- शैलेन्द्र सिन्हा
सतत विकास लक्ष्य के 12वें सूचकांक के माध्यम से पूरे देश के साथ साथ झारखंड में भी प्राकृतिक संसाधनों के साथ टिकाऊ विकास के तहत उत्पादन एवं उपभोग के संबंध में दिशा निर्देश दिये गए हैं। झारखंड में जल, जंगल, पहाड़ एवं नदियां यहां की विरासत रही हैं। वन्यजीवों के साथ आदिवासी का संबंध वर्षों से रहा है। प्राकृतिक संपदा से भरपूर झारखंड के लोगों के रोजगार के साधन एवं टिकाऊ विकास इसी में दिखता है। देश का आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधन से ही संभव है। पूरी दुनिया में विशेषकर पूर्वी एशियाई देशों में जल, जंगल और जलवायु का मुख्य स्त्रोत प्राकृतिक संसाधन ही रहा है। समूचा विश्व इस बात पर एकमत है कि ओजोन के बढ़ते प्रभाव को जंगल के माध्यम से ही रोका जा सकता है।
देश के कुछ राज्य ऐसे हैं जिन्हें प्रकृति ने भरपूर संसाधनों से नवाजा है, लेकिन इसके बावजूद राज्य का विकास उस पैमाने पर नहीं हुआ जिसकी उम्मीद की जानी चाहिए। इन्हीं में एक झारखंड है, जहां अपार प्राकृतिक संपदा है। अभ्रक, तांबा, यूरेनियम, बाक्साइट और कोयले जैसे खनिज संपदा इस राज्य की पहचान है। एक आंकड़े के मुताबिक देश का 40 प्रतिशत खनिज झारखंड से ही प्राप्त होता है। इसके बावजूद विकास के नाम पर इसे देश के पिछड़े और बिमारू राज्यों की श्रेणी में गिना जाता है। इतना ही नहीं भारत का सबसे बड़ा आदिवासी बहुल यह राज्य वनों से भी घिरा हुआ है। आदिवासियों की रोजी रोटी का एकमात्र साधन वन संपदा है। लेकिन इसका नीतिगत उपयोग नहीं होने के कारण पर्यावरण और आर्थिक दोनों रूपों में नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहीं आदिवासियों की भी रोजी-रोटी पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। एक तरफ जहां वनों का ह्रास हो रहा है वहीं दूसरी ओर आदिवासियों से उनकी जमीन छिनती जा रही है।
हालांकि इस कमी और क्षति को पूरा करने के लिए झारखंड और केंद्र सरकार की ओर से विशेष पहल किये जा रहे हैं। सतत विकास लक्ष्य 2030 का निर्धारण करते हुए नीति आयोग ने भी इस दिशा में प्रयास किया है। सतत विकास लक्ष्य के 12वें सूचकांक के माध्यम से पूरे देश के साथ साथ झारखंड में भी प्राकृतिक संसाधनों के साथ टिकाऊ विकास के तहत उत्पादन एवं उपभोग के संबंध में दिशा निर्देश दिये गए हैं। झारखंड में जल, जंगल, पहाड़ एवं नदियां यहां की विरासत रही हैं। वन्यजीवों के साथ आदिवासी का संबंध वर्षों से रहा है। प्राकृतिक संपदा से भरपूर झारखंड के लोगों के रोजगार के साधन एवं टिकाऊ विकास इसी में दिखता है। देश का आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधन से ही संभव है। पूरी दुनिया में विशेषकर पूर्वी एशियाई देशों में जल, जंगल और जलवायु का मुख्य स्त्रोत प्राकृतिक संसाधन ही रहा है। समूचा विश्व इस बात पर एकमत है कि ओजोन के बढ़ते प्रभाव को जंगल के माध्यम से ही रोका जा सकता है।
झारखंड का जंगल से रिश्ता अति प्राचीन रहा है, झारखंड के नाम से ही जंगल और खनिज की याद आती है। यहां के आदिवासी जंगल में ही रहते आ रहे हैं, इससे उनका रिश्ता और प्रेम देखते ही बनता है। यहां का प्रमुख पर्व करमा और सरहूल प्रकृति प्रेम को ही दर्शाता है। झारखंड का भौगोलिक क्षेत्रफल 79.7141 वर्ग किलोमीटर है, यह देश का 2.42 प्रतिशत भू-भाग है। राज्य का सुरक्षित वन क्षेत्र 18.58 प्रतिशत, संरक्षित वन क्षेत्र 81.28 प्रतिशत तथा गैर-वर्गीकृत वन क्षेत्र 0.14 प्रतिशत है। भारतीय वन्य सर्वेक्षण 2013 के अनुसार झारखंड में कुल वन क्षेत्र 23473 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 29.47 प्रतिशत है। इस तरह वन संपदा और वृक्षों से भरपूर झारखंड में हरियाली है और पर्यावरण का संतुलन अब भी बना हुआ है।
इसी कड़ी में पेड़ लगाओं-पेड़ बचाओं मुहिम के तहत राज्य में वनरोपण अभियान चलाया जा रहा है। एक आंकड़े के अनुसार झारखंड में अबतक लगभग 5 करोड़ 57 लाख वृक्ष लगाये जा चुके हैं। स्थायी एवं टिकाऊ विकास की दिशा में यह एक ठोस कदम है। जल प्रबंधन और संवर्द्वन की दिशा में भी प्रयास किये जा रहे हैं। राज्य में मुख्यमंत्री जन वन योजना के तहत रैयती भूमि पर वृक्ष लगाये जा रहे हैं। इसके लिए राज्य सरकार की ओर से अनुदान भी दिया जा रहा है। रैयतों की जमीन पर लगनेवाले पेड़ के स्वामित्व उन्हें दिया गया है, इससे वृक्ष लगने लगे है। सरकार के इन प्रयासों के कारण वृक्षारोपण अब जनआंदोलन का रूप ले चुका है। इस अभियान की सफलता के पीछे पंचायत स्तर पर किये जा रहे प्रयास भी उल्लेखनीय रहे हैं।
झारखंड के जंगल न केवल विभिन्न प्रकार की लकड़ियों के लिए प्रसिद्ध हैं बल्कि यहां कई तरह के औषधीय गुणवाले पौधे भी पाये जाते हैं। इनमें कड़वा, नीम, सफेद सदाबहार, गोलगोला, साग गेंदा, कोरैया फूल, अमर बेल और करंज प्रमुख है। इन औषधीय पौधों से आदिवासी समाज भलीभांति परिचित है और सदियों से वह अपनी बीमारी का ईलाज इसी से करता आ रहा है। राज्य में आदिवासियों की अपनी चिकित्सा पद्वति है जिसे होडोपैथी कहा जाता है। होडो का अर्थ आदिवासी और पैथी का अर्थ इलाज होता है। इसी पैथी को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने के उद्धेश्य से राज्य में फॉरेस्ट पार्क बनाने की तैयारी की जा रही है जिसमें कई प्रकार के पेड़ पौधे की प्रजातियों के मॉडल तैयार किये जा रहे हैं। वन विभाग के माध्यम से राज्य में बायोडायवसिर्टी पार्क भी तैयार किया जा रहा है।
झारखंड तसर के मामले में देश में अव्वल है। तसर सिल्क के अंर्तराष्ट्रीय बाजार में इसका प्रमुख स्थान है। तसर के कोकुन बनाने में हजारों गरीब किसान और महिलाएं कार्यरत हैं, जो उनकी आय का साधन बन गया है। राज्य में बड़े पैमाने पर अर्जुन के पेड़ भी लगाये गये हैं, जिसमें रेशम के कीड़े पलते हैं। वहीं दूसरी ओर कुटीर उधोग के माध्यम से भी गरीब किसानों को स्वरोजगार उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके तहत शहद, इमली, चिरौंजी, करंज, जामुन, आम और आंवला का प्रसंस्करण कर कई प्रकार के उत्पाद तैयार किये जा रहे हैं। स्वरोजगार के लिए पूंजी के साथ साथ रोजगार करने की क्षमता और ज्ञान का होना अतिआवश्यक है जो अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड में सबसे अधिक है। दूसरी तरफ सरकार के पास इतने स्त्रोत, संस्थान और प्रावधान हैं कि वह स्वरोजगार के लिए उपयुक्त पात्रों को पूंजी उपलब्ध कराने में पूर्णत: समर्थ है और इस सिलसिले में उसका ईमानदारी से किया जा रहा प्रयास आने वाले समय में झारखंड की दशा और दिशा को बदलने में महत्वपूर्ण साबित होगा।