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| डॉ. विनायक सेन |
| (02:50:53 AM) 11, May, 2009, Monday |
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ललित सुरजन
डॉ. विनायक सेन को बंदी जीवन बिताते हुए इस 14 मई को 2 साल पूरे हो जाएंगे। छत्तीसगढ क़े राजनैतिक इतिहास में यह एक अपूर्व घटना होगी तथा इसकी अनुगूंज आज न सही, आने वाले समय में बड़ी दूर तक सुनाई देगी। हम समझते हैं कि इस प्रकरण पर सभी संबंधित पक्षों को ही नहीं, वृहत्तर समाज को भी गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। डॉ. सेन पर आरोप है कि वे हिंसक नक्सल आंदोलन के सक्रिय सहयोगी हैं। इसीलिए छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून के अन्तर्गत उन पर मुकदमा चल रहा है। यह आरोप सत्य है या मिथ्या, इसका निर्णय इन दो सालों में नहीं हो सका है। किंतु ध्यान देने योग्य है कि निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक उनकी जमानत याचिका हर स्तर पर निरस्त हो चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय में बीते सप्ताह जब पुनर्विचार के लिए याचिका प्रस्तुत हुई, तब भी न्यायालय ने उसके त्वरित निराकरण में कोई रुचि नहीं दिखाई। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पुलिस के पक्ष में ऐसे कोई ठोस सबूत अवश्य हैं, जिनसे अदालत भी संतुष्ट है। अगर अदालत रूढ़िवादी सोच की शिकार है तो उस पर ऐसी कोई टीका डॉ. सेन के पक्षधरों ने अब तक नहीं की है। यह तस्वीर का एक पहलू है। डॉ. सेन की पहचान छत्तीसगढ़ में एक सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में रही है। वे जयप्रकाश नारायण द्वारा स्थापित लोक स्वांतत्र्य संगठन के प्रादेशिक उपाध्यक्ष थे और हैं। इसके अलावा वे एक गुणी चिकित्सक भी हैं। दल्ली राजहरा के शहीद अस्पताल एवं गनियारी (बिलासपुर) के जन स्वास्थ केंद्र की स्थापना एवं संचालन में किसी हद तक उनका योगदान रहा है। उनकी इन दोनों भूमिकाओं के कारण देश-विदेश के मानवाधिकार कार्र्यकत्ता एवं डॉक्टर उनकी रिहाई के लिए पहिले दिन से आंदोलन करते रहे हैं। अभी भी प्रति सोमवार रायपुर में इस हेतु आंदोलन एवं सांकेतिक गिरफ्तारी का क्रम चल रहा है। मेधा पाटकर, अरुंधति राय, संदीप पांडे व आनंद पटवर्ध्दन जैसे ख्यातिप्राप्त समाज चिंतक उनके प्रति एकजुटता दिखलाते हुए गिरफ्तारी दे चुके हैं। तस्वीर का तीसरा पहलू इस तरह देखने में आता है कि विनायक सेन की गिरफ्तारी को लेकर छत्तीसगढ़ के जनमानस में कोई हलचल नहीं है। कुछेक सामाजिक कार्र्यकत्ताओं को छोड़ दें तो इस बारे में कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है। संदीप पांडे रायपुर में बूढ़ातालाब के किनारे दस दिन तक धरने पर बैठे रहे तथा इधर तमाम नामी लोगों ने गिरफ्तारियां दीं, लेकिन कोई उन्हें देखने तक नहीं गया। यह उदासीनता किसी भय या आतंक के कारण नहीं है। डॉ. सेन ने भले ही अपना जीवन आदिवासियों व वंचित समूहों के अधिकार संरक्षण के लिए समर्पित किया हो, यह मानना चाहिए कि छत्तीसगढ़ की आम जनता के साथ उनका कोई सक्रिय संपर्क या संवाद नहीं रहा है। यह भी ााहिर है कि नक्सलवाद के मुद्दे पर कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी के विचारों में कोई खास फर्क नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अलावा अन्य किसी कांग्रेसी ने डॉ. सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ आवाा उठाना उचित नहीं समझा। वामदल यद्यपि उनकी रिहाई की मांग करते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि वामदल और नक्सली वैचारिक भूमि पर एक दूसरे के विरोधी हैं। ऐसे में राजनैतिक तौर पर यह मुद्दा या तो उग्र वामपंथियों याने माओवादियों का है जो अपनी हिंसक कार्रवाईयों को रोकने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है; या फिर उन कम्युनिस्ट विरोधी समाजवादी आंदोलनकारियों का जो विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष तो करते हैं, लेकिन राजनैतिक प्रक्रिया से खुद को दूर रखना ही श्रेयस्कर मानते हैं। 'देशबन्धु' ने डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी का विरोध प्रारंभ में ही किया था। हम समय-समय पर उनकी रिहाई की मांग भी उठाते रहे हैं। आज हम इस मांग को दोहरा रहे हैं और इस हेतु हमारे अपने तर्क हैं। एक तो यह देखना कठिन नहीं है कि डॉ. सेन की गिरफ्तारी के बावजूद नक्सलियों की अविचारित हिंसा में कोई कमी नहीं आई है। अगर डॉ. सेन नक्सली हैं, जैसा कि आरोपित है, तो मानना होगा कि माओवादियों ने उन्हें अपना कर्मफल भोगने के लिए अकेला छोड़ दिया है। यदि वे नक्सली नहीं हैं, जैसा कि उनके तमाम समर्थकों का दावा है, तब तो कहना होगा कि उनके जेल में रहने से माओवादियों की योजनाओं में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। दोनों ही स्थितियों में नक्सलवाद को रोकने में डॉ. सेन के कारावास में रहने से कोई लाभ होते नार नहीं आता। यह संभव है कि एक मानव अधिकार कार्र्यकत्ता होने के नाते डॉ. सेन की सहानुभूति नक्सल आंदोलन के साथ रही हो। लेकिन वैचारिक सहानुभूति एवं सक्रिय सहयोग के बीच बड़ा फर्क है। यह भी संभव है कि डॉ. सेन ने जेल में बंद कथित नक्सली नारायण सान्याल के साथ बार-बार मुलाकातें करने में व्यवहार बुध्दि के बजाय अतिशय भावुकता से काम लिया हो। लेकिन यदि वे नक्सलियों के तौर-तरीकों के साथ इत्तिफांक रखते हों, तब भी हमारा कहना है कि उनको माध्यम बनाकर नक्सलियों के साथ बातचीत करना ज्यादा कारगर तरकीब हो सकती थी। आंध्र में कवि गदर व कवि वरवर राव के उदाहरण सबके सामने हैं। हम माओवादियों को कोई सलाह देने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन यह ारूर कहना चाहेंगे कि भारत में नक्सल आंदोलन के प्रणेताओं में से एक कनु सान्याल जैसे व्यक्ति तक ने अपना रास्ता बदल लिया है व अब वे जनतांत्रिक राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। एनसीसी के ए.के. रॉय ने भी माओवाद के ऊपर गांधीवाद को ही अन्तत: स्वीकार किया। छत्तीसगढ़ में बाहर से आकर आए दिन जो खून-खराबा कर रहे हैं, वे माओवादी भी इस सच्चाई को जितने जल्दी समझ लें, उतना ही अच्छा होगा। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि डॉ. सेन को यदि जमानत मिल जाती है तो उन्हें प्रसन्नता होगी। हम उनसे इसके आगे अनुरोध करना चाहेंगे कि वे डॉ. विनायक सेन प्रकरण की अपने स्तर पर नए सिरे से विवेचना करें। उन्होंने विभिन्न जिम्मेदारियों को सम्हालते हुए लगातार राजनैतिक परिपक्वता का परिचय दिया है। अपनी नीतियों व कार्यक्रमों के द्वारा उन्होंने जनता का अतुल विश्वास अर्जित किया है। आम आदमी के दु:ख-दर्द से वे व्यथित होते हैं और संवेदना के धरातल पर निर्णय लेते हैं, वह बात उनके विरोधी भी मानते हैं। इस प्रसंग में भी वे अपने स्तर पर न्यायपूर्ण निर्णय की पहल करेंगे, ऐसी आशा रखना स्वाभाविक ही है।
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