- डॉ. राजू पांडेय
नवीनतम उदाहरण कृषि कानूनों से संबंधित मामले का है। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार की किसी भी रोक के पीछे यह तर्क देता कि प्रथम दृष्टया ये कृषि कानून संवैधानिक और कानूनी कसौटियों पर खरे नहीं उतरते और जनता के लिए अलाभकारी प्रतीत होते हैं इसलिए इन पर रोक लगाई जाती है तो शायद यह अधिक उचित प्रतीत होता।
क्या न्याय इतना व्यक्तिनिष्ठ और इतना असहाय हो सकता है कि उसकी समीक्षा और आलोचना करना अनिवार्य बन जाए? कोई एक न्यायाधीश यदि कमजोर मनुष्य सिद्ध हो जाए तो क्या करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले उसके फैसलों को केवल इस कारण शिरोधार्य करना होगा कि वे एक ऐसे पदाधिकारी द्वारा दिए गए हैं जिसे अकूत शक्तियां प्राप्त हैं और जिसे दैवीय होने की सीमा तक परिपूर्ण मान लिया गया है। क्या न्यायपालिका वस्तुनिष्ठ नियमों और सिद्धांतों से संचालित नहीं हो सकती? क्या एक अच्छी न्यायपालिका वही होती है जो सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सरकार को मजबूती प्रदान करे भले ही यह नीतियां कितनी ही अलोकप्रिय और अतार्किक हों? क्या न्यायपालिका प्रशासन का ही एक हिस्सा है जिसकी सोच और कार्यप्रणाली में जनता को अनुशासित, नियंत्रित और दंडित करने का भाव छुपा है? क्या न्यायाधीश ही न्याय है और उसका कथन ही विधि है?
अब तक न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार, लेट-लतीफी या लंबित प्रकरणों की विशाल संख्या अकसर चर्चा का विषय बनती थी और इस पर न्यायविद, पूर्व न्यायाधीश तथा न्यायपालिका से जुड़े अन्य लोग बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखते थे किंतु न्यायालयों और विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय के हाल के फैसलों के बाद जो मुद्दे आम जनता के जेहन में उठ रहे हैं वे न्यायपालिका की इन परंपरागत समस्याओं से एकदम अलग हैं। अब आम जनता का एक बड़ा भाग कतिपय न्यायाधीशों की सवर्ण मानसिकता, न्यायपालिका में दलितों और अल्पसंख्यकों के गिरते प्रतिनिधित्व तथा इनके साथ भेदभाव, पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त न्यायाधीशों की टिप्पणियों, कॉरपोरेट घरानों द्वारा न्यायाधीशों को मैनेज करने की कोशिशों तथा आर्थिक-सामाजिक मुद्दों के स्थान पर धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों को अधिक आवश्यक मानकर उन पर बहुसंख्यक समुदाय की मान्यताओं तथा विश्वासों के अनुरूप फैसले देने की प्रवृत्ति को लेकर आशंकित और चिंतित है।
नवीनतम उदाहरण कृषि कानूनों से संबंधित मामले का है। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार की किसी भी रोक के पीछे यह तर्क देता कि प्रथम दृष्टया ये कृषि कानून संवैधानिक और कानूनी कसौटियों पर खरे नहीं उतरते और जनता के लिए अलाभकारी प्रतीत होते हैं इसलिए इन पर रोक लगाई जाती है तो शायद यह अधिक उचित प्रतीत होता। किंतु सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने का निर्णय संभवत: किसानों की आहत भावनाओं पर मरहम लगाने का कार्य करेगा और उन्हें वार्ता में आत्मविश्वास एवं भरोसे के साथ सम्मिलित होने के लिए प्रेरित करेगा। अनेक विधिवेत्ताओं की राय में यह निर्णय न्यायिक तदर्थवाद का उदाहरण है।
अभी कुछ दिन पहले 5 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय की एक बेंच ने सेंट्रल विस्टा मामले पर अपना निर्णय दिया। फैसले के पोस्टल्यूड में (पैरा 420-422) इस बेंच ने बड़े विस्तार से इस बात की चर्चा की है कि न्यायालय सरकार के पॉलिसी मैटर्स में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। पैरा 420 के प्रारंभ में बेंच यह कहती है- 'इस प्रकरण में हम यह कहने को विवश हैं कि याचिकाकर्ताओं ने अपने उत्साह में हमें ऐसे क्षेत्रों पर विचार करने का आग्रह किया जो किसी संवैधानिक न्यायालय को प्राप्त शक्तियों से एकदम बाहर के हैं।' यह पैरा पॉलिसी के निर्माण और उसके क्रियान्वयन हेतु सरकार को प्राप्त अधिकारों के विषय में है जिसमें बेंच के मतानुसार न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है।
पैरा के अंत में बेंच कहती है- 'किंतु यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि न्यायालय संविधान द्वारा तय की गई सीमाओं के भीतर कार्य करते हैं। हमें शासन करने के लिए नहीं कहा जा सकता। क्योंकि हमारे पास इसके लिए साधन या कौशल और विशेषज्ञता का अभाव होता है। यही कारण है कि किसान इन जनविरोधी कृषि कानूनों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं गए क्योंकि इनमें बदलाव सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है।
यह आश्चर्यचकित करने वाली बात है कि सेंट्रल विस्टा पर फैसला देने वाली त्रिसदस्यीय बेंच और कृषि कानूनों पर निर्णय सुनाने वाली चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच का दृष्टिकोण सरकारी नीतियों के निर्माण और उनके क्रियान्वयन के संबंध में न्यायपालिका की भूमिका और उसके हस्तक्षेप के बारे में एकदम अलग है। और इस मत भिन्नता के बावजूद इन फैसलों से लाभान्वित होने वाली सरकार ही है।
सर्वोच्च न्यायालय की प्राथमिकताओं के क्रम पर भी सवाल उठने लगे हैं। लोगों के मन में यह धारणा भी बन रही है कि जिन प्रकरणों में सरकार को तत्काल राहत की आवश्यकता होती है उन प्रकरणों पर सुप्रीम कोर्ट त्वरित सुनवाई करता है। जबकि नोटबन्दी, सीएए और अनुच्छेद 370 के कतिपय प्रावधानों को अप्रभावी बनाने संबंधी संविधान संशोधन को लेकर दायर याचिकाओं तथा अनेक बुद्धिजीवियों, पत्रकारों एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस और प्रशासन के दमनात्मक व्यवहार को लेकर चल रहे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट वह तेजी और तत्परता नहीं दिखाता।
कानून के अनेक जानकर तो इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश गण कृषि और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ नहीं हैं उसी प्रकार वे पुरातत्व, इतिहास और धर्म दर्शन के भी विशेषज्ञ नहीं थे फिर भी उन्होंने कुछ समय पूर्व राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में प्रतिदिन सुनवाई कर निर्णय सुनाया था। समान प्रश्नों पर सर्वोच्च न्यायालय का स्टैंड अलग-अलग रहा है। किंतु शायद संयोगवश ही हर फैसले का लाभ सरकार को ही मिलता रहा है।
विधायिका और कार्यपालिका का सम्मान करते हुए न्यायपालिका अनेक मुद्दों पर स्वतंत्र निर्णय देने से बचती रही है। किंतु जब विधायिका एवं कार्यपालिका के फैसलों को संरक्षण देने की यह प्रवृत्ति अतार्किक रूप धारण करने लगती है तब कमिटेड जुडिशरी की चर्चा जोर पकड़ने लगती है। हमारे देश में कमिटेड जुडिशरी की चर्चा श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधान मंत्रित्व काल में उठी थी और अब मोदीजी के कार्यकाल में जोर पकड़ रही है। सर्वाधिक विचारणीय प्रश्न यह है कि जब लोकतांत्रिक प्रणाली को संतुलन प्रदान करने के लिए न्यायपालिका के सर्वश्रेष्ठ की आवश्यकता होती है तब न्यायपालिका अपेक्षित मजबूती क्यों नहीं दिखा पाती।
सोशल मीडिया में एक नई प्रवृत्ति देखने में आई है, वह है न्यायाधीशों को नायक के रूप में महिमामंडित कर उनकी अतिरंजित प्रशंसा की। यह रेखांकित किया जा रहा है कि अब न्यायपालिका के शोधन की प्रक्रिया प्रारंभ हो रही है एवं न्यायपालिका वामपंथ और कांग्रेसवाद की गिरफ्त से बाहर निकल रही है जिसके कारण राष्ट्र को मजबूती देने वाले निर्णय लिए जा रहे हैं। कुछ पोस्ट्स ऐसी भी हैं जिनमें न्यायपालिका में आए इस कथित परिवर्तन का श्रेय मोदी सरकार को दिया गया है। हो सकता है कि यह पोस्ट्स सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ बीमार मानसिकता के लोगों के विकृत मस्तिष्क की उपज हों किंतु यह तो सोचना ही होगा कि न्यायपालिका के हाल के क्रियाकलापों में ऐसा क्या है जिसकी बुनियाद पर यह जहरीला और खतरनाक नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।
भारतीय न्यायपालिका को बड़ी गहराई से जानने वाली पुरानी पीढ़ी के अनेक वयोवृद्ध प्रतिनिधि अपने समय के न्यायाधीशों की ईमानदारी और विद्वत्ता की चर्चा बड़े गौरव से करते हैं किंतु साथ ही यह कहना भी नहीं भूलते कि नई पीढ़ी में वैसी नैतिक दृढ़ता नहीं है। क्या हमारी न्याय प्रक्रिया को इतना पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ नहीं बनाया जा सकता कि उसे किसी न्यायाधीश के दोष और पूर्वाग्रह प्रभावित न कर सकें। यही वह प्रश्न है जिसका समाधान तलाशना होगा।