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Interviewee  :  सलमान हैदर, डॉ. वेदप्रताप वैदिक,
Interviewer  :  पूनम सिंघल, अनिल पाठक
Interview Date : 26,July,2009
 

शर्म-अल-शेख में जारी साझा बयान में बलूचिस्तान का जिक्र करके भारत ने पाकिस्तान को बैठे-बिठाए एक मुद्दा थमा दिया। इसके अलावा भारत आतंकवाद और समग्र वार्ता पर अलग-अलग वार्ता के लिए तैयार हो गया। जैसा कि उम्मीद थी बयान को लेकर देश में भारी हंगामा हुआ। लेकिन आज विदेश मंत्रालय की तरफ से जो जानकारी मीडिया में आ रही है, उससे सरकार का रूख भी स्पष्ट हो गया। जानकारी के अनुसार पाकिस्तान चाहता था संयुक्त संवाद हो, जबकि भारत आतंकवाद पर वार्ता चाहता है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्टï किया है कि जबतक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई नहीं करेगा, किसी भी प्रकार की बातचीत संभव नहीं है। जहां तक आतंकवाद की बात है, तो यह नहीं स्पष्ट किया गया है कि अगर दोनों देशों के बीच वार्ता होती है, तो पहले आतंकवाद सुलझेगा या समग्र वार्ता होगी अथवा दोनों साथ-साथ चलेंगे? इसके अलावा बलूचिस्तान को संयुक्त बयान में जगह देने का अर्थ है कि दोनों देशों के बीच यह नया मुद्दा आ गया है। वहीं कश्मीर का जिक्र नहीं हुआ लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इस्लामाबाद ने इस मुद्दे को छोड़ दिया है। संभव है कि पाकिस्तानी हुक्मरान की मुसीबत कम करने के लिए भारत बलूचिस्तान के जिक्र पर सहमत हुआ हो। इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने मुंबई हमले के पांच आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी शुरू  कर दी। हो सकता है दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच बनी सहमति के कारण ऐसा हुआ हो लेकिन बयान से यही संदेश जाता है कि बलूचिस्तान की अस्थिरता पर शिखर नेताओं में चर्चा हुई और भारत पाकिस्तान से कुछ इत्तेफाक रख रहा है। पाकिस्तान ने इस पर भारत को घेरने वाला बयान देना भी शुरू  कर दिया है। लेकिन विदेश मंत्रालय के ताजा बयान से भारत का रूख भी स्पष्टï होता दिख रहा है।

सलमान हैदर, विदेश मामलों के जानकार

सरकार ने की है भयंकर भूल
पिछले 62 साल में भारत-पाक के बीच दर्जनों दस्तावेज पर दस्तखत हुए हैं, लेकिन जैसी लापरवाही शर्म-अल-शेख में हुई है, पहले कभी नहीं हुई। ताशकंद, शिमला, इस्लामाबाद और 2006 के हवाना समझौतों में भी भारत ने अनेक उचित और अनुचित रियायतें पाकिस्तान को दी हैं लेकिन 16 जुलाई 2009 का यह समझौता भारतीय कूटनीतिक इतिहास का निम्नतम बिंदु माना जाएगा और हमारे कूटनीतिक अनाड़ीपन का उच्चतम बिंदु सबसे पहले तो इस संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि 'आतंकवाद' के विरूद्ध की जानेवाली कार्रवाई को साझा संवाद प्रक्रिया के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए और उन्हें एक ही खांचे में नहीं रखा जाना चाहिए।

बच्चे स्कूल जाने लगे हैं।

संसद के अंदर और बाहर प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री कई बार दो-टूक शब्दों में कह चुके हैं कि भारत सरकार पाकिस्तान से तब तक बात नहीं करेगी, जब तक वह मुंबई-हमले के अपराधियों के विरूद्ध कार्रवाई नहीं करेगी? क्या पाकिस्तान सरकार ने अभी तक कोई ऐसी कार्रवाई की है, जिसके कारण भारत सरकार को अपना रवैया एक दम बदल देना पड़ा है? इस बीच पाकिस्तान ने क्या-क्या कदम उठाए हैं? उसने मुंबई-कांड के सरगना हाफिज सईद पर से केस उठा लिया है, उसने नियंत्रण-रेखा पर नए बंकर बनाए हैं, उसके फौजी अफसरों ने अमरीका से कहा है कि वे तालिबान को पटा सकते हैं, बशर्ते कि अमरीका भारत को अफगानिस्तान से हटाए, उसने आरोप लगाया है कि भारत सरकार मुंबई-हमले के अपराधियों के विरूद्ध प्रमाण देने में आनाकानी कर रही है। दूसरे शब्दों में पिछले सात माह में पाकिस्तान सात इंच भी आगे नहीं बढ़ा है, फिर भी यूसुफ रजा गिलानी ने मनमोहन सिंह पर ऐसी कौन सी मोहिनी डाल दी कि उन्होंने आतंकवाद-विरोध और साझा संवाद को एक-दूसरे से अलग कर दिया जो 'डोजियर' पाकिस्तान ने भेजा है, क्या उसमें ऐसे तथ्य और सबूत हैं, जिन्हें पढ़कर हमारे प्रधानमंत्री मंत्र-मुग्ध हो गए हैं? अगर ऐसा है तो वे संसद और राष्ट्र को उनसे अवगत करवाएं! अगर सचमुच 'डोजियर' बेहद ईमानदाराना है तो भी आतंकवाद-विरोध और साझा संवाद को अलग करने की जरूरत क्या है? वैसी स्थिति में तो दोनों का संबध पहले से अभी अधिक घनिष्ट हो जाना चाहिए था। संयुक्त वक्तव्य में दोनों को एक सिक्के के दो पहलू बताया जाना चाहिए था। लेकिन दोनों में संबंध विच्छेद करके भारत सरकार ने आतंकवादियों की पीठ ठोक दी है। उसने कह दिया है कि आतंकवाद और बातचीत, दोनों साथ-साथ चलते रहेंगे। हमारे प्रधानमंत्री शायद आसिफ जरदारी और गिलानी के आतंकवाद-विरोधी रवैए को अपना समर्थन देना चाहते हैं। वे पाकिस्तान में फौजतंत्र के मुकाबले लोकतंत्र को मजबूत बनाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल गए कि पाकिस्तान की असली सरकार जरदारी और गिलानी नहीं है, फौज है और आईएसआई है। यह संभव है कि जरदारी और गिलानी का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं हो लेकिन उनके बहाने हमारे प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के पूरे सत्ता-प्रतिष्ठान को अनापत्ति प्रमाण-पत्र दे दिया है। यही भूल उन्होंने सितंबर 2006 में की थी। उन्होंने हवाना में जनरल मुशर्रफ से जो समझौता किया था, उसमें भी पाकिस्तान को भारत के समकक्ष मान लिया था। यह मान लिया था कि दोनों राष्ट्र आतंकवाद के साझा शिकार हैं और उससे लडऩे के लिए साझा-तंत्र खड़ा करेंगे। क्या हुआ उस समझौते का? यह समझौता, उससे भी बदतर है।

दो अन्य भयंकर भूलें भी उस दस्तावेज में हैं। एक तो बलूचिस्तान का जिक्र है और दूसरा कश्मीर का नाम लिए बिना जिक्र है। भारत ने यह पहली बार माना है कि बलूचिस्तान में बगावत के लिए भारत जिम्मेदार है या उससे उसका कुछ संबंध है। वरना, यह बताएं कि भारत-पाक दस्तावेज में बलूचिस्तान का क्या काम है? उसका जिक्र ही क्यों आया? क्या बलूचिस्तान भारत का हिस्सा है? बलूचिस्तान के बारे में भारत को पाकिस्तान क्या जानकारी देगा, क्यों देगा? पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान में भारतीय हस्तक्षेप के जो आरोप लगाए हैं, इस दस्तावेज ने उन्हें औपचारिक रूप दे दिया है।

 ''सभी प्रमुख मुद्दों सहित, सभी मुद्दों पर बात करने का आश्वासन भारतीय प्रधानमंत्री ने दिया है। इसका अर्थ क्या है? क्या कश्मीर पाकिस्तान का 'प्रमुखतम' मुद्दा नहीं है? संयुक्त बयान के आखिर में कहा गया है कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान से भी बात किया जाएगा, जिससे भारत के लिए मुश्किल पैदा हो सकती है। लगता है कि प्रधानमंत्री ने दस्तावेज को ठीक से पढ़ा ही नहीं है। मामले को तूल पकड़ता देख कांग्रेस भी अब पल्ला झाडऩा शुरू कर दिया है, उसके बाद अब हमारे प्रधानमंत्री भी यह कह रहे हैं कि जब तक मुंबई-हमले का समाधान नहीं होता और पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं करेगा, बातचीत नहीं होगी। इन बयानों से लगता है कि कांग्रेस और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी गलती का एहसास हो गया है और वे इसे दूर करना चाहते हैं। इसीलिए मामले की लीपापोती की जा रही है।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक, विदेश मामलों के जानकार


 
 
 
 
 
 
 
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