• बजट से उम्मीदें

    1 फरवरी को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा केन्द्रीय बजट पेश होगा। आम तौर पर बजट को लेकर कुछ खास बिंदुओं पर ही आम जनता के बीच चर्चाएं होती हैं

    Share:

    facebook
    twitter
    google plus

    1 फरवरी को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा केन्द्रीय बजट पेश होगा। आम तौर पर बजट को लेकर कुछ खास बिंदुओं पर ही आम जनता के बीच चर्चाएं होती हैं, जैसे आयकर में क्या बदलाव होंगे, कौन से सामान महंगे या सस्ते होंगे, मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग के लिए बजट में क्या अलग प्रावधान होंगे, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, अधोसंरचना आदि में सरकार इस बार कितना खर्च करेगी, रक्षा क्षेत्र में बजट कितना बढ़ेगा, रेलवे सामान्य यात्रियों के लिए क्या नई सुविधाएं देगा आदि। लेकिन इस बार बजट अभूतपूर्व परिस्थितियों में पेश होगा। भारत आधिकारिक तौर पर मंदी के दौर से गुजर रहा है। बीते एक साल में महामारी और लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है।

    प्रवासी मजदूर लाचारी से अपने घरों में बैठे हैं। राजकोष खाली है। बेरोजगारी अपने उच्चतम स्तर पर है। चीन के साथ सीमा पर तनाव बरकरार है और इस वजह से उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिसका असर भारतीय कारोबारियों पर भी पड़ रहा है।  इन सबके बीच देश के हजारों किसान दो महीने से अधिक वक्त से राजधानी दिल्ली की सीमा पर आंदोलन कर रहे हैं। यानी हर ओर से तकलीफें ही तकलीफें हैं और इनमें न जुमलेबाजी काम आने वाली है, न हवाई दावे। सब कुछ चंगा सी कहने से लोगों के अच्छे दिन नहीं आएंगे।

    सरकार को धरातल पर उतरकर सच्चाई से आंखें मिलाने के बाद सोच-समझ कर कदम उठाने होंगे, तभी जर्जर हो चुकी अर्थव्यवस्था को संभाला जा सकेगा। बीते एक साल में जीडीपी ऋ णात्मक हो चुकी है। और जानकारों का मानना है कि वित्त वर्ष 2020-21 का अंत अर्थव्यवस्था के 7.7 प्रतिशत तक सिकुड़ने के साथ पूरा होगा। हालांकि अनलॉक के बाद देश के कारोबार ने थोड़ी गति पकड़ी और विकास दर के वित्त वर्ष 21-22 में 11 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। लेकिन यह उम्मीद हकीकत में तभी बदलेगी, जब सरकार बजट में खर्च का ठीक-ठाक प्रावधान रखे। सरकार बजट में अगर बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान करती है, तो इससे मांग को बढ़ावा मिलेगा।

    आसान शब्दों में कहें तो बाजार में पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में सुधार दिखेगा। यूं तो लॉकडाउन के वक्त भी सरकार ने 20 लाख करोड़ के भारी-भरकम राहत पैकेज की घोषणा की थी, जिसका पांच किश्तों में सिलसिलेवार वर्णन वित्तमंत्री ने किया था। लेकिन इस 20 लाख करोड़ में पहले से कई छिपे हुए खर्च भी शामिल थे औऱ अलग-अलग वर्ग के लोगों के लिए जो घोषणाएं सरकार ने की थीं, वे नाकाफी साबित हुईं। गरीबों को मिलने वाली मदद राशि बेहद कम थी, छोटे व्यापारियों को भी मदद नहीं मिली और बाद में जब बैंकों में नकदी आई, तब भी छोटे व्यापारी इस अवस्था में

    नहीं रहे कि कर्ज ले सकें। 
    अर्थशास्त्रियों ने इस बात पर लगातार जोर दिया था कि गरीब की जेब में जब तक नकदी सरकार नहीं पहुंचाएगी, तब तक देश की आर्थिक हालत नहीं सुधरेगी। पर सरकार ने ऐसी नसीहतों को अनसुना करते हुए मध्यप्रदेश उपचुनाव, बिहार चुनाव आदि को केंद्र में रखकर ही फैसले लिए। इसका फायदा भाजपा को मिला, लेकिन देश के आम आदमी के लिए आर्थिक संकट बरकरार रहा। आम जनता अब भी बजट से काफी उम्मीदें लगा रही है।

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी दावा किया है कि इस बार का बजट सदी का सबसे बेहतर बजट होगा। विकास को नई गति देना, रोजगार के नए अवसर बनाना, और इन सबसे बढ़कर आत्मनिर्भर भारत अभियान को रफ्तार देना, ऐसी प्राथमिकताएं सरकार की हैं। इस तरह की बातों से ऐसा लगता है मानो बीते समय के संकट एक बजट से दूर हो जाएंगे। ऐसी उम्मीदें बांधते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि बजट कोई जादू की छड़ी नहीं है जो घुमाते ही सब कुछ ठीक कर देगी।

    सरकार ने पिछले बजट को लाल पोथी में पेश किया था, पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था भारत को बनाने की बात कही थी। तब कोरोना नहीं था, लेकिन फिर भी देश में ऐसी कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी कि विकास सब ओर हो रहा है। तब भी कुछ उद्योगपतियों की दौलत ही बढ़ी थी और अब कोरोना काल में भी जब गरीब और गरीब हो चुका है, तब चंद उद्योगपतियों की दौलत में काफी इजाफा हुआ है। उन्होंने आपदा को सही मायनों में अवसर में बदल दिया और इसमें सरकार की नीतियों का भरपूर सहयोग उन्हें मिला। राजकोष भरने के नाम पर सरकार ने अंधाधुंध निजीकरण किया है, जिस पर सवाल भी उठे। लेकिन सरकार ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा।

    वैश्विक बाजार में जब कच्चे तेल की कीमत घटी हैं, तब सरकार ने अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाया, जिससे पेट्रोल-डीजल सौ रुपए प्रति लीटर तक जा पहुंचे हैं। तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई भी बढ़ी है जिससे आम आदमी परेशान है। हालांकि सरकारी खजाने को भरने में मदद मिली, लेकिन इस खजाने का लाभ जनता को नहीं मिल रहा। नेतृत्व की असली परीक्षा संकटकाल में ही होती है। देखना है कि मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में इस परीक्षा में किस तरह उत्तीर्ण होती है। 

    Share:

    facebook
    twitter
    google plus

बड़ी ख़बरें

अपनी राय दें