- जगदीश रत्तनानी
इस जटिल मामले में कुछ मुद्दे सामने नहीं आते हैं। पहला यह है कि तकनीकी अनुपालन का निम्न मार्ग सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के उच्च मार्ग से बहुत अलग है। भले ही बुच के मामले में बचाव को वैध माना जाए लेकिन बुच-अदानी के उलझाव को भूलकर उनका बचाव सबसे अच्छा यह रहा है कि तकनीकी अनुपालन कैसे हासिल किया गया।
तीन वर्ष के कार्यकाल की समाप्ति के बाद माधबी पुरी बुच को सेबी से बाहर निकलने की अनुमति दी गयी है। यह स्वागत योग्य निर्णय है। तीन साल पूर्ण होने के बाद कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है और ऐसा अक्सर हुआ है लेकिन बुच के मामले में समस्याओं के पिटारे पर ढक्कन लगाने का यह एक शालीन तरीका था। यह अलग बात है कि बुच की विदाई का मामला शेयर लिस्टिंग में कथित निष्क्रियता तथा मिलीभगत के एक और विवाद में उलझा हुआ था जो उनके कार्यभार संभालने से पहले का था। उस विवाद से विचलित हुए बिना यह कहा जा सकता है कि भारत की प्रतिभूति बाजार पर निगरानी रखने वाली संस्था की पहली महिला प्रमुख विवाद के बादलों में घिरे होने के साथ सेवानिवृत्त हो रही हैं, जिन्होंने सेबी के भीतर से आलोचना को आमंत्रित किया और जिनके नेतृत्व वाली संस्था की विश्वसनीयता एवं प्रतिष्ठा के बारे में बहुत सारे सवाल छोड़ गईं। सेबी तभी काम कर सकता है जब उसे स्वतंत्रता और ईमानदारी के साथ काम करने दिया जाए। इस भरोसे के बिना भारत के प्रतिभूति बाजारों के गर्म और अक्सर अस्थिर स्थान को नियंत्रित करने के इसके प्रयासों में दृढ़ विश्वास नहीं हो सकता। इस भरोसे का यह नुकसान इस कार्यकाल की सबसे बड़ी छाप बना रहेगा।
जब पहली बार हिंडनबर्ग के आरोपों का झटका सेबी और बुच को लगा तो इस तूफान में फंसी माधबी और उनके पति धवल बुच ने अपनी शैक्षणिक योग्यता दिखाकर औपचारिक स्पष्टीकरण जारी किया था। इसमें बताया गया था कि माधबी आईआईएम अहमदाबाद की पूर्व छात्रा हैं जबकि धवल आईआईटी दिल्ली से स्नातक हैं। जिन आरोपों के बारे में उक्त स्पष्टीकरण जारी किया गया, उन आरोपों के संदर्भ में बुच दम्पति की पढ़ाई-लिखाई को जनता कितना प्रतिष्ठापूर्ण मानती है, यह एक महत्वपूर्ण बात है। हालांकि इसे देखने के कई तरीके हैं। स्पष्ट रूप से हाईलाइट की गई डिग्री जनता से यह पूछने के लिए है कि बताइये कि हमारे जैसे उच्च विद्या विभूषित व्यक्ति को देखने के बाद आपको क्योंकर लगता है कि हमने कुछ गलत किया है? क्या आप जानते हैं कि हम किस वर्ग से आते हैं?... वगैरह।
भारत में कई किस्से-कहानियों व्हाट्सएप के जरिए बेचा जाता है।
हाल के वर्षों में इस बात का बाजार किया गया है कि हमारी अर्थव्यवस्था इस समय राजनीतिक व्यवस्था के शीर्ष पर निर्मित कई रंगों, स्वादों और संस्करणों के लिए गर्जना कर रही है, और कुछ कृपापात्र हैं जो एक जैसे सामानों का व्यापार करते हैं। इनमें से कोई भी बुच के बारे में निर्णय पारित करने के लिए नहीं है लेकिन यह एक अंतर्निहित विश्वास प्रतीत होता है कि जो जनता को आकर्षक रैपर में लपेटी हुई वस्तु खरीदने के लिए प्रेरित करने और यहां तक कि जश्न मनाने के लिए भी है।
इस जटिल मामले में कुछ मुद्दे सामने नहीं आते हैं। पहला यह है कि तकनीकी अनुपालन का निम्न मार्ग सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के उच्च मार्ग से बहुत अलग है। भले ही बुच के मामले में बचाव को वैध माना जाए लेकिन बुच-अदानी के उलझाव को भूलकर उनका बचाव सबसे अच्छा यह रहा है कि तकनीकी अनुपालन कैसे हासिल किया गया और उपयुक्त बक्से को कैसे टिक किया गया। सच्चाई जानने के लिए नए सिरे से जांच की आवश्यकता है जैसे कि आईसीआईसीआई बैंक में बुच की पूर्व सहयोगी चंदा कोचर के मामले में वास्तव में जरूरी थी।
चंदा कोचर को पहले कथित अनुपालन के आधार पर क्लीन चिट दी गई थी और फिर भारत के उस समय के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक में गड़बड़ी का खुलासा न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण ने किया था जिसके बाद कोचर को बर्खास्त कर दिया गया था। बुच के मामले में इसी तरह की जांच के बिना, कैसे और क्यों रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट फंड को सेबी द्वारा आक्रामक रूप से बढ़ावा दिया गया, कैसे बुच के पति के नियोक्ता ब्लैकस्टोन ने इनसे लाभ कमाया और क्यों सेबी ने अदानी समूह की जांच नहीं की? यह सब अनुपालन की रिपोर्टों में दबकर रह जाएगा। इसका मतलब यह नहीं है कि बुच द्वारा प्रवर्तित आरईआईटी के माध्यम से आवास बाजारों के वित्तीयकरण की वांछनीयता और समझदारी पर अन्य प्रश्न पूछे जाएं तथा यह भी कि वे संपत्ति बाजार और आम नागरिकों को कैसे प्रभावित करते हैं। सरकार को उम्मीद हो सकती है कि बुच की सेवानिवृत्ति से ये सारे मामले शांत हो जाएंगे लेकिन इस मामले में किसी न किसी दिन पूरी जांच की आवश्यकता होगी।
दूसरा यह तर्क है कि निजी क्षेत्र के खिलाड़ी जिन्होंने उच्च वेतन, कर्मचारी स्टॉक स्वामित्व योजना (इम्प्लाई स्टॉक ओनरशिप प्लॉन- ईएसओपी के तहत कंपनी अपने कर्मचारियों को कंपनी के शेयर देती है। इससे कर्मचारियों को कंपनी में हिस्सेदारी मिलती है) और कंपनी से मिले बोनस पर जीवन व्यतीत किया है, निश्चित रूप से उच्च आय वाले व्यक्ति होंगे तथा उनके निवेश एवं होल्डिंग और जीवन शैली आवश्यक रूप) से उनकी सुपर-रिच स्थिति को प्रतिबिंबित करेंगे। यह सच है कि कुछ भत्ता दिया जाना चाहिए पर यह भी उतना ही सच है कि शक्ति और कनेक्शन नए अवसर बनाते हैं जो जानबूझ कर ओढ़े गए अंधेपन के साथ अच्छी तरह से काम करते हैं। इसके अलावा एक लोकतांत्रिक राष्ट्र को यह भी पूछना चाहिए कि ऐसी पृष्ठभूमि क्या विशिष्ट योग्यता या नियामक अनुभव लाती है? इस सवाल को भारत में बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ तौलना होगा जो सत्ता के लीवर को अति-धनी और जुड़े हुए लोगों को सौंपने के लिए है, लगभग एक नियंत्रित क्लब गठित करता है जो एक ही थैली के चट्टे- बट्टे हैं। यह नए भारत में प्रतिभा के आधार पर काम करने वाली योग्यता (मेरिटॉक्रसी) के बजाय एक धनिकतंत्र (प्लूटोक्रेसी) है। इन तथाकथित स्टार कलाकारों की सही कीमत और उनके योगदान का वास्तविक मूल्यांकन अपने आप में एक अलग चर्चा का विषय है। दुनिया को उनकी स्व-घोषित प्रतिभा तथा अशिष्ट विचारों या उच्च उपलब्धि के उनके मार्करों को खरीदने की जरूरत नहीं है।
तीसरी बात यह है कि सेबी का कोई भी अध्यक्ष भारत की आज की वास्तविकता में अदानी जैसे शक्ति केंद्र के खिलाफ कार्रवाई करने की बात तो दूर उसके बारे में बात भी नहीं कर सकता। वास्तव में यह आज की राजनीतिक सचाई है और संस्थानों के अपमानों के रूप में इसका टोल भरा जा रहा है। लेकिन यहां तो चेयर पर ही यह खेल खेलने का आरोप लगाया जा रहा था। व्यावसायिकता की उच्च गुणवत्ता के बजाय यह कनेक्शन और कवर-अप के लिए उच्च अंक मांग रहा है। कुछ चुनिंदा लोगों के लिए नियामक और विनियमित के बीच की दूरी मिट गई है। सवाल उठता है कि वास्तव में ये नियुक्तियां कौन करता है व ये नियुक्तियां संस्थान को कैसे मजबूत करती हैं? ध्यान दें कि अध्यक्ष बनने से पहले जब बुच सेबी की पूर्णकालिक निदेशक थीं उस समय से निवेश पर कुछ चिंताएं और खुलासों के बारे में सवाल चर्चित हैं।
उपरोक्त सभी मुद्दे कुशासन को प्रोत्साहित करते हैं जो अन्य प्रकार के एक लाख कुशासन को बढ़ावा देते हैं जिसके बारे में सरकार आज परेशान नहीं है लेकिन ये छोटे-बड़े कुशासन एक साथ मिलकर संस्था को खा जाते हैं और इसे अंदर से खोखला कर देते हैं। यह सब अनदेखे नाटक हैं लेकिन प्रशासन को टाईट करने तथा नट-बोल्ट कसने की कहानियां बेची जाती हैं, क्षुद्र बातों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जबकि मूल मुद्दों को नजरंदाज कर दिया जाता है और देश के साथ छल किया जाता है। जब सुधार के लिए कोई समर्पित इच्छा न हो तो भविष्य में कभी सुधार लाने की योजना क्रियान्वित नहीं हो सकती। इसके बाद होने वाली खींच-तान संस्था को नष्ट करने वाली हो सकती है। वे शासन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देती हैं। तनाव के ऐसे ही कुछ हिस्से के कारण सेबी कर्मचारियों को बुच की मनमानी, उसके कनेक्शन एवं राजनीतिक कवर के कारण कथित अहंकार) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया।
सेबी को रिकवर होने में लंबा समय लगेगा। इस समयावधि को कम करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि जो कुछ भी हुआ है, उसकी न्यायिक जांच का आदेश दिया जाए। यह 'मजबूत नियामक ढांचे को प्रदर्शित करने का सबसे अच्छा तरीका होगा जो न केवल सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं के साथ संरेखित करता है बल्कि निवेशकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है'। बुच के खिलाफ हिंडनबर्ग आरोपों का मुकाबला करने के लिए जारी किए गए सेबी के बयान में यह बात उद्धृत की गयी थी। इस भावना की रक्षा की जानी चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडीकेट : द बिलियन प्रेस)