लगभग पांच दशकों तक सैन्य शासन में रहने के बाद म्यांमार एक बार फिर तख्तापलट का शिकार हो सैन्य शासन के अधीन हो गया है। म्यामांर में लोकतंत्र के लिए करीब 22 सालों की लंबी लड़ाई आंग सान सू ची ने लड़ी, जीवन के दो दशक उन्होंने नजरबंदी में गुजारे, लेकिन देश में लोकतंत्र स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ही ली। लेकिन अब चुनावों में गड़बड़ी और कोरोना के नाम पर सैन्य तानाशाही कायम हो गई है।
सोमवार को सेना ने देश की सर्वोच्च नेता और स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची और राष्ट्रपति विन मिंट समेत कई वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और आपातकाल की घोषणा कर दी। अब शासन की कमान एक साल के लिए उपराष्ट्रपति मींट स्वे के हाथ में सेना ने दी है, स्वे पहले सैन्य अधिकारी रह चुके हैं। लेकिन देश में सर्वाधिक शक्तिमान सशस्त्र बलों के कमांडर जनरल मिन आंग लाइंग ही हैं।
जनरल लाइंग इस साल जुलाई में सेवानिवृत्त होने वाले थे, लेकिन अब उनके पास अपार शक्ति है। अपने कार्यकाल में रोहिंग्या मुसलमानों पर अत्याचार के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने तो उनके लिए मानवता के खिलाफ युद्ध के आरोप में सजा मिलने की बात कही थी। लेकिन इसके बावजूद जनरल लाइंग का म्यांमार में दबदबा बरकरार रहा। तब रोहिंग्याओं के पक्ष में खड़े न होने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची की काफी आलोचना भी हुई थी।
2016 में संपन्न चुनावों में जब आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी सत्ता में आई, तो उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ कदमताल शुरु की थी। एनएलडी ने संविधान परिवर्तन कर सैन्य शक्ति को सीमित करने के प्रयास किए थे, लेकिन जनरल लाइंग ने ये सुनिश्चित किया कि संसद में सेना के पास 25 फीसदी सीटें रहें और सुरक्षा से जुड़े सभी अहम पोर्टफोलियो सेना के पास रहें। आंग सान सू ची ने हमेशा इस बात पर जोर दिया था कि सैन्य शक्ति सीमित करने से ही लोकतांत्रिक बदलावों को बेहतर किया जा सकेगा। लेकिन जनरल लाइंग की लोकतंत्र के साथ कुछ दिनों की कदमताल अंतत: किस मिशन की ओर बढ़ रही थी, इसका खुलासा अब हुआ है।
म्यांमार में बीते नवंबर में ही संसदीय चुनाव हुए, जिसमें एनएलडी को 476 सीटों में से 396 सीटों पर जीत मिली। सेना ने चुनावों में फर्जीवाड़े का दावा किया, लेकिन चुनाव आयोग ने इसे नकार दिया। नई संसद को 1 फरवरी को प्रभावी होना था, सू ची समेत अन्य सांसदों को शपथ लेनी थी, लेकिन इससे पहले ही सैन्य तख्तापलट कर दिया गया।
सेना के स्वामित्व वाले 'मयावाडी टीवी' ने देश के संविधान के अनुच्छेद 417 का हवाला दिया जिसमें सेना को आपातकाल में सत्ता अपने हाथ में लेने की अनुमति हासिल है। राजधानी नेपिताओ समेत कई शहरों में इंटरनेट बंद है, सिटी हिल जैसे प्रमुख सरकारी भवनों पर सेना तैनात है। जगह-जगह सड़कें जाम कर दी गई हैं। लोकतंत्र सेना के जूतों के तले क्रूरता से रौंदा गया है।
दुनिया भर में म्यांमार के इस राजनैतिक घटनाक्रम की आलोचना हो रही है। अमेरिका समेत कई देश इसके बाद म्यांमार पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई कर रहे हैं। लोकतांत्रिक नेताओं को रिहा करने की आवाजें उठ रही हैं। मानवाधिकार संगठन चिंतित हैं कि अब अल्पसंख्यकों, राजनैतिक विरोधियों, पत्रकारों पर दमनात्मक कार्रवाई होगी। म्यांमार का घटनाक्रम भारत के लिए दोहरी चिंता का सबब है।
एक तो पड़ोसी देश में राजनैतिक अस्थिरता है और लोकतंत्र को बंधक बना लिया गया है। दूसरी यह कि म्यांमार और चीन की नजदीकियां, भारत के लिए चिंतनीय साबित होंगी। अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में भारत-चीन आमने-सामने हैं, उत्तरपूर्व में कई उग्रवादी गतिविधियों को म्यांमार की सीमा से सटे इलाकों से चलाया जाता है। इन सब पर दो लोकतांत्रिक देश आपसी समझदारी से चर्चा कर सकते थे। लेकिन अब सैन्य शासन के बाद भारत की आवाज को कितनी तवज्जो दी जाएगी, ये देखना होगा। वैसे म्यांमार में तो खुलकर लोकतंत्र का दमन हुआ है, लेकिन दुनिया के कई घोषित लोकतांत्रिक देशों में प्रकारांतर से जनता के अधिकारों को कुचला जा रहा है। कट्टरता, पूंजीवाद, धर्मांधता, शासकों की हठधर्मिता के कारण लोकतंत्र पर जो खतरे मंडरा रहे हैं, उन्हें भी देखने की जरूरत है।