कुछ बरस पहले अपराध की कहानियों पर आधारित पत्रिकाएं खूब बिकती थीं, फिर समाचार चैनलों पर अपराध आधारित कार्यक्रम टीआरपी बटोरने लगे और इस वक्त अपराध की दुनिया को फिल्माती वेबसीरीज काफी हिट हो रही हैं। पर्दे पर यह सब देखना सामान्य लग सकता है, लेकिन यही सब रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनने लगें, तो यह काफी खतरनाक हालात हैं। यह दुख की बात है कि इस वक्त बिहार ऐसे ही खतरनाक हालात से गुजर रहा है। जबकि अभी नई सरकार को गठित हुए कुछ अरसा ही गुजरा है। नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी, दोनों ने ही चुनाव प्रचार में राजद काल के शासन में बिहार में जंगलराज का आरोप खूब मढ़ा। लोगों को वे डराया करते थे कि अगर फिर से राजद का शासन आया तो बिहार में अपराध बेलगाम हो जाएंगे।
जनता ने फिर भी राजद को ही सबसे अधिक सीटें दीं, लेकिन भाजपा और जदयू दोनों का गठबंधन सत्ता पर काबिज हुआ। और अब फिर बिहार में किसी वेबसीरीज से भी खतरनाक तरीके से आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। पिछले दस दिनों से राज्य में दर्जनों हत्याएं, बलात्कार, बैंक लूट, डकैती और शराब माफिया द्वारा पुलिस के ऊपर हमले जैसी घटनाएं हुई हैं, जो बताती हैं कि पुलिस का कोई खौफ अपराधियों में नहीं है और राज्य में कानून-व्यवस्था लेशमात्र भी नहीं बची है।
एनसीआरबी की रिपोर्ट में 2018 में 19 मेट्रोपोलिटन शहरों में अपराध के मामले में पटना पहले स्थान पर रहा, जबकि बिहार अपराधों के मामलों में देश में पांचवे स्थान पर रहा। लेकिन अब दो साल बाद हालात और खराब हो चुके हैं, संभवत: एनसीआरबी की आगामी रिपोर्ट में बिहार में अपराधों का और कड़वा सच उजागर होगा। बिहार की सत्ता एक बार फिर संभालने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ध्यान अपनी कुर्सी और अपनी पार्टी की साख बचाने में अधिक है, वे एनडीए में भाजपा से तालमेल को लेकर ज्यादा चिंतित हैं। लिहाजा उनके शासन में अपराधी कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, इस पर उनका फोकस शायद नहीं हो पा रहा है। विपक्षी राजद ने इस मुद्दे पर नीतीश सरकार पर करारा तंज कसा है।
तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया है कि बिहार की मिलावटी सरकार में कोई सुरक्षित नहीं है। विधायकों और उनके परिजनों पर सरेआम सरेराह गोलियां बरसाई जा रही हैं। जब तक मुख्यमंत्री और दो-दो उपमुख्यमंत्री बिहार में प्रतिदिन 100-150 लाशें नहीं गिन लेते उन्हें नींद नहीं आती। जंगलराज के महाराजा चुप क्यों हैं। इधर सरकार में सहयोगी भाजपा के कई नेताओं ने भी अब इन आपराधिक घटनाओं पर सवाल उठाए हैं और जिस तरह से सुझाव अपराध नियंत्रण के लिए दिए हैं, वे अधिक सशंकित करते हैं। बिहार में पूरी तरह से जंगलराज के विपक्ष के आरोपों को देखते हुए कुछ भाजपा नेताओं ने पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की तरह ही अपराधियों से निपटने के लिए उनके एनकाउंटर कर देने के पक्ष में बयान दिए हैं। 2018 और 2019 में भी कुछ भाजपा नेताओं ने अपराधियों के सफाए के लिए राज्य में पुलिस के जरिए एनकाउंटर किए जाने के समर्थन में आवाज उठाई थी।
अपराधियों के भीतर डर बिठाने के लिए एनकाउंटर ही सबसे बेहतरीन तरीका है, ऐसा इन नेताओं का मानना है। यह सही बात है कि अपराधियों के मन में डर होगा, तो अपराध कम होने की गुंजाइश होगी। लेकिन यह डर कानून-व्यवस्था का होना चाहिए, और एनकाउंटर जैसे हालात में कानून के साथ मानवाधिकारों की भी धज्जियां उड़ती हैं। उत्तरप्रदेश में योगी सरकार ने मुठभेड़ों के सहारे अपराधियों को खत्म करने का खूब दावा किया है, मगर सच यही है कि बिकरू कांड, फिर विकास दुबे की गिरफ्तारी और नाटकीय तरीके से मौत जैसे कई सच्चे किस्से घटित हुए हैं और किसी के बाद भी आपराधिक घटनाएं रुकी नहीं। मुठभेड़ के जरिए अपराध खत्म होने होते तो फिर अदालतों की जरूरत ही नहीं होती।
लेकिन त्वरित न्याय के नाम पर की गई पुलिसिया कार्रवाई हमेशा सही हों, ऐसा नहीं होता, इसलिए पुलिस की जिम्मेदारियां अपराधियों को पकड़ने, उन्हें गिरफ्तार करने तक सीमित हैं, फैसला सुनाने का अधिकार अदालतों का ही है। इसमें अपराधों पर लगाम लगाने की संभावनाओं के साथ अपराधियों को सुधरने का मौका देने की गुंजाइश भी बचती है। मानवाधिकारों का संरक्षण भी इस तरह होता है। यह अक्सर देखा जाता है कि मुठभेड़ की आड़ में दलितों, अल्पसंख्यकों को निशाने पर लिया जाता है, या राजनैतिक हिसाब-किताब साधने की आशंकाएं बढ़ती हैं।
इसलिए चाहे बिहार हो या उत्तरप्रदेश अपराधों पर लगाम लगाने की दिशा में काम हो, इसके लिए पुलिस को राजनैतिक दबाव से मुक्त रखा जाए। उन्हें राजनैतिक आकाओं की जी-हुजूरी करने की जगह जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाए, यही असली सुशासन होगा, जो जनता को राहत देगा।