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कांग्रेस का आत्मबल व मराठा क्षत्रप की बेबसी
(12:16:47 PM) 30, Sep, 2009, Wednesday

सुर्ख़ियो में
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राहुल सिंह
मराठा क्षत्रप शरद पवार इस बार कांग्रेस के दबाव में हैं। लोकसभा चुनाव से अति उत्साहित कांग्रेस ने इस मराठा दिग्गज से जमकर चुनावी मोलभाव किया। पहले तो कांग्रेस के नेताओं ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से गठबंधन किए बिना चुनाव में उतरने की राग छेड़ी। इसका सीधा मतलब राकपा को कम से कम सीटों पर चुनाव लडऩे के लिए दबाव में लेना था। कांग्रेस की इस कोशिश ने रंग दिखाया और बहुत हद तक कांग्रेस की एक तरफा शर्तों पर राकांपा 114 सीटों पर चुनाव लडऩे को तैयार हो गई, जबकि कांग्रेस खुद 174 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पिछली बार कांग्रेस 157 व राकांपा 124 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। यानी कांग्रेस ने राकांपा की 20 सीटें उससे झटक ली।
इस वर्ष संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में राकांपा का प्रदर्शन अपने गढ़ में ही काफी बुरा रहा। कांग्रेस ने जहां महाराष्ट्र में 17 सीटें जीती, वहीं राकांपा आठ सीटों तक सीमित रही। उस पर कांग्रेस ने पवार की तुलना में उनके ही गढ़ पश्चिमी महाराष्ट्र  में ज्यादा सीटें हासिल की। इससे  पार्टी व आम कार्यकर्ताओं दोनों का मनोबल बढ़ा। दरअसल, शरद पवार ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को खुद से से पीछे रखने के लिए जो तानाबाना बुना था, वह उन्हें ही महंगा पड़ा। कभी सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से विद्रोह करने वाले पवार आज लाचार दिख रहे हैं। उनकी यह 'राजनीतिक लाचारी' चुनाव परिणाम पर भी असर डालेगी। पिछली बार कांग्रेस से 33 कम सीटों पर लड़कर भी राकांपा ने दो सीटें ज्यादा जीती थी। कांग्रेस को जहां 69 सीटें मिली थी, वहीं राकांपा की झोली में 71 सीटें आई थी। इसके पीछे उस समय की परिस्थतियां जिम्मेदार थीं। 2004 में लोकसभा चुनाव के कुछ महीनों के बाद चुनाव हुआ था। उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन सकीं और अचानक उन्होंने इस पद के लिए डॉ मनमोहन सिंह का नाम आगे कर दिया। महाराष्ट्र  में इसका 'श्रेय' पवार को भी गया। सोनिया के विदेशी मूल पर मुखर रहे इस धरती पुत्र में लोगों का विश्वास बढ़ा था। उस समय पवार नए-नए कृषि मंत्री बने थे और किसानों पर इसका प्रतिकात्मक असर भी चुनाव परिणाम के रूप मे दिखा था।
अब हालात बदल चुके हैं। कांग्रेस अब अति आत्मविश्वास मे है। सोनिया के विदेश मूल के मुद्दे पर विद्रोह करने वाले दूसरे कद्दावर नेता पीए संगमा सोनिया की चौखट पर जाकर क्षमायाचना कर चुके हैं। कांग्रेसी अब मराठा सरदार को झुकाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। पवार जमीनी संघर्ष की राह चलकर राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे। ऐसे में बड़ी सहजता से उनके झुकने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। लेकिन दोनों दलों के बीच की चुनावी संवादहीनता चुनाव परिणाम पर भी असर डालेगी। पहले तो दोनों दलों के बीच लंबे समय तक गठबंधन को लेकर संशय का माहौल रहा और उसके बाद सीटों के तालमेल पर अटकी रही। राज्य में कांग्रेस-राकांपा की सरकार होने के बावजूद दोनों दलों ने कोई संयुक्त घोषणा पत्र भी जारी नहीं किया। इससे कई सवाल उठ खड़े होते हैं। पवार ने भी दो दिन पूर्व एक रैली में इस बात के संकेत दिए हैं कि वे 15वीं लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने के बाद राजनीति से संन्यास लेना चाहते हैं और अगली पीढ़ी को नेतृत्व सौंपना चाहते हैं। पवार की बेबसी व कांग्रेस का आत्मबल और दोनों की संवादहीनता तीनों इस चुनाव को प्रभावित करने वाले बड़े कारक बनेंगे, जिनके नफे-नुकसान का आकलन चुनाव परिणाम आने पर ही हो सकेगा।

 
 
 
 
 
 
 
 
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