भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाल में संपन्न यूक्रेन दौरे के बाद दुनिया भर में इस बात की चर्चा तेज़ हो गई कि रूस और यूक्रेन के बीच शांति कायम करने में क्या भारत की अहम भूमिका होगी। दरअसल यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोदीमीर जेलेंस्की ने दूसरे शांति सम्मेलन की मेजबानी करने का प्रस्ताव भारत के सामने रखा है। हालांकि इस खबर के फौरन बाद एक दूसरी खबर आई कि यूक्रेन ने रूस के सरातोव शहर में एक 38 मंजिला रिहायशी इमारत पर ड्रोन से हमला किया है। इस हमले के वीडियो ने 11 सितंबर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले की भयावह यादें ताजा कर दीं। गनीमत यह है कि अब तक सरातोव पर हुए हमले में जान-माल के ज्यादा नुकसान की खबर नहीं है। लेकिन जिस तरह से यह हमला हुआ, वह रूस और यूक्रेन के बीच शांति की संभावनाओं को और धूमिल कर रहा है। क्योंकि रूस इस हमले के बाद शायद ही शांत बैठे।
रूस और यूक्रेन के बीच छिड़े युद्ध में पश्चिमी शक्तियों की सक्रिय भागीदारी है। अमेरिका, ब्रिटेन आदि देश खुलकर यूक्रेन का साथ दे रहे हैं। जबकि भारत ने अपने पुराने मित्र रूस को ही यूक्रेन पर तरजीह दी है। 2023 के जी-20 सम्मेलन में यूक्रेन को आमंत्रित नहीं किया गया था, पिछले महीने जुलाई में यूएनजीए में यूक्रेन के खिलाफ रूस के हमलों को रोकने के लिए वोटिंग से भारत ने दूरी बनाई। 2022 में सुरक्षा परिषद में यूक्रेनी इलाकों पर रूस के कब्जे और जनमत संग्रह के खिलाफ पारित प्रस्ताव से भी भारत दूर ही रहा था। पश्चिमी देशों और यूक्रेन की आपत्तियों के बावजूद रूस से तेल का आयात भारत ने जारी रखा है। ऐसे तमाम उदाहरण यह बताते हैं कि भारत और रूस की मित्रता पहले की तरह बनी हुई है और इस दौरान अगर भारत यूक्रेन के जख्मों पर भी मलहम लगा रहा है, तो इसका अर्थ यही है कि भारत हर हाल में विश्व शांति चाहता है।
यूक्रेन भी शांति की बात करता है, लेकिन कीव की शर्तों पर, वहीं रूस भी किसी कीमत पर पीछे हटने तैयार नहीं है। यूक्रेन ने पहला शांति सम्मेलन स्विट्जरलैंड में किया था, जिसमें करीब 90 देशों ने भागीदारी की थी, लेकिन चीन इससे दूर रहा था। अब दूसरे सम्मेलन के लिए भारत के अलावा तुर्किए, सऊदी अरब, कतर और स्विट्जरलैंड से भी चर्चा चल रही है। शांति सम्मेलन इनमें से किसी भी देश में हो, महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें भारत अब किस तरह की भूमिका निभा सकता है और क्या इससे दो सालों से चल रहे युद्ध पर विराम लगेगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी यूक्रेन यात्रा में भारत की विदेश नीति के अनुरूप विश्वशांति पर ही जोर दिया है, इससे पहले जुलाई के दूसरे हफ्ते में जब प्रधानमंत्री मोदी रूस गए थे, तब भी वहां उन्होंने यही कहा था कि युद्ध की जगह वार्ताओं से समाधान निकाले जाने की जरूरत है। हालांकि तब रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन को गले लगाने पर यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता (मोदी) का दुनिया के सबसे खूनी अपराधी (पुतिन) को गले लगाना दिल तोड़ने वाला है। 44 दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जेलेंस्की को भी गले लगाया। हालांकि पुतिन ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, क्योंकि रूस भी भारत की गुटनिरपेक्ष नीति को समझता है।
रूस और यूक्रेन के अलावा फिलीस्तीन पर इजरायल के हमलों से भी विश्व शांति तार-तार हुई है। हमास के खात्मे के नाम पर इजरायल ने फिलीस्तीन में नरसंहार किया है और यह खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है, ऐसे में अब भारत के लिए कड़े फैसले लेने का वक्त आ गया है। इजरायल के साथ भारत के आर्थिक-सामरिक संबंध रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों इजरायल के पूर्व राजदूत डेनियल कार्मन ने दावा किया था कि हमास से युद्ध के दौरान भारत, इजरायल को शायद इसलिए हथियारों की सप्लाई कर रहा है, क्योंकि करगिल युद्ध के समय इजरायल ने भारत की सहायता की थी। इस बयान के बाद 25 अगस्त को नई दिल्ली में फिलिस्तीन नेता मोहम्मद मकरम बलावी के साथ अलग-अलग दलों के राजनेताओं की एक बैठक में हुई, जिसमें सपा के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान, कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद कुंवर दानिश अली, सपा के लोकसभा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी, पूर्व सांसद और राष्ट्रवादी समाज पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मोहम्मद अदीब, आप सांसद संजय सिंह, आप विधायक पंकज पुष्कर, कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफजल और जदयू नेता के सी त्यागी शामिल थे। बैठक के बाद सभी नेताओं ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि इजरायल की तरफ से गजा में किए जा रहे नरसंहार में भारत कतई भागीदार नहीं हो सकता है, इसलिए उसे इजरायल को गोला-बारूद की आपूर्ति नहीं करनी चाहिए। इजरायल की तरफ से जारी यह क्रूर हमला न केवल मानवता का अपमान है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय और शांति के सिद्धांतों का भी घोर उल्लंघन है। इस संयुक्त बयान में फिलीस्तीन के साथ भारत के संबंधों की याद दिलाते हुए कहा गया कि भारत को इस बात पर गर्व है कि वह 1988 में फिलिस्तीन को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था। भारत ने फिलिस्तीनी लोगों की संप्रभुता और मुक्ति के अधिकार का लगातार समर्थन किया है।
यह बयान इसलिए मायने रखता है क्योंकि इसमें सपा और कांग्रेस के साथ-साथ जदयू नेता के भी हस्ताक्षर हैं। इसे एनडीए में उठते विरोधी सुर की तरह देखा जा रहा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भारत में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एकजुटता के साथ फैसले लेने की परिपाटी चलती आई है। आजादी के बाद से अपनाई गई विदेश नीति को थोड़े बहुत फेरबदल के साथ ही संचालित किया जा रहा है। ऐसे में देखना होगा कि अब केंद्र सरकार इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया देती है।