- डॉ. हनुमन्त यादव
तालिबान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई ने दावा किया है कि उनकी सरकार भारत के साथ अफगानिस्तान के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध जारी रखना चाहेगी। जम्मू व कश्मीर को अनावश्यक आतंकवादी हिंसा से बचाने के लिए भी अफगानिस्तान और भारत में राजनीतिक संबंध के साथ-साथ आर्थिक एवं व्यापारिक संबंध पुन: बहाल करने लिए शीघ्र प्रयास भारत के हित में अधिक जरूरी है।
तालिबान ने अफगानिस्तान की राजघानी काबुल में प्रवेश करते समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि निर्वाचित राष्ट्रपति अशरफ गनी पलायन करके कब्जे के लिए राजधानी निष्कंटक छोड़ जाएंगे। राजधानी काबुल पर कब्जा जमाते ही तालिबान ने अमेरिका को स्मरण कराना था कि उसको हर स्थिति में 31 अगस्त से पहले काबुल छोड़ देना है। 26 अगस्त को आईएसआईएस.के. आतंकी समूह के तीन विस्फोटों से काबुल विमानतल क्षेत्र दहला दिया, इसमें 13 अमरीकी कमांडो सहित 169 व्यक्ति मारे गए थे और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
अमेरिका ने अपने सैनिकों की मौत का बदला लेते हुए 28 अगस्त की रात्रि को नानगाहर में ड्रोन द्वारा बमबारी करके 26 अगस्त को बमबारी करने वाले आईएसआईएस.के. आतंकी को मौत के घाट उतार दिया। अमेरिका ने 29 अगस्त की संध्या आईएसआईएस.के. विस्फोटक से भरे वाहन और 30 अगस्त को प्रात: संदिग्ध आतंकी ठिकानों पर राकेटों से हमला किया। अमेरिका को काबुल छोड़ने में अभी दो दिन बाकी हैं।
ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि 28 अगस्त को ही काबुल से अपने देश की ओर से प्रस्थान कर गए। संयुक्त राज्य अमेरिका का राजनयिक स्टाफ एवं सैनिक दस्ते 31 अगस्त तक अमेरिका चले जाएंगे किंतु वह सैनिक एवं असैनिक चल व अचल साज-सामान अफगानिस्तान में ही छोड़ता जा रहा है। इसमें ऐसी उच्च प्रौद्योगिकी युक्त युद्ध सामग्री व वाहन भी शामिल हैं जिनके परिचालन हेतु उच्च प्रशिक्षित टेकनीशियन की जरूरत पड़ती है जिनका मिलना अफगानिस्तान में संभव नहीं है। अब तो इन सब पर तालिबान सरकार का स्चामित्व होने जा रहा है।
फिलहाल तालिबान सरकार ने प्रशासन को चलाने के लिए कार्यवाहक मंत्रियों की नियुंक्तियां की हैं। राष्ट्रपति एवं अन्य नियमित पदों पर नियुक्तियां 31 अगस्त के बाद होंगी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के हर दिन किसी न किसी समाचार माध्यम में उनके वक्तव्य आते रहते हैं। वे पाकिस्तान को अफगानिस्तान की तालिबान सरकार का सच्चा मित्र बताते हुए दावा करते हैं कि जब भी पाकिस्तान से सहयोग मांगा जाएगा वे सच्चे मित्र के नाते पूरा सहयोग प्रदान करेंगे।
फिलहाल तालिबान की सबसे बड़ी समस्या पंजशीर प्रान्त पर कब्जे की है। यही अफगानिस्तान का एकमात्र प्रान्त है जिस पर तालिबान के लड़ाके कब्जा नहीं कर सके हैं। अफगानिस्तान के स्वघोषित कार्यवाहक राष्ट्रपति के नेशनल रेजिसिटेंस फोर्स के विरोध के कारण तालिबान का इस प्रान्त पर कब्जा करना बहुत कठिन है। पंजशीर खनिज संपदा में धनी पर्वतीय घाटी है, इसके मैदानी प्रवेश द्वार तक आसान होने के कारण पहुंचा जा सकता है, किंतु घुमावदार पर्वतीय क्षेत्रों में आवागमन उतना ही कठिन है। यही कारण है कि अफगानिस्तान के शासकों ने इस घाटी के लिए सैनिक सर्वेक्षण से परहेज किया है। वे अपने शासनकाल में पंजशीर को पुस्तैनी प्रभारियों को सौंपते जाते थे। मेरे विचार में तालिबान के लिए यह अधिक बेहतर होगा कि वह पहले अफगानिस्तान पर सैनिक प्रशासन के साथ-साथ नागरिक प्रशासकों की नियुक्ति करके कुछ माह में शेष अफगानिस्तान में स्थिति सामान्य बनाने का प्रयास करे।
तालिबान को अफगानिस्तान में नागरिक प्रशासन चलाने के लिए पर्याप्त धनराशि की सबसे बड़ी समस्या आने वाली है। अफगानिस्तान को संपत्तियों के क्रय एवं भुगतान हेतु 21 जून 2021 तक 382 मिलियन डॉलर की एस.डी.आर. मिली हुई थी। अब तालिबान सरकार को उस सुविधा से वंचित होना पड़ेगा। इसी प्रकार अन्य बड़ी बैंकिंग संस्थाओं द्वारा दी गई सुविधा तालिबान सरकार को नहीं मिल पाएगी। इस कारण सितंबर महीने से ही तालिबान सरकार को नागरिक प्रशासन चलाने के लिए भुगतान करने की समस्या आने वाली है। पाकिस्तान सरकार आज ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह वित्तीय संस्थाओं एवं बैंकिंग संस्थानों के माध्यम से इस समस्या का निराकरण करवा सके । वर्तमान में तालिबान का दूसरा मित्र चीन है। वर्तमान स्थिति में तालिबान सरकार को चीन की सरकार को उसके मनचाहे पसंद के खनिजों के खनन एवं प्रसंस्करण के अधिकार देने का संविदा समझौता करके वित्तीय संकट से मुक्ति पाने का एकमात्र विकल्प दिखाई देता है।
तालिबान सरकार के सबसे करीबी मित्र पाकिस्तान ने अपने विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी को एशिया के मुस्लिम देशों के शासनाध्यक्षों को अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को सही मायनों में मुस्लिम सरकार मानकर इसको मान्यता देने की समझाइश करने के लिए भेजा हुआ है। इन देशों का कहना था कि वे अभी एक माह देखने और प्रतीक्षा करने की नीति अपनाएंगे उसके बाद ही नई सरकार को मान्यता देंगे।
इन देशों के इंतजार करने का एक बड़ा कारण यह था कि अगस्त के तीसरे सप्ताह में अफगानिस्तान सरकार के निर्वाचित कार्यवाहक राष्ट्रपति अमरूल्लाह सालेह ने सभी देशों को संदेश भेजा था कि निर्वाचित सरकार तालबानी आक्रमणकारियों का मुकाबला कर रही है। इसलिए मुस्लिम देशों ने भी कोई निर्णय नहीं लिया है, राजनैतिक स्थिति स्पष्ट होने पर वे निर्णय लेंगे। अफगानिस्तान में आईएसआईएस के. द्वारा अगस्त माह के अंतिम सप्ताह में विस्फोट करने से स्थिति ने अनावश्यक भ्रम पैदा कर दिया है।
जिस तरह से संयुक्त राज्य अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी बिदाई लेकर सैनिक वापस बुला लिया है। अफगानिस्तान का वित्तीय संकट भी धीरे-धीरे सुलझ जाएगा। धीर-धीरे मुस्लिम देशों की मान्यता नई सरकार को मिलने लग जायेगी। नई सरकार इस्लामिक कायदे के अनुसार युवकों और युवतियों की सह-शिक्षा पर रोक लगाएगी। एक तालिबान अधिकारी के अनुसार पुरुषों के पदों पर स्त्रियों की अनावश्यक नियुक्तियों के कारण पुरुषों में होने वाली अनावश्यक बेरोजगारी की स्थिति पैदा नहीं होने देगी। काबुल से विमान सेवा पुन: प्रारंभ हो जायेगी।
अफगानिस्तान इंडियन मिलिट्री एकेडेमी में प्रशिक्षण प्राप्त तालिबान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई ने दावा किया है कि उनकी सरकार भारत के साथ अफगानिस्तान के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध जारी रखना चाहेगी। जम्मू व कश्मीर को अनावश्यक आतंकवादी हिंसा से बचाने के लिए भी अफगानिस्तान और भारत में राजनीतिक संबंध के साथ-साथ आर्थिक एवं व्यापारिक संबंध पुन: बहाल करने लिए शीघ्र प्रयास भारत के हित में अधिक जरूरी है।