• कमल और कांटे

    जनता ने अब तक भाजपा को उसके कमल निशान के साथ पहचाना था, अब उसमें कंटीले तारों, सीमेंट के अवरोधकों की पहचान भी जुड़ गई है

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    -  सर्वमित्रा सुरजन

    जनता ने अब तक भाजपा को उसके कमल निशान के साथ पहचाना था, अब उसमें कंटीले तारों, सीमेंट के अवरोधकों की पहचान भी जुड़ गई है। आंदोलनकारियों को रोकने के लिए सड़कों पर गड्ढे खोदने और आंसू गैस के गोले फेंकने के बाद अब दिल्ली की किलाबंदी सरकार ने की है। जनता को यही समझाने की चाल चली जा रही है कि किसान देश के दुश्मन हैं और अपने गढ़ को सुरक्षित रखने के लिए खाई-खंदक, कील-कांटें जरूरी हैं।

    जिस किसान आंदोलन को एक अरसे से केवल पंजाब-हरियाणा का साबित करने की कोशिश केंद्र सरकार और भाजपा समर्थक कर रहे थे, अब उसका दायरा कई राज्यों तक न केवल फैला है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी चर्चा हो रही है। ब्रिटेन के सांसद तनमनजीत सिंह धेसी ने ट्वीट कर आंदोलन स्थल के आसपास की बिजली, पानी और इंटरनेट प्रतिबंध को गलत बताया है, उन्होंने लिखा है कि सत्ताधारी लोग शांति से आंदोलन कर रहे लोगों का दमन करेंगे, तो इससे आंदोलन और मजबूत ही होगा। इससे पहले पॉप गायिका रिहाना ने सीएनएन की एक स्टोरी का लिंक शेयर करते हुए ट्वीट किया था कि आखिर हम इस पर बात क्यों नहीं कर रहे। उन्होंने इसके साथ हैशटैग फार्मर्सप्रोटेस्ट भी लगाया। आठ बार की ग्रैमी विजेता रिहाना का यह ट्वीट खूब ट्रेंड करने लगा और लाखों लोगों ने इसे देखा, हजारों ने शेयर किया। इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आईं।

    पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भी किसानों के समर्थन में ट्वीट किया है। कई अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन इस बारे में लिख रहे हैं। आप कहते रहिए कि ये भारत का अंदरूनी मामला है और किसी को इस पर बोलने का हक नहीं है। लेकिन हकीकत यही है कि इस आंदोलन को कुचलने की सरकार की कोशिशों ने इसे विश्वव्यापी चर्चा का विषय बना दिया। क्योंकि इसमें किसानों के साथ-साथ लोकतंत्र और मानवाधिकार के मुद्दे भी जुड़ गए हैं। बात निकलती है तो फिर इसी तरह दूर तलक जाती है। यह बात अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मोदी-मोदी के नारे लगवाने वाले प्रचारतंत्र से बेहतर कौन समझ सकता है। शम्मी कपूर के गाने की पैरोडी पर कहा जा सकता है कि आजकल तेरे-मेरे रार के चर्चे हर जुबान पर, सबको मालूम है और सबको खबर हो गई। दिक्कत यही है कि जिसे बाखबर होना चाहिए, वही अपनी बेखबरी में मस्त है।

    केंद्र सरकार शायद इस गलतफहमी में थी या अब भी है कि आखिर किसान कितने दिन यूं दिल्ली की सीमाओं पर टिके रह पाएंगे, या कितने दिन उनके समर्थन में लोग जुटे रहेंगे। लेकिन आज के हालात देखकर वह अपनी यह गलतफहमी जितने जल्दी दूर कर ले उतना अच्छा। 26 नवंबर को सिंधु, टिकरी और गाजीपुर की सीमाओं पर किसान, उनके परिजन, और समाज के विभिन्न तबकों के लोग जुटे। आंदोलनकारियों की सुविधा के लिए लंगर और दवाखाने के इंतजाम से लेकर लायब्रेरी, आसपास की झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे बच्चों को पढ़ने-पढ़ाने जैसे सारे काम बिना किसी बड़ी घोषणा के, समाज की आपसी मदद से होते रहे। ये काम न ठंड में रुके, न बारिश से प्रभावित हुए। लेकिन 26 जनवरी के दिन ट्रैक्टर परेड में कुछ जगहों पर हुए हंगामे और लालकिले की घटना के बाद आंदोलन थोड़ा विचलित होता दिखा।

    सरकार को इससे नई उम्मीद जगी कि अब वो दिल्ली की सीमाओं को आंदोलनकारियों से मुक्त करा लेगी। दरअसल अपनी खुशी में सरकार इस बात को याद न रख सकी कि जो किसान सधे हाथों से बीज बोने के लिए मिट्टी तैयार करता है, मौसम की ज्यादतियों के बावजूद नई पौध तैयार करता है और फसल पकने के बाद उसे काटने से लेकर बाजार में पहुंचाने तक सारे काम करना जानता है, वह भला अपने हक की मांग में आए विचलन को ठीक करना क्यों न जानेगा। इसलिए 26 जनवरी को उत्पन्न हुई अप्रिय परिस्थितियों के लिए आंदोलन के नेताओं ने खुद खेद व्यक्त किया और बड़ी कुशलता से हालात संभालते हुए आंदोलन को नई गति दे दी। राकेश टिकैत की भावुक अपील सीधे दिल से निकली और दिल तक पहुंची। अब किसानों के समर्थन में कई जगह महापंचायतें हो रही हैं। जो दिल्ली नहीं पहुंच सकते, वे अपने-अपने स्थानों से किसानों के समर्थन में आवाज उठा रहे हैं। सोशल मीडिया की भूमिका अब तक जनता की आवाज को एक नया प्लेटफार्म देने की मानी जाती रही थी।

    लेकिन अब यह राज भी खुल चुका है कि सोशल मीडिया तभी तक जनता का है, जब तक सत्ता को कोई खतरा न हो। जहां सत्ता के लिए जरा भी चुनौती दिखाई दी, वह हिज मास्टर्स वॉइस वाली भूमिका में आ जाता है। ट्विटर ने सोमवार को किसान आंदोलन से जुड़े ट्वीट करने वाले कई हैंडल्स को ब्लॉक कर दिया था। बताया गया कि ट्विटर ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के एक वैध कानूनी नोटिस पर अपनी 'कंट्री विथहेल्ड कंटेंट[ नीति के तहत कुछ हैंडल को ब्लॉक कर दिया था। उसके इस कदम की काफी आलोचना हुई, हालांकि कुछ वक्त के बाद इन हैंडल्स को फिर चालू कर दिया गया। इस कार्रवाई के पीछे तर्क दिया गया कि भड़काऊ और झूठी सामग्री पोस्ट करने के कारण यह कदम उठाया गया था। हो सकता है किसान आंदोलन की आड़ में कुछ लोग अनाप-शनाप बातें लिख रहे हों, जिनसे समाज का माहौल खराब होता है। लेकिन राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नाम पर यह सिलसिला तो अब भी जारी है। खुद को सर्वज्ञानी मानने वाली कंगना रानौत के ट्वीट अक्सर इसी श्रेणी के होते हैं।

    जहां तक सवाल सोशल मीडिया एकाउंट पर पाबंदी का है, तो यह बात याद रखने की जरूरत है कि आंदोलन कोई चुनाव जीतने का सियासी खेल नहीं है, जिसमें आईटी सेल की जरूरत पड़ती है। किसान आंदोलन इस देश की जमीन से जुड़े लोगों का आंदोलन है और बिना सोशल मीडिया के भी यह जारी रह सकता है। 1857 की क्रांति में जब सोशल मीडिया नहीं था, तब भी अलग-अलग इलाकों के लोगों को आंदोलन से जुड़ने के लिए कमल और रोटी के माध्यम से संदेश सफलतापूर्वक भेजे जाते थे। तब भी अंग्रेज शासकों को गुमान था कि उनकी शक्ति के आगे भारत के किसान औऱ जवान नहीं टिक पाएंगे। बेशक क्रांति आजादी के लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन उसने रास्ता जरूर तैयार कर दिया था। अब हम आजाद देश हैं, लेकिन शासक और जनता के बीच की खाई गुलामी के दौर से भी बड़ी हो गई है।
    इस आंदोलन की शुरुआत में लगा था कि सरकार बातचीत के जरिए इस मसले को सुलझा लेगी। आखिर सरकार में बैठे लोगों का पेट भी किसान के उगाए अनाज से ही भरता है। लेकिन जैसे-जैसे वार्ताओं का दौर बढ़ता गया, यह समझ में आ गया कि सरकार को खुराक कहीं और से मिलती है। इसलिए किसानों को कभी दो मांगों पर राजी करने, कभी डेढ़ साल तक कानून स्थगित रखने, कभी संशोधन जैसे विकल्प दिए जाते रहे, ताकि समय बीतता रहे और किसान थक-हार कर लौट जाएं।

    प्रधानमंत्री ने हाल ही में एक फोन कॉल की दूरी पर हैं, वाला पांसा भी चला। जबकि वे चाहते तो मन की बात में या ट्विटर पर वो बातें कह सकते थे, जो वो फोन पर करना चाहते हैं। किसान नेता तो उनसे नंबर भी मांग रहे हैं, लेकिन उस रूट की सारी लाइनें या तो व्यस्त हैं या फोन ही डेड है, इसलिए नंबर नहीं दिया गया। वैसे फोन से पहले खत लिखने की औपचारिकता कृषि मंत्री ने निभाई है। उस लंबे-चौड़े खत में भी ऐसी कोई बात नहीं थी कि किसान यह मान लेते कि सरकार ने कृषि कानून उनके भले के लिए बनाए हैं। खतों को फूलों के साथ किताब में संभाल कर रखने का रूमानी तरीका भी अब वक्त की संगदिली के साथ खो गया है। अब तो खत के बाद कीलों और कांटों की चुभन मिलने लगी है। जनता ने अब तक भाजपा को उसके कमल निशान के साथ पहचाना था, अब उसमें कंटीले तारों, सीमेंट के अवरोधकों की पहचान भी जुड़ गई है।

    आंदोलनकारियों को रोकने के लिए सड़कों पर गड्ढे खोदने और आंसू गैस के गोले फेंकने के बाद अब दिल्ली की किलाबंदी सरकार ने की है। जनता को यही समझाने की चाल चली जा रही है कि किसान देश के दुश्मन हैं और अपने गढ़ को सुरक्षित रखने के लिए खाई-खंदक, कील-कांटें जरूरी हैं। शहरी जनता अपनी असुविधाओं के कारण ग्रामीण जनता और किसानों से नाराज हो गई तो फूट डालो और राज करो की यह चाल सफल हो जाएगी। कमल और कांटे की यह राजनीति इस वक्त देश का कड़वा सच है। शकील बंदायुनी याद आते हैं-
    कांटों से गुजर जाता हूं दामन को बचा कर।
    फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूं?

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