- जगदीश रत्तनानी
मंदिर के उद्घाटन के स्वरूप और वास्तविकता पर उनके बयान राजनीतिक ताकतों के सामने एक ताज़ा असंतोष लाते हैं जिन ताकतों ने असंतोष को मिटाने के लिए सब कुछ किया है। हमारे यहां राजनीति और धर्म का घालमेल है लेकिन जहां तक वे देश की अच्छी तरह से सेवा करते हैं। ऐतिहासिक रूप से शंकराचार्यों के विचार हमेशा प्रगतिशील नहीं रहे हैं और उन्होंने सामाजिक-धार्मिक सुधारों और सभी जातियों और वर्गों के लिए मंदिर-प्रवेश के मुद्दों पर गांधी की लड़ाई का स्वागत नहीं किया है।
22 जनवरी को राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर भारत के बड़े हिस्से में उत्साहपूर्ण अभूतपूर्व प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं, तो वहीं दूसरी तरफ आंतरिक विसंगतियों के साथ बड़े धर्माचार्यों- शंकराचार्यों के कड़े विरोध के बीच सदियों पुराने शास्त्रों और हिंदू परंपराओं के उल्लंघन का हवाला दिया गया है। यह समारोह हमारे लिए भगवा झंडों का एक सागर लेकर आया, विशेष रूप से उत्तर भारत में जहां इसने एक राजनीतिक लामबंदी को उजागर किया। जिसने भाजपा और कई अन्य को आश्वासन दिया कि इससे 2024 के राष्ट्रीय चुनावों में पार्टी को अभूतपूर्व लाभ मिलेगा। पहले मंदिर के उद्घाटन का विरोध, शास्त्रों की तकनीकी बातों पर जिक्र, फिर निमंत्रण पर और बाद में समग्र औचित्य और राजनीतिक कब्जे के बड़े मुद्दों पर मतभेद सामने आए जो मंदिर समर्थक व्यापक समूह के भीतर एक साझा समझ और विश्वास के आंतरिक विरोध की ओर इशारा करते हैं। हर कोई उस कमांड-एंड-कंट्रोल ऑपरेशन को पचाने के लिए तैयार नहीं है जिसे भाजपा के रणनीतिकारों ने मंदिर आंदोलन में बदल दिया है। निश्चित रूप से शंकराचार्य भी नहीं जिन्होंने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर विरोध जताया है। ऐसा महसूस होता है कि भाजपा अपने मतदाताओं से कह रही है- 'हमने आपको मंदिर दिया। हम रास्ता जानते हैं। हमारे पीछे चलें और कोई प्रश्न न पूछें।' राजनीतिक भक्तों की फौज के कई लोग इससे सहमत प्रतीत होते हैं। लेकिन अब जो असहज हैं, वे मानों कहते हैं- 'हमने इसके लिए लड़ाई लड़ी और यह वह नहीं है जिस बारे में हमने बातचीत की थी।'
उद्घाटन की तारीख, अभिषेक समारोह के केन्द्र में प्रधानमंत्री का होना, शंकराचार्यों के साथ अशोभनीय व्यवहार और बाद में कार्यक्रम में शामिल होने से उनका इंकार, भाजपा समर्थक उद्योगपतियों की उपस्थिति और निमंत्रितों के चयन में धन और शोबिज का प्रदर्शन, भौतिक आडंबर पर ध्यान केंद्रित करना, राजनीतिक उद्देश्य से किए गए उद्घाटन में सुरक्षा बलों के अपरिहार्य अत्यधिक उपयोग को लेकर मंदिर के मुद्दे पर भाजपा के साथ माने जाने वाले लोगों ने भी सवाल उठाए हैं। यह पहली बार नहीं है जब भाजपा का साथ देने वाले दलों ने खुद को अलग-थलग महसूस किया है या भाजपा को भीतरी दुश्मन के रूप में देखा है। भाजपा एक ऐसी ताकत है जो हर कीमत पर अपना विस्तार चाहती है। अगर आपको कोई शक है तो महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और उनकी शिवसेना से पूछिए!
22 जनवरी को राजनीतिक लामबंदी के साथ घुल-मिल चुकी भक्ति के प्रदर्शन में शंकराचार्यों का असंतोष एक महत्वपूर्ण आवाज का प्रतिनिधित्व करता है जो भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा पेश की गई राजनीतिक कहानी के विपरीत है। असहमति की आवाज स्पष्ट, असंदिग्ध और निष्पक्ष है और जो भविष्य के अयोध्या-धाम के लिए अतिशयोक्तिपूर्ण विशेषणों से सज्जित, अतिरंजित दावों के इर्द-गिर्द घूमने वाली बयानबाजी के विपरीत है। शंकराचार्य की दलीलें हालांकि इन अर्थों में भाजपा द्वारा मंदिर आंदोलन पर राजनीतिक कब्जा, संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए आंदोलन को हथियार बनाने और उनके गुस्से के तात्कालिक कारण की ओर इशारा नहीं करती हैं। शंकराचार्यों को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की तारीख, किसी शुभ मुहूर्त, मूर्ति से कुछ लेना-देना नहीं है। आने वाले चुनावों को निगाह में रखकर भाजपा यह सब कुछ कर रही है। शंकराचार्यों ने जोर देकर और दृढ़ विश्वास के साथ बताया है कि चूंकि मंदिर का निर्माण कार्य अभी जारी है और पूरा नहीं हुआ है इसलिए इसका उद्घाटन अभी नहीं किया जा सकता है ।
संक्षेप में, शंकराचार्यों की ओर से जो बयान आ रहे हैं उन्होंने भाजपा के उस सपने को तहस-नहस कर दिया है जिस पर भाजपा अपना चुनाव अभियान तैयार करती दिख रही है। इन आलोचकों में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती प्रमुख हैं।
आज की स्थिति के अनुसार इन दृष्टिकोणों का धर्म, परंपरा और नैतिकता में एक मजबूत आधार है लेकिन जरूरी नहीं कि यह एक राजनीतिक बढ़त हो जिससे भाजपा चिंतित हो सकती है। उन वोटों में शंकराचार्य सेंध नहीं लगा सकते हैं जिन्हें भाजपा मंदिर के बदले में भुनाने की उम्मीद करती है। फिर भी शंकराचार्य, उनकी संस्था में सन्निहित वेद और शास्त्रों तथा समझ के प्रारंभ के एक महत्वपूर्ण बिंदु को चिह्नित करते हैं। वे उन लोगों को चुनौती देते हैं जो राजनीतिक पुरस्कारों के लिए वेद और उन की तरह के शास्त्रों और परंपराओं का उपयोग कर रहे हैं।
यह उल्लेखनीय है कि अयोध्या के घटनाक्रम के खिलाफ एक स्पष्ट और मुखर नजरिया भाजपा के राजनीतिक विरोधियों की ओर से नहीं बल्कि धार्मिक नेताओं की ओर से आया है जो स्पष्ट तरीके से अपने तर्क रखते हुए संघर्ष कर रहे हैं। पूरे घटनाक्रम में आया यह अप्रत्याशित मोड़ वर्तमान संवाद की जटिल प्रकृति और अतीत में आत्म-पराजय की कहानियों की ओर इशारा करता है जिन्होंने हमें सांप्रदायिकता के 'हार्ड' या 'सॉफ्ट' संस्करणों के रूप में चिह्नित सरलीकृत समझ और रंग दिये हैं या दूसरे चरम बिंदु पर धर्म और राजनीति के बीच एक मजबूत और सुस्पष्ट विभाजन रेखा की मांग खड़ी कर दी है
इनमें से प्रत्येक भावना अपने तरीके से शोषणकारी है और उन मूल्यों व सिद्धांतों की सराहना नहीं करती है जिनका उल्लेख किया जाता है। उदाहरण के लिए महात्मा गांधी ने बिना किसी हिचकिचाहट के धर्म के साथ राजनीति पर अपने विचारों को अपने प्रवचनों में बताया है। गांधी ने खुले तौर पर राम को अपने भगवान और उद्धारकर्ता के रूप में देखा और राम को एक समावेशी राजनीतिक संभाषण में ले कर आए। उन्होंने कहा- 'राम ने... मेरे सबसे अंधेरे समय को रोशन कर दिया है। एक ईसाई को यीशु का नाम जपने से वैसी ही सांत्वना मिल सकती है और अल्लाह का नाम जपने से एक मुस्लिम को वैसी ही तसल्ली मिल सकती है। इन सभी चीजों के समान निहितार्थ हैं और वे समान परिस्थितियों में समान परिणाम उत्पन्न करते हैं, लेकिन (नाम जप की) यह पुनरावृत्ति सिर्फ होंठो की अभिव्यक्ति नहीं होनी चाहिए बल्कि आपके अस्तित्व का हिस्सा होना चाहिए।'
दिलचस्प बात यह है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ही वे व्यक्ति हैं जिन्होंने हाल ही में गांधी का जिक्र करते हुए अपने श्रोताओं को गांधी के बलिदान, देश के लिए उनके कार्य, कैसे देश अब अपना रास्ता भटक चुका है तथा गांधी को महात्मा की उपाधि कैसे और क्यों मिली, के बारे में समझाया। शंकराचार्य खुले तौर पर और पूरी तरह से अपनी भूमिकाओं तथा स्थिति की परिभाषा से निश्चित रूप से धार्मिक हैं।
मंदिर के उद्घाटन के स्वरूप और वास्तविकता पर उनके बयान राजनीतिक ताकतों के सामने एक ताज़ा असंतोष लाते हैं जिन ताकतों ने असंतोष को मिटाने के लिए सब कुछ किया है। हमारे यहां राजनीति और धर्म का घालमेल है लेकिन जहां तक वे देश की अच्छी तरह से सेवा करते हैं। ऐतिहासिक रूप से शंकराचार्यों के विचार हमेशा प्रगतिशील नहीं रहे हैं और उन्होंने सामाजिक-धार्मिक सुधारों और सभी जातियों और वर्गों के लिए मंदिर-प्रवेश के मुद्दों पर गांधी की लड़ाई का स्वागत नहीं किया है।
अयोध्या मंदिर में श्रीराम की प्राण-प्रतिष्ठा पर शंकराचार्य की असहमति पर भाजपा ने आक्रामक प्रतिक्रिया दी है। महाराष्ट्र से निर्वाचित केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने पूछा कि 'शंकराचार्यों ने हिंदू धर्म के लिए क्या किया है' जबकि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 'कोई भी भगवान राम से बड़ा नहीं हो सकता है।'
जल्द ही ये हमले बंद हो गए हैं और ऐसा लगता है कि भाजपा नेतृत्व ने महसूस किया कि जगद्गुरुओं को खुले तौर पर निशाना बनाना उल्टा असर डालने वाला हो सकता है।
इस बीच अयोध्या को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर लाने की मांग की जा रही है। यह सामान्य रूप से व्यापारिक बात हो सकती है क्योंकि सत्ता से अच्छी तरह से जुड़े बिल्डर जमीन खरीदते हैं ताकि इस जमीन को धन निवेश की तलाश करने वाले निवेशकों के सामने अत्यधिक ऊंची कीमत पर बिक्री के लिए रखी जा सके। ऐसे ही एक प्रस्ताव में कहा गया है- 'पवित्र सरयू नदी के तट पर एक एकीकृत पांच सितारा होटल के साथ अयोध्या का पहला सात सितारा मिश्रित उपयोग विकास शुरू करना। जो श्री राम जन्मभूमि मंदिर से 15 मिनट और श्री राम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से 30 मिनट की दूरी पर स्थित है।' 1250 वर्ग फुट क्षेत्रफल वाले प्लॉट की कीमत रुपए 1.70 करोड़ से शुरू होती है। बुकिंग खुली है। बताया जाता है कि अमिताभ बच्चन ने उनका प्लॉट बुक कराया है। अयोध्या में 'विकास' आ रहा है!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)