• अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे बाद नया गठबंधन   

    गजनी में लिथियम का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है। चूंकि विश्व बैंक, आई.एम.एफ एवं अन्य संस्थानों  से अफगानिस्तान को मदद मिलना संभव नहीं है

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    - डॉ. हनुमन्त यादव

    गजनी में लिथियम का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है। चूंकि विश्व बैंक, आई.एम.एफ एवं अन्य संस्थानों  से अफगानिस्तान को मदद मिलना संभव नहीं है, इसलिए तालिबान कर्ज लेने की बजाय खनिजों के खनन व प्रसंस्करण का कार्य अपने चीनी व पाकिस्तानी मित्रों की कंपनियों को मिलने वाले राजस्व से सुरक्षा व प्रशासन संभाले। इस नए घटनाक्रम को साकार होते एक साल से अधिक समय लग सकता है।

    तालिबान द्वारा 15 अगस्त अपरान्ह अफगानिस्तान पर कब्जे करने के 24 घंटे के अन्दर पाकिस्तान और चीन द्वारा जिस तरह से मान्यता देकर नैतिक समर्थन दिया गया वह भारत के राजनैतिक हितों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाला है। तालिबान के रूप में पाकिस्तान को एक राजनैतिक समर्थक मिल गया है जो भारत के लिए खतरनाक साबित होगा। तालिबान आतंकी संगठन के रूप में घोषित है, जब तक वह दुनिया में अपने व्यवहार से आतंकी संगठन की परिधि से बाहर नहीं आ जाता, उसके साथ व्यापारिक संपर्क बनाए रखना किसी भी देश के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। भारत के लिए चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि भारत ने अफगानिस्तान से राजनैतिक संबंध मजबूत करने के लिए  आर्थिक विकास परियोजनाओं में लगभग 22,500 करोड़ रुपए का पूंजी निवेश किया हुआ है और करोड़ों रुपये की व्यापारिक परियोजनाओं में भागीदारी है। जहां तक अफगानिस्तान में रहने वाले भारतीयों का सवाल है वे सभी जितनी जल्दी हो सके अफगानिस्तान छोड़कर भारत अपने घर पर आ जाना चाहते हैं। 

    भारत द्वारा वर्ष  2011 में अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए एक रणनीतिक साझेदारी समझौता किया गया था। इस समझौते के तहत  अफगानिस्तान में भारत द्वारा पूंजी निवेश को प्रोत्साहित करते हुए कई क्षेत्रों में क्षमता निर्माण के लिए बुनियादी ढांचे और संस्थानों में शिक्षा व तकनीकी सहायता को बहाल करने में मदद करने के लिए भारतीय समर्थन को अधिनियमित किया गया था।  भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नवंबर 2020 में जिनेवा में अफगानिस्तान सम्मेलन में कहा था कि भारत द्वारा अफगानिस्तान में 400 से अधिक परियोजनाएं चलाई जा  रही हैं, इन परियोजनाओं के कारण अफगानिस्तान का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं रह गया है।  2011 के बाद में भारत द्वारा कुछ बड़ी प्रतिष्ठित परियोजनाएं जिनका पूरी हो चुकने के बाद उद्घाटन भी हो चुका है सबसे पहले मैं उनकी चर्चा करना चाहूंगा।

    भारत ने काबुल में 90 मिलियन डॉलर की लागत से भव्य अफगान संसद भवन का निर्माण करवाया। इस भवन का उद्घाटन 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। संसद भवन के एक भवन का एक ब्लॉक भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के नाम पर रखा गया है। 2016 में ही अफगान-भारत मैत्री बांध के नाम से विख्यात 42 मैगावाट हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट सलमा डैम परियोजना का उद्घाटन हुआ, यह डैम जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं  से जुड़ा हुआ है। 2016 में ही अफगानिस्तान के राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आगा खान ट्रस्ट द्वारा पुनर्निर्मित स्टॉर पैलेस का उद्घाटन किया। भारत ने बदरखान, कंधार, खोस्त, कुनार और नूरिस्तान जैसे बहुत से शहरों में अस्पतालों का निर्माण करवाया। ट्रांसपोर्टेशन के लिए करीब 600 से ज्यादा छोटी बड़ी बसें और 300 से ज्यादा सैन्य वाहन समेत सैकड़ों एम्बुलेंस भी अफगानिस्तान को उपलब्ध करवाए। इसके अलावा अफगान राष्ट्रीय वाहक एरियाना को अपना परिचालन प्रारंभ करने के लिए एअर इंडिया से 3 विमान उपलब्ध करवाए गए थे।

    अफगानिस्तान में भारत के बार्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन की ओर से 147 मिलियन डॉलर का 200 किलोमीटर लंबा जरांज देलाराम राजमार्ग का निर्माण कराया जा रहा है । यह ईरान सीमा के करीब से गुजरता है। दूसरा, भारत द्वारा पुल.ए.खुमरी में 220 केवीए का पावर.इंफ्रा प्रोजेक्ट राजघानी काबुल में बिजली की आपूर्ति बढ़ाने के लिए प्रारंभ किया गया है।  तीसरा,  वर्ष 2020 में महत्वपूर्ण परियोजना काबुल जिले में शतूत बाघ निर्माण की है जो काबुल के 20 लाख निवासियों को संरक्षित पेयजल उपलब्ध  करवाएगा। भारत अफगानिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2019-20 में 1.3 बिलियन डॉलर पार कर गया था। भारत से लगभग 90 करोड़ डॉलर का निर्यात अफगानिस्तान को होता है, जबकि अफगानिस्तान चाह कर भी 50 करोड़ डॉलर से अधिक का निर्यात नहीं कर पाता है। अफगानिस्तान से भारत को मुख्य रूप से ताजे और सूखे मेवे निर्यात हो पाते हैं।

    अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज के वापस होते ही पाकिस्तान को तालिबान के कब्जे के बारे में पूर्वानुमान हो चुका था और उसी समय पाकिस्तान ने तय कर लिया था कि तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जे की घोषणा होते ही उसे तालिबान सरकार को मान्यता दे देनी होगी। यही कारण है कि पाकिस्तान के मित्र चीन ने भी नई सरकार को मान्यता देने में विलंब नहीं किया। जहां तक भारत की कूटनीति का सवाल है, मैं समझता हूं कि भारत से एक बड़ी कूटनीतिक भूल हुई है, जब अमरीकी सेना के ट्रूप्स वापसी की घोषणा हुई थी, भारत को उस समय  तालिबान के मुकाबले अफगानिस्तानी सेना की कमजोरी समझते अफगानिस्तानी राष्ट्रपति को भारतीय सेना का महत्व समझाना था। यह भी मौखिक प्रस्ताव देना था कि अफगानिस्तानी राष्ट्रपति द्वारा सुरक्षा के लिए सैनिक मदद का अनुरोध करने पर भारत उनके प्रस्ताव को स्वीकार करके पर्याप्त मात्रा में सैनिक बल उपलब्ध कराने को तैयार है।

    देखा जाए तो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति को अमेरिकी सेना की वापसी की जानकारी होते ही अपनी ओर से देश की सुरक्षा के लिए भारत से सैनिक बल का अनुरोध करना चाहिए था। सच पूंछा जाए तो अफगानिस्तान का लोकतंत्र और अफगानिस्तानी नागरिकों की सुरक्षा का एकमात्र मार्ग वहां भारतीय सेना की मौजूदगी से ही संभव था।

    पाकिस्तान के मित्र चीन की नजर अफगानिस्तान के 3,000 अरब डॉलर से अधिक मूल्य खनिज भंडार पर बहुत पहले से रही है। पिछले सप्ताह तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जे पर चीन को तालिबान का मित्र होने के नाते इन दुलर्भ कीमती खनिजों के खनन का बहुत सुन्दर अवसर प्रदान किया है। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार, मध्य अफगानिस्तान, बाघलान, खुन्डुज, लोगार, खोस्तसद, गजनी एवं अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में अरबों रुपए के खनिज के अमूल्य भंडार हैं। अफगानिस्तान में ं 60 मिलियन मीट्रिक टन तांबा, 22 बिलियन टन लौह अयस्क, 1.4 मिलियन मीट्रिक टन दुर्लभ खनिज जैसे कि लैंटम तथा सेरियम, नियोडिमियम और अल्युमिनियम, सोना, चांदी, जस्ता, पारा, लिथियम का भंडार है। गजनी में लिथियम का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है।

    चूंकि विश्व बैंक, आई.एम.एफ एवं अन्य संस्थानों  से अफगानिस्तान को मदद मिलना संभव नहीं है, इसलिए तालिबान कर्ज लेने की बजाय खनिजों के खनन व प्रसंस्करण का कार्य अपने चीनी व पाकिस्तानी मित्रों की कंपनियों को मिलने वाले राजस्व से सुरक्षा व प्रशासन संभाले। इस नए घटनाक्रम को साकार होते एक साल से अधिक समय लग सकता है।

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