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जम्मू-कश्मीर में राजनीति
(09:29:21 PM) 29, Jul, 2009, Wednesday


जम्मू-कश्मीर में विवादास्पद घटनाओं का क्रम थमता ही नजर नहीं आ रहा है। सोमवार को विधानसभा में जिस तरह का दृश्य उत्पन्न हुआ, वह भारत के लिए नया नहींहै, पर दुर्भाग्यपूर्ण जरूर है। विशेषकर जम्मू-कश्मीर जैसे प्रांतों में, जहां स्थिरता वक्त की सबसे बड़ी मांग है। बजट सत्र के पहले ही दिन विपक्षी दल पीडीपी के सदस्यों ने शोपियां मामले पर विधानसभा अध्यक्ष की अनुमति के बिना ही इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की। शोपियां बलात्कार कांड पर पिछले 2 महीनों से राज्य में अशांति का माहौल बना हुआ है। राज्य सरकार इस पर गंभीरता से कार्रवाई कर रही है। लेकिन पीडीपी इस पर राजनीति करने से बाज नहींआई। विपक्ष की नेता महबूबा मुफ्ती ने संसदीय मर्यादा को ताक पर रखते हुए स्पीकर की मेज पर रखा माइक उखाड़ दिया। एक गंभीर मसले पर इस तरह का तमाशा किसी तरह से राजनैतिक परिपक्वता नहींकहा जा सकता। जम्मू-कश्मीर चारों ओर से जैसी समस्याओं से घिरा हुआ है, उसमें तमाम राजनीतिक दलों और नेताओं का एकमात्र मकसद उन मुश्किलों का हल करते हुए कश्मीरियत की रक्षा करना होना चाहिए। लेकिन राजनीति के गंदे खेल यहां हावी हो रहे हैं। ऐसे में जनता को भ्रमित करने व बहकाने का काम बाहरी ताकतें ज्यादा आसानी से कर सकती हैं। राजनीतिक दल अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए संकट को बुलावा दे रहे हैं।
सोमवार के हंगामे के बाद भी सत्र को ढंग से चलने देने के प्रयास नहींहुए। मंगलवार सुबह दोबारा तमाशा खड़ा किया गया। इस बार निशाना बने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला। पीडीपी के वरिष्ठ विधायक मुजफ्फर बेग ने उमर अब्दुल्ला पर आरोप लगाते हुए कहा कि 2006 में हुए सेक्स स्कैंडल की सीबीई जांच में उनका नाम भी शामिल है। इस आरोप से बौखलाए, खिन्न उमर अब्दुल्ला ने तत्काल इस्तीफा दे दिया। उनके दल नेशनल कांफ्रेंस के सदस्यों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन श्री अब्दुल्ला ने कहा कि यह इस तरह का आरोप है कि जब तक इस कलंक या धब्बे से मुझे निर्दोष साबित नहींकिया जाता, मैं इस पद पर नहींरहना चाहता। विपक्ष द्वारा इस तरह की राजनीति करने से वे बेहद दुखी नजर आए। नैतिकता के लिहाज से श्री अब्दुल्ला का कदम एकदम सही और आज की राजनीति में दुर्लभ है। जनप्रतिनिधि जितनी पारदर्शिता व नैतिकता से काम करेंगे, जनता का विश्वास उतना ही उन पर बढ़ेगा। प्रश्न यह है कि विपक्ष में बैठा पीडीपी कब तक अपनी हार की खीझ इस तरह के तमाशों के जरिए निकालता रहेगा। सशक्त विपक्ष की रचनात्मक भूमिका निभाकर वह प्रदेश की बेहतरी के लिए कार्य करने की क्यों नहीं सोचता।
सीबीआई की जिस सूची को आधार बनाकर आरोप लगाया गया है, उस बारे में सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि उमर अब्दुल्ला का नाम उसमें नहींहै। 2006 में पीडीपी व कांग्रेस गठबंधन की सरकार के दौरान बहुचर्चित सेक्स स्कैंडल हुआ था। इसमें नाबालिग लड़कियों समेत कई लड़कियों को जबरन वेश्यावृत्ति में धकेला गया, उन्हें ब्लैकमेल किया गया और कई राजनेताआें, अधिकारियों व सेना के लोगों के पास इन्हें भेजा गया। इस कांड पर तब प्रदेश में काफी बवाल मचा था। आज विपक्ष में बैठी पीडीपी यह भूल रही है कि यह भयंकर घटना उसके शासनकाल में हुई थी। तब सीबीआीई ने पीडीपी-कांग्रेस सरकार के दो मंत्रियों जी.एम.मीर व रमन मट्टू एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के पूर्व प्रमुख सचिव इकबाल खांडे को गिरफ्तार किया था। पीडीपी अब इस घटना पर राजनीतिक लाभ लेने की अनावश्यक कोशिश कर रही है। 2006 की यह घटना व शोपियां जैसे मामले बताते हैं कि राज्य में महिलाओं की स्थिति ठीक नहींहै। तब क्या महबूबा मुफ्ती जैसी नेताओं का यह कर्तव्य नहींबनता कि वे इस दिशा में कोई सकारात्मक व ठोस पहल करें, बजाए थोथी राजनीति के।

 
 
 
 
 
 
 
 
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