• ट्रम्प के सामने घुटने न टेके भारत

    दुनिया को फिर से ठीक-ठाक करने के अपने बेतुके प्रोजेक्ट को अंजाम देने में व्यस्त अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुलाकात की है

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    - जगदीश रत्तनानी

    यदि राष्ट्र के पास एक ऐसी विदेश नीति हो जिस पर सभी दल सहमत हों, उसे अपना सकें और राजनीतिक विभाजनों से परे भारतीय आम सहमति के रूप में पेश कर सकें तो मोदी और भारत को इसमें मदद मिलेगी । इसके लिए भाजपा को कांग्रेस एवं अपने पक्ष के अन्य दलों की जरूरत है जो ट्रम्प के सामने मजबूत, स्पष्ट और विशिष्ट मांगों का एक सेट रखें।

    दुनिया को फिर से ठीक-ठाक करने के अपने बेतुके प्रोजेक्ट को अंजाम देने में व्यस्त अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुलाकात की है। इस तरह ट्रम्प के राष्ट्रपति पद संभालने के बाद मिलने वाले कुछ नेताओं में मोदी शामिल हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस मुलाकात पर कहा- ' यह स्पष्ट हो गया कि मोदी ट्रम्प को खुश करने वाले नवीनतम नेता थे।'

    आत्ममुग्ध, अहंकारी, यहां तक कि आत्मकेंद्रित के रूप में वर्णित एक शक्तिशाली विश्व नेता को खुश करने में सिद्धांत रूप में कुछ भी गलत नहीं है। तो भी खुश करने की यह कोशिश उन स्थितियों और नीतियों के अति उत्साही समर्थन से अलग है जिन्होंने दुनिया भर में कई सवाल एवं चिंताएं खड़ी की हैं। भारत ने ट्रम्प की प्रशंसा एक प्रेरक नेता के रूप में की लेकिन यह सब कहीं न कहीं अलग क्षेत्र में चला गया जब 'विस्किट भारत' (विकसित भारत) का विचार 'मेगा' (एमएजीए 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का मतलब-'अमेरिका को फिर से महान बनाओ') की राजनीति की भाषा में बदल गया।

    मोदी ने इसे इस तरह व्यक्त किया- 'अगर मैं अमेरिका की भाषा में कहूं तो विकसित भारत का मतलब है 'मेक इंडिया ग्रेट अगेन' यानी 'मिगा'- एमआईजीए। जब संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत एक साथ काम करते हैं यानी 'मेगा जब 'मिगा' से जुड़कर काम करेगा तो समृद्धि के लिए 'मेगा' साझेदारी बनती है तथा यह मेगा भावना हमारे लक्ष्यों को नया पैमाना एवं दायरा देती है।'

    यह अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा इस तथ्य के बावजूद आई कि मोदी के साथ बैठक से कुछ घंटे पहले ही ट्रम्प ने बिना किसी हिचकिचाहट के पारस्परिक टैरिफ की घोषणा की जिसका स्पष्ट रूप से भारत पर असर पड़ेगा। ट्रम्प ने वास्तव में मोदी के साथ अपनी टिप्पणी में टैरिफ को रेखांकित करते हुए भारत को 'दुनिया में सबसे अधिक टैरिफ वाला देश' कहा और कहा कि 'भारत जो भी शुल्क लेगा, हम उससे वसूलेंगे।' यह विशेष रूप से आश्चर्यजनक नहीं है। यह हमेशा स्पष्ट था कि ट्रम्प अपने नियमों के अनुसार खेलेंगे और जैसा उन्होंने अन्य देशों के साथ किया है, वे भारत को दबाव में डालेंगे। उनके कुछ तरीके उनकी पुस्तक 'आर्ट ऑफ द डील' में बताए गए सरल विचारों पर आधारित हैं- एक अहंकारी रियल एस्टेट डेवलपर की मैनुअल जिसे अन्य क्षेत्रों और स्वयं जीवन में लागू करने के लिए बनाया गया है। 1997 में आई इस पुरानी किताब के अध्याय- 2 को 2005 में एक बड़े बाजार संस्करण में पुन: प्रकाशित किया गया जिसका शीर्षक है 'ट्रम्प कार्ड्स: द एलिमेंट्स ऑफ द डील'। किताब इस प्रकार शुरू होती है- 'सौदा करने का मेरा तरीका काफी सरल व सीधा है। मैं बहुत ऊंचा लक्ष्य रखता हूं और फिर मैं बस जो चाहता हूं उसे पाने के लिए जोर लगाता रहता हूं। कभी-कभी मैं जितना चाहता हूं उससे कम पर समझौता कर लेता हूं लेकिन ज्यादातर मामलों में मुझे फिर भी वही मिलता है जो मैं चाहता हूं।'

    अमेरिकी विदेश नीति हमेशा अमेरिकी हितों के बारे में रही है जो अल्पकालिक और एक साधन द्वारा चिह्नित है, जिसमें खुलेपन, लोकतंत्र या शांति के सिद्धांतों के कई खोखले दावे हैं। अब मुखौटा गिर गया है, मूल्यों का ढकोसला खत्म हो गया है और ताकत का नंगा खेल शुरू हो गया है। आगे बढ़ने की उम्मीद करते हुए भारत को इस साझेदारी को ध्यान से नेविगेट करने की आवश्यकता होगी और इसलिए भारत को पूछने व रेडलाइन तथा गैर-परक्राम्य की अपनी सूची के साथ तैयार रहना होगा। संक्षेप में कहें तो ट्रम्प के खेलने के तरीके का उपयोग ट्रम्प के खिलाफ ही करना होगा।

    यदि राष्ट्र के पास एक ऐसी विदेश नीति हो जिस पर सभी दल सहमत हों, उसे अपना सकें और राजनीतिक विभाजनों से परे भारतीय आम सहमति के रूप में पेश कर सकें तो मोदी और भारत को इसमें मदद मिलेगी । इसके लिए भाजपा को कांग्रेस एवं अपने पक्ष के अन्य दलों की जरूरत है जो ट्रम्प के सामने मजबूत, स्पष्ट और विशिष्ट मांगों का एक सेट रखें बजाय इसके कि वे दूसरे पक्ष की हर मांग के आगे झुक जाएं।

    लेकिन विदेशी मामलों में भी राजनीतिक कटुता आ गई है। नौकरशाह से विदेश मंत्री बने एस. जयशंकर ने विपक्षी नेताओं के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से कटाक्ष करके इसमें कुछ इज़ाफा किया है जो जाहिर तौर पर द्विदलीय समर्थन की कीमत पर भाजपा तथा प्रधानमंत्री के साथ उनकी स्थिति को सुरक्षित करता है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा अमेरिका में अनधिकृत भारतीयों को निर्वासित करने की प्रक्रिया शुरू करने के तरीके की औपचारिक और सार्वजनिक रूप से निंदा करने के लिए इस तरह की कटुता के बिना भी सर्वदलीय आम सहमति बनाना मुश्किल नहीं होना चाहिए था।

    निर्वासन आदेशों के तहत भारतीय नागरिकों को भेजने के लिए सैन्य विमान का उपयोग और अमेरिकी एजेंसियों द्वारा एक वीडियो में जंजीरों में बंधे भारतीय नागरिकों का वीडियो विधिवत प्रचारित करने का कृत्य अनुचित तथा भारतीय नागरिकों के सम्मान और अधिकारों की कीमत पर भारत की नकारात्मक छवि दिखाने की कोशिश करता है। यह चौंकाने वाली बात है कि भारतीयों के साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जा रहा है जैसा वेनेजुएला के कुछ गिरोह के सदस्यों के साथ हो रहा है और जिन्हें 'बेहद खतरनाक व आपराधिक अवैध एलियंस' कहा जाता है तथा जिन्हें क्यूबा में अमेरिका संचालित कुख्यात ग्वांतानामो बे जेल शिविरों में भेज दिया गया है।

    भारतीयों के साथ ऐसा व्यवहार करने के लिए भारत को अमेरिका की निंदा करनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने इस पर खुलकर बात न करने का फैसला किया। हालांकि उन्होंने बताया कि गरीब लोगों को गुमराह कर अपने जाल में फंसाने वाले और सीमाओं के पार अवैध रूप से लोगों की तस्करी में मदद करने वाले गिरोहों पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। यह सही स्थिति है। लेकिन अगला तार्किक कदम यह होगा कि अमेरिका से कहा जाए कि वह बिना दस्तावेज वाले भारतीयों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार न करें या वापस भेजते समय उन्हें बेड़ियों में न डालें।

    लेकिन ऐसा नहीं हुआ और भारतीय विदेश मंत्री को पहले यह कहते हुए उद्धृत किया गया था कि स्तरीय 'यह अमेरिका के लिए सामान्य प्रक्रिया है।' उन्होंने कहा कि निर्वासितों को हटाने के लिए विमानों के उपयोग संबंधी 'आईसीई (अमेरिका के आव्रजन और ग्राहक प्रवर्तन) की मानक संचालन प्रक्रिया 2012 से प्रभावी है। यह बयान तकलीफ में पड़े लोगों की कैसे मदद कर सकता है? आम भारतीयों के साथ हुए इस व्यवहार पर क्या 'विश्व गुरु' राष्ट्र के विदेश मंत्री जयशंकर को शर्म नहीं आती?

    अमेरिका से अगर 20 हजार भारतीयों में से सभी को वापस भेजा जाना है तो नियोजित निर्वासन के लिए लगातार उड़ानों की आवश्यकता होगी। यह संख्या बढ़ भी सकती है क्योंकि अमेरिकी आव्रजन विभाग के छापे जारी हैं। जो लोग पकड़े जाते हैं, उन्हें वकीलों, चिकित्सा सहायता और अन्य सभी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए और इन सुविधाओं के बिना हिरासत में रखने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उनमें से किसी को भी जंजीरों में जकड़ कर वापस भेजने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

    यहां उन अन्य मुद्दों की बात नहीं हो रही है जिन पर ट्रम्प आगे बढ़ना जारी रखेंगे। दोनों देशों की टीमों के बीच ऊर्जा सौदों और रक्षा आपूर्ति के बारे में चर्चा जारी है। अमेरिका के साथ भारत एक सीमा तक ही खेल खेल सकता है। भारत किस सीमा तक झुक सकता है यह बताने के लिए एक स्पष्ट रेखा खींचनी जरूरी है। ट्रम्प को खुश करने के लिए भारत को झुकना नहीं चाहिए।
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडीकेट: द बिलियन प्रेस)

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