लोकतंत्र सूचकांक की 2020 की वैश्विक रैंकिंग में भारत अब 6.61 अंकों के साथ दो पायदान लुढ़कते हुए 53वें स्थान पर पहुंच गया है। भारत दुनिया के उन 52 देशों में शुमार है, जहां इस सूचकांक के हिसाब से त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र है। अगर लोकतंत्र में भूल-चूक पहली बार दिखलाई गई होती तो उम्मीद बचती कि शायद इसमें अगले साल कोई सुधार होगा। लेकिन भारत में लोकतंत्र लगातार कमजोर ही हो रहा है। पिछले साल जम्मू-कश्मीर में लिया गया फैसला, सीएए, एनआरसी आदि के कारण देश में जो माहौल बना, उस वजह से इस सूचकांक में भारत के लोकतंत्र को महज 6.90 अंक मिले थे।
तब हम 51वें स्थान पर थे। 2018 में भारत के पास 7.23 अंक थे। इन आंकड़ों से साफ दिखाई दे रहा है कि लोकतंत्र को संभाल पाने में केंद्र सरकार नाकाम साबित हो रही है। देश में लोकतंत्र है, हम सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, ऐसी बातें बार-बार कहने से हालात नहीं बदलेंगे, बल्कि उनके लिए उन खामियों को दूर करना होगा, जिनकी वजह से हमारे लोकतंत्र को त्रुटिपूर्ण बताया जा रहा है। पिछला पूरा साल आंदोलन की भेंट चढ़ गया और रही-सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी, जिसमें लॉकडाउन की सख्ती के नाम पर नागरिक अधिकारों को हाशिए पर धकेला गया। दो गज की दूरी का नियम लोगों को एकजुट होने से रोकता रहा, जबकि उसी दौरान राजनैतिक रैलियां और सभाएं पूर्ववत चलती रहीं।
जम्मू-कश्मीर में विशेष स्थिति ही खत्म नहीं हुई, मौलिक अधिकार भी दांव पर लग गए। लंबे वक्त तक इंटरनेट पाबंदी, मीडिया पर लगाम, विपक्ष पर कार्रवाई जैसे कार्यों से लोकतंत्र को बाधित किया जाता रहा। अब देश की राजधानी दिल्ली में दो माह से वैसे ही हालात बन गए हैं। सरकार एक ओर किसानों से वार्ता की बात करती है, दूसरी ओर उनके दमन के लिए अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल कर रही है।
बैरिकेडिंग, कील ठुकवाना, सड़क खुदवाना, सीमाओं पर दुश्मन को रोकने के लिए काम आने वाली कंटीली बाड़ लगवाने जैसे काम किसी नजरिए से लोकतांत्रिक नहीं कहे जा सकते। लोकतंत्र अपने नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है और किसान दो माह से यही कर रहे हैं। जब इस तरह के कदमों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई तो विदेश मंत्रालय सफाई देने के लिए आगे आया। गोदी मीडिया के बाद अब गोदी कलाकारों और खिलाड़ियों की फौज भी सरकार के लिए तैयार हो गई है। ये फौज ट्विटर पर उन अंतरराष्ट्रीय हस्तियों का विरोध कर रही है, जो किसान आंदोलन के समर्थन में आवाज उठा रहे हैं। इसे भारत का आंतरिक मसला बताया जा रहा है, देश को एकजुट रहने की अपील की जा रही है। क्या वाकई हम इतने कमजोर देश हैं कि कुछ लोगों के ट्वीट से हमारी एकजुटता पर खतरा हो सकता है।
कभी किसी फिल्म या फिल्म के शीर्षक या वेबसीरीज या पोस्टर से हमारे धर्म को खतरा होने लगता है, कभी विदेशी हस्तियों की टिप्पणियों से हम असुरक्षित महसूस करने लगते हैं, कभी किसी लेखक, कलाकार या पत्रकार की कही बात से देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। कभी घरेलू महिलाओं के सड़क पर बैठ जाने से कभी किसानों के जमावड़े से सत्तातंत्र को डर लगने लगता है। अगर इतनी सारी कमजोरियां हमें एक साथ भयभीत कर रही हैं, तो फिर आत्ममंथन की जरूरत है कि आखिर ये कैसा नया भारत हमने बना लिया है। केंद्र सरकार के कुछ फैसले और कार्रवाइयां लोकतंत्र के लिए घातक साबित हो रही हैं, वहीं अब बिहार सरकार ने यह फरमान जारी कर दिया है कि अगर आपका नाम किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के कारण पुलिस की चार्जशीट में आता है, तो न सरकारी नौकरी मिलेगी, न सरकारी ठेका।
इससे पहले नीतीश सरकार ने सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी टिप्पणी को अपराध की श्रेणी में डाला था। अब उत्तराखंड में भी सोशल मीडिया पर एंटी सोशल या एंटी नेशनल टिप्पणी करने वालों के लिए पासपोर्ट या अन्य सरकारी सेवाओं तक पहुंच मुश्किल हो सकती है। सत्ता की सुरक्षा के नाम पर किए जा रहे ऐसे तमाम फैसले अंतत: भारत के लोकतंत्र को कैसे खाई में गिरा रहे हैं, यह वक्त इसका साक्षी है।