अफीम का असर आम चुनावों के नतीजों में सामने भी आ गया है। इन चैट्स में जजों को खरीदने, भाजपा के प्रवक्ता को बेवकूफ बताने, कुछ मंत्रियों को नाकारा बताने, साथी पत्रकारों को पीछे करने जैसी बातें भी सामने आई हैं।
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ट्वीट में अर्णव गोस्वामी के लिए लिखा है कि कानून के शासन वाले किसी भी देश में वह लंबे समय तक जेल में रहेंगे। सवाल यही है कि क्या इस देश में अब कानून का राज बचा है। किसान आंदोलन में शामिल लोगों या विश्वविद्यालयों में सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों या केवल सरकार का मजाक उड़ाने वालों में राष्ट्रविरोधी तत्वों को ढूंढ निकालने वाली सरकार क्या उन लोगों को कभी ढूंढ पाएगी, जो पद और पैसे के लालच में देश का हित प्राइमटाइम में बेच रहे हैं। या फिर इस हमाम में सब एक जैसे हैं।