• जलवायु बदलाव के दौर में डा. रिछारिया की याद

    छत्तीसगढ़ में इन दिनों किसान बारिश न होने के कारण चिंतित हैं। कुछ किसानों ने छिड़काव कर धान की खेती की है, कई रोपा पद्धति से धान रोपाई के लिए बारिश का इंतजार कर रहे हैं।

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    कृषि वैज्ञानिक आर.एच. रिछारिया ने अविभाजित मध्यप्रदेश ( जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल था) से धान की 17 हजार से ज्यादा देसी किसानों को एकत्र किया था जिसमें अधिक उत्पादकता देने वाली, सुगंधित व अन्य तरह से स्वादिष्ट किस्में शामिल थीं। डा. रिछारिया चावल की किस्मों के विशेषज्ञ थे। वे मानते थे देसी किस्मों को ही देश में धान की खेती की प्रगति का आधार बनाना चाहिए। उन्होंने पता लगाया था कि धान की किस्मों की विविधता का बहुत अमूल्य भंडार है।

    छत्तीसगढ़ में इन दिनों किसान बारिश न होने के कारण चिंतित हैं। कुछ किसानों ने छिड़काव कर धान की खेती की है, कई रोपा पद्धति से धान रोपाई के लिए बारिश का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे समय में देसी बीजों की हल-बैल की खेती याद कर रहे हैं। मुझे याद आ रहे हैं विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. आर.एच. रिछारिया, जिनकी मान्यता थी कि धान की खेती का विकास स्थानीय प्रजातियों के आधार पर ही होना चाहिए। क्योंकि उनमें काफी विविधता है, और वे मौसम बदलाव का भी मुकाबला कर सकती हैं। आज इस कॉलम में इस पर ही चर्चा करना उचित होगा।

    छत्तीसगढ़, देश में विशिष्ट विविधता वाला प्रदेश है। यहां भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के साथ पारिस्थितिकीय विविधता भी काफी है। यहां सबसे बड़ी आबादी आदिवासियों की है। छत्तीसगढ़ के मध्य में महानदी बहती है और यही इलाका धान की खेती के लिए प्रसिद्ध माना जाता है। आज धान के देसी बीजों की जगह उच्च उपज देने वाली किस्मों ने ले ली है। जबकि एक जमाने में देसी धान की खेती होती थी।
    यहां खाद्यों और अनाजों की भी काफी विविधता थी। अलग-अलग खेती की पद्धतियां थीं। फसलें, दालें, तिलहन, फल, फूल, हरी पत्तीदार सब्जियां, कंद-मूल, मशरूम आदि भी होती थीं। यहां के आदिवासियों का जीवन मुख्य तौर पर जंगल पर आधारित रहा है। पारंपरिक रूप से छत्तीसगढ़ को धान के कटोरे के रूप में जाना जाता है। यहां इलाका धान की अद्भुत विविधता है। इनमें कई तरह के विशिष्ट सुगंधित, औषधीय व गुणधर्म वाले देसी धान शामिल हैं।

    यहां कम अवधि की धान किस्मों के साथ लंबी अवधि की धान है, तो कम पानी में होने वाली धान के साथ गहरे पानी में होने वाले धान भी शामिल है। छोटे चावल से लेकर लंबे, महीन और विभिन्न आकारों वाले चावल होते हैं। लाल, सफेद, काले, और कई रंगों व गुणवत्ता वाले चावल शामिल हैं।

    मुझे डा. आर.एच.रिछारिया से एक बार रायपुर में मिलने का मौका था, जब वे स्वतंत्र रूप से धान की जैविक खेती को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे थे। डा. रिछारिया ने किसानों और आदिवासियों के साथ धान की देसी प्रजातियों पर काम किया था। उन्हें न केवल संग्रहीत किया था, बल्कि उनके गुणधर्मों व उत्पादन संबंधी अध्ययन किया था। उन्होंने किसानों के परंपरागत ज्ञान को काफी सराहा था।

    धान की खेती की एक बुनियादी विशेषता यह है कि यह लगभग पूरे भारत में बहुत अलग-अलग परिस्थितियों में उगाया जाता है। एक ही गांव और कई बार तो एक ही किसान अलग-अलग खेत में अलग-अलग प्रजाति का धान उगाया जाता है। प्रत्येक किस्म अलग-अलग परिस्थितियों के लिए, अलग-अलग गुणों के साथ उपयुक्त होती है। ये प्रजातियां वहां की मिट्टी, पानी, हवा के अनुकूल होती हैं।

    सैंकड़ों सालों से छत्तीसगढ़ के किसानों ने धान की खेती की कई पद्धतियां विकसित की हैं। उनका पारंपरिक ज्ञान इसमें काफी है। बियासी पद्धति, जिसमें छिड़काव कर धान की खेती की जाती है, और जब बारिश होती है तो पौधे जब कुछ बड़े हो जाते हैं, तो खेत में हल चला दिया जाता है, जिससे खरपतवार नीचे दब जाती है, और जो पौधे दूर-दूर होते हैं, उन्हें पास रोपा दिया जाता है। इससे जमीन भी हवादार व पोली हो जाती है, जिससे पौधे की बढ़वार अच्छी होती है। इससे उत्पादन भी अच्छा होता है।

    इसी तरह उतेरा पद्धति है, जिसमें धान की यानी बारिश की नमी में रबी फसल ली जाती है। उतेरा खेती में एक फसल कटने से पहले दूसरी फसल को बोया जाता है। यानी दूसरी फसलों की बुआई पहली फसल कटने के पहले ही कर दी जाती है। फसल के ठंडलों से खेत में जैव खाद बन जाती है। इस तरह की खेती छत्तीसगढ़ के कई गांव में की जाती है, हालांकि इसमें भी कमी आ रही है।

    उतेरा पद्धति में धान की फसल जब खड़ी रहती है, जब उसमें फूल आने लगते हैं, फसल में 50 प्रतिशत फूल आ जाते हैं, तब उसमें दूसरी फसलें बोई जाती हैं। यह समय अक्टूबर आखिर में या नवंबर के पहले हफ्ते का होता है। यानी बारिश की नमी में धान की फसल के बीच तिवड़ा ( खेसारी दाल),बटरी, अलसी, उड़द, सरसों व चना के बीज छिड़क दिए जाते हैं। इसमें सावधानी रखनी होती है कि खेत का पानी सूख जाए तभी बीजों का छिड़काव किया जाता है। इन फसलों को अलग-अलग नमी के हिसाब से छिड़कते हैं, या बोते हैं, एक साथ नहीं। क्योंकि हर बीज को अंकुरण होने के लिए अलग-अलग नमी चाहिए होती है, इसका किसानों को अनुमान है।

    इसमें धान कटाई बहुत ही सावधानी से की जाती है, जिससे दूसरी फसलों को नुकसान न पहुंचे। खेत में धान के डंठलों के बीच से तिवड़ा उग जाता है, जिसके पौधे को ठंडलों से मदद भी मिलती है। मार्च के आसपास यह फसलें तैयार हो जाती हैं और फिर काट ली जाती हैं। यानी बारिश की नमी में ही दूसरी फसलें भी पक जाती हैं। यह छत्तीसगढ़ के किसानों का परंपरागत जाना माना तरीका है। जिसमें बारिश की नमी का सही उपयोग होता है और दो फसलें भी मिल जाती हैं।

    इसी प्रकार, यहां किसान खेतों की मेड़ों पर भी अरहर, तिली, मूंग, अमाड़ी , भिंडी, बरबटी, झुनगा ( बरबटी की तरह), चुटचुटिया( ग्वारफली) आदि लगाते हैं। यानी खेत में धान, उतेरा में तिवड़ा, अलसी, बटरी, सरसों, उड़द, चना आदि लगाते हैं और मेड़ पर भी अरहर, तिली, हरी सब्जियां लगाते हैं।
    कुल मिलाकर, एक खेत में धान यानी चावल, दलहन व तिलहन सब कुछ हो जाता है। छत्तीसगढ़ की खान-पान की संस्कृति, तीज-त्यौहार व खेती से जुड़े हैं। यहां का प्रमुख भोजन चावल है, यानी भात, दाल और सब्जियां। सब कुछ किसान खेतों में उगा लेते हैं। अतिरिक्त फसलें होने से आर्थिक लाभ भी होता है। भोजन में भी पोषण मिलता है। यह मिश्रित फसलों का परंपरागत तरीका है।

    पशुपालन भी इससे जुड़ा है। धान का पैरा ( ठंडल) मवेशियों को चराने के काम आता है। बैल खेतों में जुताई करते थे। यह सब एक दूसरे से जुड़ा है। फसलों की कटाई हाथ से हंसिए से की जाती है। ठंडल बहुत छोटे होते हैं और उन्हें जलाने की जरूरत नहीं पड़ती। और जो गाय- बैल का गोबर होता है, उसे खेतों में डालते हैं जिससे मिट्टी उपजाऊ बनती है। यह मवेशियों व मनुष्य में आपसी समझौता होता है। पशुओं को खेतों से चारा मिलेगा और वे खेतों को गोबर खाद देंगे।

    परंपरागत खेती में आत्मनिर्भरता होती है। किसानों का खुद का देसी बीज, गोबर खाद और खुद हाथ की मेहनत होती है। और इसमें पीढ़ियों के पारंपरिक ज्ञान का उपयोग होता है। यह स्वावलंबी होती है। जबकि रासायनिक आधुनिक खेती में बीज, खाद और कीटनाशक सभी कुछ बाजार से खरीदा जाता है। इसमें किसान की लागत बढ़ती है, किसान परावलंबी होता है।

    लेकिन पिछले कुछ समय से परंपरागत खेती में कमी आई है। अब बैलों की जगह ट्रेक्टर से जुताई व फसलों की कटाई हारवेस्टर से होने लगी है। इसमें ठंडल बड़े होते हैं और इसे दूसरी फसल बोने के लिए किसान ठंडलों को जलाते हैं। इससे प्रदूषण होगा और गरमी की धान की फसल बोने से भूजल में कमी आएगी।
    जबकि उतेरा जैसी पद्धतियां उपयोगी हैं। इससे किसानों को धान के साथ दलहन, तिलहन और अतिरिक्त उपज मिल जाती है। बारिश की नमी का उपयोग भी हो जाता है। दलहन व फली वाली फसलों से खेतों को नत्रजन भी मिलती है। भोजन के लिए चावल, दाल और सब्जियां मिल जाती हैं, जो छत्तीसगढ़ की खान-पान की संस्कृति भी है। यह खेती मिट्टी पानी के संरक्षण वाली है, जैव-विविधता व पर्यावरण का संरक्षण भी इससे होता है। और इसमें फसलों के ठंडल व पुआल जलाने की जरूरत नहीं पड़ती।

    छत्तीसगढ़ के किसान खेती के लिए ज़मीन का स्वास्थ्य भी सुधारना भी जानते हैं। जिस प्रकार मनुष्य को भोजन में सभी प्रकार के पोषक तत्व चाहिए होते हैं, उसी प्रकार मिट्टी को भी उपजाऊ बनाने के लिए पोषक तत्व चाहिए। रासायनिक खेती के कारण ज़मीन की उर्वरा शक्ति कमजोर होती जा रही है और उर्वर बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणु खत्म होते जा रहे हैं। रासायनिक खाद के इस्तेमाल से ज़मीन सख्त होती जा रही है। भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए मिश्रित फ़सलों को खेतों में बोया जाता है। यह परंपरागत जाना माना तरीका है।

    हरी खाद को बनाने के लिए ढनढनी, सन, सोल, चरौरा को भी बोकर फिर मिट्टी में सड़ा दिया जाता है, जिससे ज़मीन उत्तरोत्तर उर्वर बनती जाती है। उन्होंने बताया कि इस भाटा कमजोर ज़मीन को हरी खाद से ही उर्वर बनाया है। यह तकनीक किसान बहुत अच्छी तरह जानते हैं।

    यहां बताना उचित होगा कि महान कृषि वैज्ञानिक आर.एच. रिछारिया ने अविभाजित मध्यप्रदेश ( जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल था) से धान की 17 हजार से ज्यादा देसी किसानों को एकत्र किया था जिसमें अधिक उत्पादकता देने वाली, सुगंधित व अन्य तरह से स्वादिष्ट किस्में शामिल थीं। डा. रिछारिया चावल की किस्मों के विशेषज्ञ थे। वे मानते थे देसी किस्मों को ही देश में धान की खेती की प्रगति का आधार बनाना चाहिए। उन्होंने पता लगाया था कि धान की किस्मों की विविधता का बहुत अमूल्य भंडार है। धान की विविधता जरूरी है क्योंकि विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों को चुनकर उगाया जा सके। उनकी यह सोच आज जलवायु बदलाव के दौर में बहुत ही उपयोगी और विकेन्द्रित है। इससे बदलते मौसम के अनुकूल मिट्टी-पानी के हिसाब से खेती में देसी किस्मों का चुनाव कर खेती की जा सकती है। किसान मौसम के अनुकूल खेती पद्धति में भी बदलाव कर सकते हैं। जैव विविधता के साथ पर्यावरण का भी संरक्षण होगा। लेकिन क्या हम इस दिशा में बढ़ने को तैयार हैं?

     

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