भस्मासुर की कहानी इस देश में अनगिनत बार सुनी-सुनाई जा चुकी है। लेकिन फिर भी इसका सबक हमें शायद पूरा याद नहीं हुआ है। अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने से पहले हमें ये सोचना चाहिए कि इसमें हमारी अपनी जिम्मेदारी कितनी है। इस वक्त देश में किसान आंदोलन सबसे ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। अब तो अंतरराष्ट्रीय मंचों से भी किसान आंदोलन के लिए आवाजों उठने लगी हैं। किसान आंदोलन में 26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई घटनाओं से थोड़ा व्यवधान पड़ा था, लेकिन अब आंदोलन फिर अपनी गति में आ गया है।
26 तारीख को घटी घटनाओं से जुड़ी कई खबरें मीडिया में आईं और सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं और टिप्पणियां की गईं। कुछ ऐसी खबरें भी हड़बड़ी में दी गईं, जिनकी पुष्टि होना बाकी था। स्टूडियो में बैठकर एंकरिंग करने में तो लिखी-लिखाई स्क्रिप्ट मिल जाती है, अखबार के लिए भी रिपोर्ट तैयार करने में तथ्यों की पुष्टि करने का वक्त होता है, हालांकि कई बार उसमें भी कोई चूक हो जाती है।
अक्सर ऐसी गलतियां गैरइरादतन होती हैं, क्योंकि असली पत्रकार जानबूझकर तथ्यों से खिलवाड़ नहीं करता है। लेकिन जब घटनास्थल पर जाकर तुरंत कोई रिपोर्टिंग करनी होती है, तो उसमें गलतियों की गुंजाइश बन जाती है। यूं तो रिपोर्टर अपने स्तर पर सारी जानकारियां जुटाकर ही कुछ कहता है, फिर भी उससे भूलवश कुछ गलत रिपोर्टिंग हो जाए, तो इसका ये मतलब नहीं है कि उसने ऐसी भूल कर कोई देशविरोधी काम कर दिया। बल्कि इसका मतलब ये है कि उस पत्रकार को अभी रिपोर्टिंग में और सुधार की जरूरत है।
लेकिन आज के भारत में किसी भी काम को केवल दो नजरिए से देखने की परंपरा शुरु कर दी गई है, देशभक्ति और राष्ट्रविरोधी। इसी परंपरा के कारण देश के कुछ नामचीन पत्रकारों पर ट्रैक्टर परेड के दौरान असत्यापित $खबरें प्रसारित करने के आरोप में राजद्रोह की धाराओं में मामला दर्ज हुआ है। बोल कि लब आजाद हैं तेरे, ये मशहूर लाइन अब मंचीय पाठ तक सीमित हो गई है। असल में इस देश में आजाद जुबानों को सिलने का काम बड़ी तेजी से चल रहा है। कायदे से इस पर काफी पहले से सतर्क हो जाना चाहिए था। लेकिन नींद अब खुल रही है, जब सिलाई के धागे बड़े पत्रकारों तक पहुंच गए हैं।
आज से दस साल पहले का दौर याद कीजिए, जब देश में बोलने की आजादी का भरपूर लाभ उठाया जा रहा था। यूपीए सरकार ने तो सूचना का अधिकार जैसा औजार पत्रकारों और आम नागरिकों के हाथ में दे दिया था, जिसके उपयोग से वे शासन-प्रशासन की कई जानकारियां हासिल कर सकते थे। डॉ.मनमोहन सिंह मितभाषी हैं, हिन्दी बोलने में उतने सहज नहीं हैं, फिर भी वे देश-विदेश की अपनी यात्राओं में पत्रकारों से चर्चा करते थे, प्रेस कांफ्रेंस करते थे, खुले सवाल-जवाब के दौर में पत्रकारों के सवालों का सामना करते थे। फिर भी बड़े मीडिया हाउसेस के बड़े पत्रकारों और संपादकों ने उनके मौनमोहन नाम को भरपूर प्रचारित किया। देश में बलात्कार, हत्या, लूटपाट, आतंकवाद, घुसपैठ, भ्रष्टाचार की घटनाएं तब भी होती रहीं, लेकिन आज के मुकाबले तब उन समस्याओं पर सरकार की जी भर के खिंचाई और आलोचना होती थी।
अन्ना हजारे को देश का दूसरा गांधी करार देने, भ्रष्टाचार को इस देश की सबसे बड़ी समस्या बना देने, वंशवाद को लोकतंत्र की सबसे बड़ी बाधा बनाने में बहुत से बड़े पत्रकारों ने अपना भरपूर योगदान दिया। उनकी कलम से निकले शब्दों और कैमरे पर बोली गई बातों ने जनता को यह मानने पर विवश कर दिया कि यूपीए सरकार जाएगी, तभी इस देश से महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद जैसी तमाम बुराइयां जाएंगी। पत्रकारिता की ताकत तो देश ने देख ली, लेकिन अफसोस कि उस ताकत के अविचारित इस्तेमाल को अब देश भुगत रहा है। देश को नुकसान पहुंचाने वाली तमाम बुराइयां पहले से कहीं अधिक असरकारी रूप में मौजूद हैं और उस पर विडंबना ये कि इन बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाने की आजादी कुचली जा रही है। बबूल का पेड़ बो कर हम आम खाने के ख्वाब देख रहे हैं, यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।