• अमन और सद्भाव सबसे बड़ी जरूरत

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत हो चुकी है। शपथग्रहण के बाद अब मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा भी हो गया है, जिसमें कोई बड़ा फेरबदल नहीं हुआ है। गृह, रक्षा, विदेश, वित्त और रेल मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग अब भी उन्हीं मंत्रियों के पास हैं, जिनके पास पिछली बार थे।

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    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत हो चुकी है। शपथग्रहण के बाद अब मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा भी हो गया है, जिसमें कोई बड़ा फेरबदल नहीं हुआ है। गृह, रक्षा, विदेश, वित्त और रेल मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग अब भी उन्हीं मंत्रियों के पास हैं, जिनके पास पिछली बार थे। जबकि इस बार सरकार का गठन जिस तरह जदयू और तेदेपा के साथ मिलकर हुआ है, उसमें कयास लगाए जा रहे थे कि ये दल अपने लिए महत्वपूर्ण विभाग मांग सकते हैं। अब संभवत: लोकसभा अध्यक्ष को लेकर कोई बड़ा फैसला देखने मिले। लेकिन पुराने मंत्रियों को नयी सरकार में वही विभाग देकर नरेन्द्र मोदी ने यह संदेश देने की कोशिश शायद की है कि उनकी कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आने वाला है। जिस तरह पिछली दो सरकारें उन्होंने चलाईं, इस बार भी वैसे ही चलाएंगे। अपने इस मंसूबे में वे कितने कामयाब होते हैं और क्या उनके गठबंधन के बाकी साथी उनकी कार्यशैली को सहजता से स्वीकार करते हैं, यह आने वाले वक्त में पता चलेगा। लेकिन देश के जो मौजूदा हालात हैं, उन्हें देखकर प्रधानमंत्री को यह सलाह दी जा सकती है कि वे कम से कम अब घटनाओं और स्थितियों की उपेक्षा करने या अपनी राजनैतिक सुविधा-असुविधा से ऊपर उठकर आम जनत के हित को देखते हुए आवश्यकतानुसार कार्रवाई करें।


    जिस दिन प्रधानमंत्री शपथ ले रहे थे, उसी दौरान जम्मू-कश्मीर में एक आतंकी हमला हुआ। वैष्णो देवी जा रहे श्रद्धालुओं को इस बार निशाने पर लिया गया। ऐसी किसी भी घटना की फौरन निंदा होनी चाहिए और मृतकों, घायलों की जाति, धर्म को न देखकर सभी के लिए संवेदना जताई जानी चाहिए। मगर कुछ लोगों ने इसमें भी राजनीति करने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर इस घटना के बहाने घृणा फैलाने के प्रयास दिखने लगे। इधर मणिपुर में संदिग्ध कुकी उग्रवादियों ने सोमवार को जिरीबाम जा रहे पुलिस काफिले पर घात लगाकर हमला किया। इसमें एक पुलिसकर्मी घायल हो गया। यह घटना मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के जिले के दौरे से ठीक पहले हुई है। अमूमन शांत रहने वाले जिरीबाम जिले में पिछले हफ़्ते से तनाव बढ़ रहा है। इसलिए बीरेन सिंह वहां का दौरा करने वाले थे, तभी यह हमला हुआ। इसके बाद से मणिपुर में फिर से जातीय तनाव तेज होने की आशंका जतलाई जा रही है। वैसे भी एक साल से अधिक वक्त से मणिपुर अशांत है। कुकी और मैतेई समूहों के बीच हुए हिंसक संघर्ष में मानवता ने पूरी तरह से दम तोड़ दिया है। ऐसे में प्रधानमंत्री से सहज अपेक्षा थी कि वे कम से कम एक बार इस अशांत प्रदेश में जाते और अमन कायम करने की कोशिश करते। लेकिन श्री मोदी ने इस ओर निराश ही किया। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भी स्थितियों को संभालने में नाकाम रहे हैं, फिर भी पद पर बने ही हुए हैं। एक बार आधे-अधूरे तरीके से इस्तीफे की पेशकश उन्होंने की, लेकिन इससे राज्य में शांति बहाली नहीं हुई।


    अब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी इस मामले में बड़ा बयान देते हुए एक तरह से नयी सरकार को नसीहत दी है। नागपुर में संघ के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि 'मणिपुर में शांति का इंतजार करते हुए एक साल हो गया है। पिछले 10 सालों से राज्य में शांति थी, लेकिन अचानक राज्य में फिर से बंदूक संस्कृति बढ़ गई। ऐसा लगता था कि पुरानी बंदूक संस्कृति खत्म हो गई है। वहां अचानक कलह उपज गया या उपजाया गया, उसकी आग में अभी तक जल रहा है, त्राहि-त्राहि कर रहा है और उस पर ध्यान नहीं है? प्राथमिकता देकर इस पर विचार करना हमारा कर्तव्य है।Ó यहां हमारा से आशय निश्चित ही केंद्र सरकार से है। हमारा कहकर संघ प्रमुख ने बता दिया कि भाजपा अब भी उन्हीं की है, अब भाजपा संघ को कितना अपना मानती है और कितना नहीं, यह जे पी नड्डा ही बता सकते हैं।


    बहरहाल, संघ प्रमुख की नसीहत बिल्कुल सही है। बंदूक संस्कृति या जातीय, सांप्रदायिक हिंसा के लिए कहीं भी जगह नहीं होनी चाहिए। अगर आग लगे तो उसे फौरन शांत करने के उपाय होने चाहिए। ऐसा नहीं होने पर कितने गंभीर परिणाम होते हैं, मणिपुर इसका ज्वलंत उदाहरण है। अशांति की चिंगारी इस वक्त छत्तीसगढ़ में भी भड़की है। यहां के बलौदाबाजार में एक उग्र प्रदर्शन में कलेक्टर और एसपी के दफ्तरों में ही आग लगा दी गई, इसके अलावा सौ से ज्यादा गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया गया, प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों के साथ-साथ आम जनता को भी आतंकित किया गया। हालात ऐसे बन गए कि अब यहां धारा 144 लागू करनी पड़ रही है।

    दरअसल 15-16 मई की आधी रात को अज्ञात लोगों ने सतनामी समुदाय के धार्मिक स्थल गिरौदपुरी धाम से करीब पांच किमी मानाकोनी बस्ती स्थित बाघिन गुफा में लगे धार्मिक चिन्ह जैतखाम को क्षतिग्रस्त कर दिया। पुलिस प्रशासन ने इस पर तत्काल कार्रवाई भी शुरु कर दी, लेकिन सतनामी समाज के लोग इससे संतुष्ट नहीं हुए। 9 जून को गृहमंत्री ने न्यायिक जांच के आदेश भी दिए और 10 जून को सतनामी समाज के लोगों ने दशहरा मैदान में प्रदर्शन करने की अनुमति मांगी। लेकिन इस दिन अप्रत्याशित रूप से कम से कम 5 हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई और उसके बाद अविचारित हिंसा और तोड़-फोड़ का ऐसा आलम हुआ कि इस राज्य के लोग हतप्रभ हैं।


    छत्तीसगढ़ नक्सल समस्या से तो ग्रस्त रहा है, लेकिन सांप्रदायिक, जातीय उन्माद के लिए यहां कोई जगह नहीं रही। पिछली भूपेश सरकार के वक्त साजा के बीरनपुर गांव में भुवनेश्वर साहू की हत्या और दो दिन बाद दो मुस्लिम युवकों की हत्या की सांप्रदायिक घटना हुई थी। इसके बाद अभी दो दिन पहले इसी राज्य के आरंग में मवेशी ले जाने वाले दो लोगों की भीड़ ने हत्या कर दी, जिसकी जांच के लिए सरकार ने एसआईटी का गठन कर दिया है। और अब बलौदाबाजार की घटना हो गई, जिसमें मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने दोषियों पर सख्त कार्रवाई का आश्वासन देते हुए सौहार्द्र बनाए रखने की अपील की है।


    राज्य सरकार तो अपने स्तर और क्षमता के अनुरूप काम कर ही रही है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने तीसरे कार्यकाल में इस बात पर खास ध्यान देने की जरूरत है, जिन राज्यों में अब तक शांति बनी रहती थी, वहां इस तरह की घटनाएं क्यों होने लगी हैं। अमन और सद्भाव इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है।

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