• नए क्षितिज पर भारत-फ्रांस संबंध

    विगत दो दशकों में भारत-फ्रांस संबंध को एक नया आयाम मिला है और दोनों देशों ने राजनीतिक, आर्थिक व सामरिक संबंधों में बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास किया है

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    - अरविंद जयतिलक

    विगत दो दशकों में भारत-फ्रांस संबंध को एक नया आयाम मिला है और दोनों देशों ने राजनीतिक, आर्थिक व सामरिक संबंधों में बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास किया है। फ्रांस के नेतृत्व के दृष्टिकोण में बदलाव के साथ-साथ कुछ द्विपक्षीय बाध्यताओं ने भी दोनों को एकदूसरे के निकट लाया है। यह तथ्य है कि चीन युद्ध के बाद भारत न केवल महाशक्तियों, अपितु अफ्रीका व एशियाई देशों से भी अलग-थलग पड़ गया था। भारत को एक ऐसे देश के प्रति आकृष्ट होना स्वाभाविक था जिससे उसका काई क्षेत्रीय विवाद न रहा हो। फ्रांस व भारत के मध्य विचारधारा के स्तर पर विरोधाभास होने के बावजूद भी डी गॉल व नेहरु की विदेशनीति संबंधित पहल में कई प्रकार की समानताएं थी जो एकदूसरे को आकर्षित की। इसके अलावा 1962 में भारत व फ्रांस के बीच क्षेत्रों के हस्तांतरण संबंधी संधि के अनुमोदन ने दोनों देशों के संबंधों में मिठास घोली। 

    भारत और फ्रांस ने हिंद महासागर में चीन की विस्तारवादी नीति पर लगाम कसने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक-कूटनीतिक सहयोग बढ़ाने का संकल्प जाहिर कर दो दशक पुराने रिश्ते को उर्जा से भर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की गरिमामय उपस्थिति में दोनों देशों के बीच 10.4 लाख करोड़ रुपए के 14 समझौते हुए हैं जिसके तहत दोनों देशों द्वारा एकदूसरे के सैनिक अड्डे का इस्तेमाल और वहां अपने युद्धपोत रखने पर सहमति जतायी गयी है। नि:संदेह इस सामरिक समझौते से दोनों देशों की समुद्री सुरक्षा मजबूत होगी और जलपोतों की निगरानी के साथ दोनों देश जल सर्वेक्षण के संबंध में आपसी तालमेल बढ़ा सकेंगे। चूंकि हिंद महासागर स्थित रीयूनियन आइसलैंड फ्रांस के लिए अहम क्षेत्र है इस लिहाज से भारत के साथ फ्रांस की युगलबंदी उसके हितों के ही अनुकूल है। उर्जा, रक्षा, सुरक्षा, तस्करी, आव्रजन, शिक्षा, रेलवे, पर्यावरण, परमाणु, आतंकवाद और अंतरिक्ष मामलों में भी दोनों देशों के बीच अहम समझौते हुए हैं।

    फ्रांस की कंपनियों द्वारा 20 करोड़ यूरो यानी 1600 करोड़ रुपए के निवेश का ऐलान किया गया है जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक गतिविधियां तेज होनी तय है। आपसी आर्थिक व वाणिज्यिक समझदारी व साझेदारी का परिणाम है कि आज भारत में विदेशी निवेश के लिहाज से फ्रांस तीसरा सबसे बड़ा निवेशक देश बन चुका है। भारत में 400 से अधिक फ्रांस की कंपनियां काम कर रही हैं और सभी कंपनियों का संयुक्त टर्नओवर तकरीबन 25 अरब डॉलर से अधिक है। फ्रांस भारत का भरोसेमंद दोस्त इसलिए भी है कि जब परमाणु परीक्षण से नाराज दुनिया के ताकतवर मूल्क भारत पर प्रतिबंध थोप रहे थे तब (1998) फ्रांस ने भारत के साथ रणनीतिक समझौते को आयाम दिया। इतिहास में भी जाएं तो भारत और फ्रांस के संबंध लगातार परिवर्तित और मजबूत होते रहे हैं। इंग्लैंड की ही भांति फ्रांस भी भारत में एक औपनिवेशिक ताकत रहा है। बावजूद इसके दोनों देशों के बीच कभी भी खटास उत्पन नहीं हुआ और फ्रांस  द्वारा भारत के साथ आधुनिकीकरण के दौर में व्यापार, अर्थव्यवस्था, तकनीकी सहायता, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, परमाणु एवं रक्षा क्षेत्रों में नवीन सहयोग विकसित किया गया।

    गौर करें तो दोनों देशों के बीच आर्थिक व सामरिक क्षेत्रों में बढ़ते सहयोग का मूल आधार विकसित रणनीतिक-राजनीतिक समझदारी है। विगत दो दशकों में भारत-फ्रांस संबंध को एक नया आयाम मिला है और दोनों देशों ने राजनीतिक, आर्थिक व सामरिक संबंधों में बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास किया है। फ्रांस के नेतृत्व के दृष्टिकोण में बदलाव के साथ-साथ कुछ द्विपक्षीय बाध्यताओं ने भी दोनों को एकदूसरे के निकट लाया है। यह तथ्य है कि चीन युद्ध के बाद भारत न केवल महाशक्तियों, अपितु अफ्रीका व एशियाई देशों से भी अलग-थलग पड़ गया था। भारत को एक ऐसे देश के प्रति आकृष्ट होना स्वाभाविक था जिससे उसका काई क्षेत्रीय विवाद न रहा हो।

    फ्रांस व भारत के मध्य विचारधारा के स्तर पर विरोधाभास होने के बावजूद भी डी गॉल व नेहरु की विदेशनीति संबंधित पहल में कई प्रकार की समानताएं थी जो एकदूसरे को आकर्षित की। इसके अलावा 1962 में भारत व फ्रांस के बीच क्षेत्रों के हस्तांतरण संबंधी संधि के अनुमोदन ने दोनों देशों के संबंधों में मिठास घोली। 

    उल्लेखनीय तथ्य यह कि फ्रांस  सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारतीय प्रयास का समर्थन करने वाले प्रथम देशों में से एक था। फ्रांस आज भी अपने वहीं पुराने रुख पर कायम है। दरअसल दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व में कई द्विपक्षीय तथा अंतर्राष्ट्रीय विषयों के संबंध में समान सोच है और इस समानता के विकास का मुख्य कारण दोनों देशों के नेताओं द्वारा एकदूसरे के यहां यात्राएं करने से उत्पन हुआ सद्भाव है। हालांकि विदेश नीति के विरोधी अभिमुखन के कारण दोनों देशों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मुद्दों पर कई बार विरोधी रुख भी अपनाए हैं। उदाहरण के तौर पर हिंद-चीन क्षेत्र की स्वतंत्रता मुद्दे पर जहां भारत ने दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र की आजादी की बात पर बल दिया, वहीं फ्रांस लगातार औपनिवेशिक स्थिति बनाए रखने का पक्षधर था। दोनों देशों ने मोरक्को, तुनीसिया और अल्जीरिया की उपनिवेशिक स्थिति पर विरोधात्मक विचार प्रकट किए। 1956 में मिस्र द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के मुद्दे पर भारत ने बहुत सशक्त रुप से फ्रांस  व ब्रिटेन के संयुक्त प्रयास का विरोध किया। इस संयुक्त हस्तक्षेप के विरोध में भारत ने मिस्र का साथ दिया।

    1958 में डी गॉल के फ्रांस के सत्ता संभालने के बाद दोनों देशों के संबंधों में बदलाव आना शुरु हो गया। 1959 में दोनों देशों के बीच आर्थिक एवं सांस्कृतिक सहयोग विकसित करने की संधि पर हस्ताक्षर किए गए। आर्थिक संबंधों में सुधार के कारण दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने की कोशिश की तथा व्यापार के उचित आदान-प्रदान हेतु एक संयुक्त आयोग की स्थापना की। 1973 में फ्रांस  के तत्कालीन अर्थव्यवस्था एवं वित्तमंत्री वेलेरी जिसकार्ड जो बाद में फ्रांस  के राष्ट्रपति भी बने, की पहल पर 'भारत-फ्रांस  अध्ययन समूह' की स्थापना हुई। इस समूह की पहली बैठक फरवरी 1974 में फ्रांस  में हुई तथा दूसरी बैठक मार्च 1975 में नई दिल्ली में हुई। इस समूह की सलाह पर दोनों देशों के मध्य समुद्री तेल उत्खनन, शक्ति उत्पादन व वितरण, कोयला उत्खनन व प्रयोग तथा तीसरे देश में संयुक्त उद्यम स्थापित करने संबंधित कई अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।

    भारत मुख्य रुप से फ्रांस से मशीनरी एवं कलपुर्जे मंगाता है। भारत से फ्रांस को होने वाले निर्यात में परंपरागत एवं गैर परंपरागत सामान एवं सेवाएं शामिल हैं। परंपरांगत सामान में भारत मुख्यत: परिधान, चमड़ा, वस्त्र, रुई, धागा, समुद्री जीव इत्यादि फ्रांस  को भेजता है। गैरपरंपरागत सामान में भारत कजपुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक्स व रबड़ का सामान, रसायन डाइ का सामान, दवाईयां, ग्रेनाइट तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुएं निर्यात करता है। 

    सबसे महत्वपूर्ण बात जो दोनों देशों के व्यापार में अहम है वह यह कि 1994 के बाद व्यापार संतुलन हमेशा भारत के पक्ष में बना हुआ है। गौर करें तो भारत व फ्रांस के मध्य नजदीकियां विकसित होने का मुख्य कारण द्विपक्षीय सहयोग के साथ-साथ फ्रांस  का तीसरी दुनिया के प्रति दृष्टिकोण भी रहा है। नवंबर 1982 में अपनी भारत यात्रा के समय तत्कालीन फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रोंकोसिस मित्रां ने तीसरी दुनिया से संबंद्ध मुद्दों मसलन अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सुधार, कच्चे माल की कीमतों की गारंटी, अन्न आत्मनिर्भरता, स्वतंत्र उर्जा, अंतर्राष्ट्रीय वित्तकोष तथा विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय संसाधनों की बढ़ोत्तरी जैसे विषयों पर अपने देश की सहमति अभिव्यक्त की। सामरिक लिहाज से भी दोनों देशों के बीच परंपरागत जुड़ाव रहा है।

    1971 के भारत-पाक युद्ध के उपरांत भारत दक्षिण एशिया में एक क्षेत्रीय शक्ति के रुप में उभरकर सामने आया। दशकों तक वह अपने रक्षा उत्पादन में पूर्व सोवियत संघ पर निर्भर रहा। लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में सामरिक सहयोग के क्षेत्र में भारत व फ्रांस  की निकटता बढ़ी है। 1976 में फ्रांस ने भारत में मिराज एफ-1 लड़ाकू विमानों के उत्पादन हेतु उद्यम लगाने की पेशकश की। भारत की कंपनी हिंदुस्तान एरोनोटिक्स लिमिटेड बंगलौर के साथ एक बहुकार्यात्मकता व एक इंजन पर आधारित हल्का हेलीकॉप्टर बनाने का समझौता किया। भारत को फ्रांस  की ओर से राफेल युद्धक विमान प्राप्त हुए हैं। 

    गौरतलब है कि आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के विरुद्ध चलाए जा रहे सैन्य अभियान में राफेल अपनी उपयोगित साबित कर चुका है। द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सहयोगों के अतिरिक्त दोनों देशों के मध्य स्थित सद्भावना ने दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई दी है। प्रारंभ से ही दोनों देशों के मध्य जनसाधारण में सहयोग विकसित करने हेतु द्विपक्षीय सांस्कृतिक व वैज्ञानिक आदान-प्रदान करने की भावना प्रबल रही है। दोनों देशों ने 'भारत महोत्सव' (1985) तथा 'फ्रांस  महोत्सव' (1989) का आयोजन किया। दोनों देशों ने वर्ष 2007-2010 के लिए 'संास्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम' पर हस्ताक्षर किया और 2016 से 2018 के लिए 'सांस्कृतिक आदान-प्रदान' समझौते को मूर्त रुप देने का संकल्प जाहिर किया है। दोनों देशों के नेतृत्व के बीच बढ़ती निकटता दोनों देशों के हित में तो है ही साथ ही वैश्विक संतुलन साधने की दिशा में भी एक क्रांतिकारी पहल है।

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