- जगदीश रत्तनानी
कई ऐसे लोग हैं जो इसमें आरएसएस का दोमुंहापन देखते है और जो मानते हैं कि संघ भाजपा का वैचारिक अभिभावक है एवं उसे उन सभी ज्यादतियों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए जो हमने मोदी-युग के दौरान देखी हैं। आखिरकार मोदी आरएसएस की विचारधारा के विद्यार्थी हैं और वे वही ढोल बजा रहे हैं जो संगठन ने उन्हें सिखाया है। बाकी सब जो हो रहा है वह आरएसएस की छत्रछाया में नूरा कुश्ती है और नियंत्रण का अस्थायी बदलाव है।
इस बारे में बहुत कुछ लिखा गया है कि 2024 के चुनावों पर नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का भाषण सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर इशारा करता है। यह कहा जाता है कि भागवत ने उनकी निंदा किए या उनका नाम लिए बिना सब कुछ कह दिया है और अपने इच्छित लक्ष्य के बारे में कोई संदेह नहीं छोड़ा है। आरएसएस प्रमुख ने कहा है कि चुनाव युद्ध नहीं है, दोनों पक्षों को सुनने के लिए एक दृष्टिकोण है और सच यह है कि सेवक वह है जो मर्यादा में रहकर और अहंकार के बिना सेवा करता है। उन्होंने यह भी कहा कि मणिपुर में मुद्दों को एक साल से अधिक समय से उपेक्षित किया गया है। समझदारी का इशारा देने वाले इन शब्दों को और किसकी ओर निर्देशित किया जा सकता है? भागवत के बयान के बाद इसे व्यापक रूप से मोदी विरोधी वक्तव्य के रूप में देखे जाने के बाद अज्ञात स्रोतों के माध्यम से संघ ने यह स्पष्ट करना उचित समझा है कि वह उस व्यक्ति के बारे में ऐसा कोई इरादा नहीं रखता है जिसने अभी तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है।
कई ऐसे लोग हैं जो इसमें आरएसएस का दोमुंहापन देखते है और जो मानते हैं कि संघ भाजपा का वैचारिक अभिभावक है एवं उसे उन सभी ज्यादतियों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए जो हमने मोदी-युग के दौरान देखी हैं। आखिरकार मोदी आरएसएस की विचारधारा के विद्यार्थी हैं और वे वही ढोल बजा रहे हैं जो संगठन ने उन्हें सिखाया है। बाकी सब जो हो रहा है वह आरएसएस की छत्रछाया में नूरा कुश्ती है और नियंत्रण का अस्थायी बदलाव है। फिर भी यह विचार है कि आरएसएस के हालिया बयानों में कुछ और भी है, खासकर जब वे भाजपा के चुनावी हार के मद्देनजर आते हैं। इसमें आंशिक रूप से निर्मित और जल्दबाजी में उद्घाटित राम मंदिर के निर्वाचन क्षेत्र में सीट खोना भी शामिल है।
यह देखते हुए कि चूंकि भारतीय जनता पार्टी एक व्यक्ति के हाथों में सिमट गई है और अपने दम पर सोच नहीं सकती है तो इन हालातों में यह चुनाव आरएसएस में कुछ वास्तविक पुनर्विचार के लिए ट्रिगर हो सकते हैं। आज यह आरएसएस की उस दुविधा को सामने ला रहा है कि इसके एजेंडा को नरेंद्र मोदी की सरकार ने पूरा किया है, संघ एक ऐसी सरकार से शक्ति और संसाधन प्राप्त कर सकता है जो अब एक दशक से अधिक समय से पूर्ण नियंत्रण में है लेकिन ऐसा लगता है कि यह उस तौर तरीके को नापसंद कर रहा है जिसे इस प्रक्रिया में मोदी ने अपने चारों ओर बनाया है।
दूसरे शब्दों में कहें तो आरएसएस के नजरिए से नीतियां 'अच्छी' हैं लेकिन उन्हें व्यवहार में लाने वाला व्यक्ति सही नहीं है। संघ के द्वितीय सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने एक बार कहा था कि- आरएसएस कार्यकर्ता की 'असाधारणता' ठीक ऐसी होनी चाहिए कि हर कार्यकर्ता खुद को 'साधारण' माने। आज आरएसएस को भाजपा के एक ऐसे प्रधानमंत्री से जूझना होगा जो खुद को इश्वर का भेजा हुआ और गैर-जैविक अवतार बताते हुए स्वयं को प्रधान सेवक कहता है और जो यह कहते नहीं थकता कि वह कितना असाधारण है।
आरएसएस के नजरिए से यह सरल सवाल है कि क्या आपके काम करने के भुगतान की यह बहुत अधिक कीमत है या क्या ऐसा नहीं है? क्या यह आरएसएस की वर्षों पुरानी इच्छाओं के सच होने का स्वर्णिम काल है जिसमें अयोध्या का राम मंदिर, जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाना, अधिकांश राज्यों में गोहत्या पर प्रतिबंध, नागरिक संशोधन अधिनियम (सीएए) का एजेंडा, समान नागरिक संहिता की ओर कदम, ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध आदि शामिल है या ये उस सड़ी हुई संस्कृति के 'उपहार' हैं जो एक ऐसी पार्टी में अंतर्निहित हो गई है जिसने हमें चुनावी बांडों में देखा गया भ्रष्टाचार, लोकतांत्रिक संस्थानों पर कब्जा, भारत की प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में गिरावट, गैर-भाजपा सरकारों को तोड़ने के लिए जांच एजेंसियों का दुरुपयोग और यह सब कुछ अगर बढ़ती संपत्ति और आय असमानता को लेकर है जो राष्ट्र की गर्म बहस बनने और बने रहने का वादा करता है? यह आरएसएस को खुश करने के लिए साध्य हैं लेकिन इस साध्य के साधनों के बारे में क्या कहा जाए? आखिरकार अपने स्वयंसेवकों के बीच चरित्र निर्माण करना संघ का घोषित लक्ष्य है। यह लक्ष्य धनबल, ग्लैमर मार्केटिंग और घृणा की भाषा के युग में कैसे साध्य है जिसमें चुनाव अभियान में जहर घोलने के लिए प्रधानमंत्री मटन, मंगलसूत्र और मुजरा जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं?
गांधी ने हमें बताया कि साध्य की प्राप्ति के लिए साधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। वास्तव में वे केवल साधनों के बारे में चिंतित थे, उसके अंत के बारे में नहीं। वे कहते हैं कि, 'साधन सभी चीजों से ऊपर हैं। मैं कहूंगा कि साधन सब कुछ के बाद हैं। साधन जैसा है, अंत वैसा ही होगा। मुझे लगता है कि लक्ष्य की दिशा में हमारी प्रगति हमारे साधनों की शुद्धता के सटीक अनुपात में होगी।'
प्रबंधन गुरु स्वर्गीय जैक वेल्च ने प्रबंधकों की उपलब्धियों (परिणाम) और उनके मूल्यों (साधन) को एक सांचे में फिट किया था- कुछ नतीजे देते हैं और मूल्यों का सम्मान करते हैं (उन्होंने कहा कि उन्हें बढ़ावा दें), अन्य न तो परिणाम लाते हैं और न ही मूल्यों का सम्मान करते हैं (उन्हें खारिज कर दीजिये), कुछ अन्य के पास मूल्य हैं लेकिन परिणाम कम हैं (उन्हें समर्थन दें) और अंतिम किस्म, जो किसी भी प्रणाली के लिए सबसे खतरनाक है- वे प्रबंधक जिसके पास कोई मूल्य नहीं है लेकिन तिमाही दर तिमाही आंकड़े पर आंकड़े देते रहते हैं। ये सबसे नुकसानदेह है और सुझाव यह है कि अगर संगठन को जीवित रखना है, उसे पनपने देना है तो यही वे लोग हैं जिसे पहले और तत्काल बर्खास्त किया जाना चाहिए। फिर भी, यदि सब कुछ अच्छा चल रहा हो तो यह सबसे कठिन निर्णय हो सकता है। यह ढांचा तब लागू होता है जब अंतिम परिणाम वैध, न्यायसंगत और विवेकसम्मत होते हैं।
एक पल के लिए भूल जाइए कि आरएसएस अपने आप में समाप्त हो जाता है। फिर भी, इन संकरे सिरों के साथ उसने अपने घोषित साधनों के साथ रास्ते पार कर लिए हैं। इसलिए अपने स्वयं के विश्व के भीतर और अपनी संरचनात्मक अखंडता के लिए साधन-साध्य वे प्रश्न हैं जिसका जवाब आरएसएस को देना होगा। इस आलोक में मोहन भागवत के शब्द बेचैनी का संकेत देते हैं, पर मोदी का नाम लेने और उन्हें बाहर निकालने में उनकी हिचकिचाहट इस बात की ओर इशारा करती है कि वह अपने ही बनाए जाल में फंस गया है।
संघ को लाभ भी मिला है। नए और आलीशान दफ्तरों, सरकारी पदों की तो बात ही छोड़िए, अधिकारियों में सम्मानजनक स्वागत, मोहन भागवत के साथ चलने वाले एसपीजी जैसे गार्डों के समूह की भी बात को छोड़िए- यह सब संगठन के ग्लैमर और सत्ता के स्वाद का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। आप कह सकते हैं कि मोदी सत्ता के नशे में चूर हैं परन्तु भाजपा भी पलट सकती है और कह सकती है कि आज आरएसएस भी उसी गिलास से सत्ता का नशा पी रहा है!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)